प्रस्तावना
उपेन्द्रनाथ अश्क (1910–19 जनवरी 1996) हिंदी-उर्दू साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार, कवि, आलोचक और संस्मरण लेखक थे। वे प्रेमचंदोत्तर हिंदी-उर्दू कथा साहित्य के उन सशक्त रचनाकारों में गिने जाते हैं, जिन्होंने यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक गहराई और सामाजिक चेतना को साहित्य का केंद्रीय विषय बनाया।
अश्क की विशेष पहचान यह भी रही कि वे अपनी पुस्तकों का स्वयं प्रकाशन करते थे, जो उन्हें एक निर्भीक और आत्मनिर्भर साहित्यकार सिद्ध करता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
- जन्म: 14 दिसंबर 1910
- जन्म स्थान: जालंधर, पंजाब
- निधन: 19 जनवरी 1996
- पिता: पंडित माधोराम (स्टेशन मास्टर)
- परिवार: मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार
- भाई: छह भाइयों में दूसरे
बाल्यावस्था से ही अश्क ने जीवन की सामाजिक विषमताओं और संघर्षों को निकट से देखा, जिसका गहरा प्रभाव उनकी रचनात्मक चेतना पर पड़ा।
शिक्षा एवं प्रारंभिक रुझान
जालंधर में प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही 11 वर्ष की आयु में पंजाबी में तुकबंदी करने लगे थे।
- जालंधर से मैट्रिक
- डी.ए.वी. कॉलेज, जालंधर से बी.ए. (1931)
- आगे चलकर विधि (Law) की परीक्षा विशेष योग्यता से उत्तीर्ण की
बचपन में वे शिक्षक, लेखक, संपादक, वक्ता, वकील, अभिनेता और निर्देशक—सब कुछ बनना चाहते थे।
साहित्यिक जीवन की शुरुआत
उपेन्द्रनाथ अश्क ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत उर्दू लेखक के रूप में की।
1932 में मुंशी प्रेमचंद की प्रेरणा और सलाह पर उन्होंने हिंदी में लेखन आरंभ किया।
1933 में प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह ‘औरत की फितरत’ की भूमिका स्वयं प्रेमचंद ने लिखी, जो उनके साहित्यिक भविष्य की दिशा तय करने वाला क्षण था।
बम्बई प्रवास और फ़िल्म जगत
अश्क जी ने बम्बई में रहकर—
- फ़िल्म कहानियाँ
- पटकथाएँ
- संवाद
- गीत
लिखे तथा तीन फ़िल्मों में अभिनय भी किया।
हालाँकि, फ़िल्म जगत की चमक-दमक उन्हें रास नहीं आई और वे पुनः साहित्य की साधना में लौट आए।
कार्यक्षेत्र और जीवन संघर्ष
बी.ए. के बाद उन्होंने अध्यापन किया, फिर—
- साप्ताहिक पत्र ‘भूचाल’ का संपादन
- ‘गुरु घण्टाल’ के लिए साप्ताहिक कहानियाँ
- 1936 में लॉ पास
- ऑल इंडिया रेडियो में सेवा
- इलाहाबाद आकर ‘नीलाभ प्रकाशन’ की स्थापना
उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, किंतु इसी संघर्ष ने उनके साहित्य को गहराई दी।
साहित्यिक विशेषताएँ
1. यथार्थवादी दृष्टि
अश्क का साहित्य प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाता है, किंतु उसमें आधुनिक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण जुड़ा हुआ है।
2. मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण
उनके पात्र—
- संघर्षशील
- आत्मसंघर्ष से ग्रस्त
- सामाजिक दबावों से जूझते हुए
पूर्णतः जीवंत दिखाई देते हैं।
3. भाषा-शैली
- सरल
- संवादात्मक
- भावप्रवण लेकिन आडंबरहीन
प्रमुख कृतियाँ
उपन्यास
- गिरती दीवारें
- गर्म राख
- सितारों के खेल
- शहर में घूमता आईना
- पत्थर अलपत्थर
- एक नन्हीं किंदील
कहानी संग्रह
- जुदाई की शाम का गीत
- पिंजरा
- काले साहब
- सत्तर श्रेष्ठ कहानियाँ
नाटक
- अंजो दीदी
- कैद
- जय-पराजय
- स्वर्ग की झलक
- बड़े खिलाड़ी
एकांकी
- अंधी गली
- चरवाहे
- नया पुराना
- मुखड़ा बदल गया
काव्य संग्रह
- प्रातः प्रदीप
- दीप जलेगा
- बरगद की बेटी
- एक दिन आकाश ने कहा
संस्मरण
- मंटो मेरा दुश्मन
- फिल्मी जीवन की झलकियाँ
सम्मान और पुरस्कार
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1965)
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1972)
यादगार प्रसंग
इलाहाबाद में अश्क द्वारा खोली गई परचून की दुकान को मीडिया ने गलत अर्थों में प्रचारित किया।
अश्क ने स्वयं स्पष्ट किया कि यह साहित्य से मोहभंग नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का प्रतीक था।
निधन
उपेन्द्रनाथ अश्क का 19 जनवरी 1996 को निधन हो गया।
उनके निधन से हिंदी-उर्दू साहित्य ने एक निडर, ईमानदार और बहुआयामी कथाकार खो दिया।
