प्रस्तावना
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1899–1961) हिंदी साहित्य के छायावाद युग के प्रमुख स्तंभ थे। वे केवल महान कवि ही नहीं, बल्कि उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार और अनुवादक भी थे। हिंदी कविता में मुक्त छंद के प्रवर्तक के रूप में उनका योगदान क्रांतिकारी माना जाता है। जीवनभर आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक संघर्षों से जूझते हुए भी उन्होंने साहित्य में स्वतंत्र चेतना, विद्रोह और मानवीय करुणा की सशक्त अभिव्यक्ति की।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म 21 फरवरी 1899 (वसंत पंचमी) को महिषादल रियासत, जिला मेदिनीपुर (अब पश्चिम बंगाल) में हुआ।
- बचपन का नाम: सूर्यकुमार
- पिता: पंडित रामसहाय तिवारी (उन्नाव, उत्तर प्रदेश के गढ़ाकोला गाँव के निवासी)
- माता: (नाम उपलब्ध नहीं; तीन वर्ष की आयु में उनका निधन)
निराला के पिता महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। जन्मकुंडली के अनुसार नामकरण हुआ, किंतु आगे चलकर उन्होंने स्वयं को ‘निराला’ नाम से प्रतिष्ठित किया—जो उनके व्यक्तित्व और काव्य-स्वभाव के अनुरूप था।
शिक्षा एवं बौद्धिक निर्माण
निराला की औपचारिक शिक्षा हाई स्कूल तक ही हुई। उन्होंने आगे हिंदी, संस्कृत और बांग्ला का स्वतंत्र अध्ययन किया। बांग्ला साहित्य का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका अध्ययन गहन और बहुआयामी रहा, जिसने उनके साहित्य को वैचारिक दृढ़ता प्रदान की।
पारिवारिक जीवन और संघर्ष
निराला का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा—
- तीन वर्ष की आयु में माता का निधन
- युवावस्था में पिता का देहांत
- पत्नी मनोहरा देवी और पुत्री सरोज—दोनों का असमय निधन
- 1918 की स्पैनिश फ्लू महामारी में परिवार के कई सदस्यों का निधन
पुत्री सरोज की कम उम्र में मृत्यु ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। इसी शोक से जन्मी उनकी कालजयी रचना ‘सरोज-स्मृति’ हिंदी कविता की सबसे मार्मिक और श्रेष्ठ शोक-कविताओं में मानी जाती है।
साहित्यिक जीवन और छायावाद में योगदान
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा के साथ छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में गिना जाता है।
उन्होंने कविता को छंदों की जकड़न से मुक्त कर मुक्त छंद का प्रयोग किया, जिससे हिंदी कविता में नई ऊर्जा और आधुनिकता आई।
मुक्त छंद के प्रवर्तक
निराला ने भाव, अनुभूति और विचार को प्राथमिकता देते हुए कविता को स्वाभाविक लय प्रदान की। यह प्रयोग हिंदी कविता के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन सिद्ध हुआ।
प्रमुख काव्य कृतियाँ
निराला की प्रमुख काव्य-रचनाएँ निम्नलिखित हैं—
- अनामिका
- परिमल
- गीतिका
- तुलसीदास
- कुकुरमुत्ता
- अणिमा
- बेला
- नए पत्ते
- अर्चना
- आराधना
- सांध्य काकली
- अपरा (गीतों का संग्रह)
दीर्घ एवं प्रसिद्ध कविताएँ
- राम की शक्ति पूजा
- सरोज-स्मृति
- बादल राग
- तुलसीदास
गद्य साहित्य (उपन्यास, कहानी, निबंध)
निराला का गद्य भी उतना ही प्रभावशाली है—
उपन्यास
- कुल्ली भाट
- बिल्लेसुर बकरिहा
कहानी संग्रह
- लिली
- सखी
- सुकुल की बीवी
उनकी गद्य रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, व्यंग्य और मानवीय संवेदना का प्रखर रूप मिलता है।
अनुवाद और संपादन
निराला ने संस्कृत, बांग्ला और अवधी की अनेक रचनाओं का खड़ी बोली हिंदी में अनुवाद किया।
उन्होंने निम्न पत्रिकाओं का संपादन किया—
- समन्वय (कोलकाता)
- मतवाला (कोलकाता)
- सुधा (लखनऊ)
व्यक्तित्व और विचारधारा
निराला स्वाभिमानी, विद्रोही और स्वतंत्र चेतना के कवि थे। कठिन परिस्थितियों में भी उन्होंने समझौते का मार्ग नहीं अपनाया।
उनकी कविता में—
- शोषित-वंचित के प्रति करुणा
- सामाजिक अन्याय का विरोध
- आत्मसम्मान और मानवीय मूल्य
- विद्रोह और सौंदर्य—सब एक साथ मिलते हैं।
निधन
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद (प्रयागराज) में बिताया।
15 अक्टूबर 1961 को दारागंज, प्रयागराज में उनका निधन हो गया।
