रतन नाथ ‘सरशार’ (1846/47 – 1903) उर्दू साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रभावशाली और इतिहास-निर्माता उपन्यासकार, व्यंग्यकार, स्तंभकार और संपादक माने जाते हैं। उर्दू कथा-साहित्य में आधुनिक उपन्यास विधा के विकास में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण है कि उन्हें उर्दू उपन्यास का प्रारम्भिक निर्माता, फसाना-ए-आज़ाद का सर्जक और लखनऊ की तहज़ीब का श्रेष्ठ चित्रकार कहा जाता है।
उन्होंने उर्दू साहित्य को हास्य, व्यंग्य, सामाजिक आलोचना, संस्कृतिक चित्रण और जीवंत पात्रों से समृद्ध किया। उनका लिखा हुआ प्रसिद्ध उपन्यास फ़साना-ए-आज़ाद लोकप्रियता की ऊँचाइयों तक पहुँचा और उर्दू साहित्य में मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
1. जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन
- पूरा नाम : पंडित रतन नाथ धर ‘सरशार’
- जन्म : 05 जून 1846 (कुछ स्रोत 1847 भी बताते हैं)
- जन्मस्थान : लखनऊ, उत्तर प्रदेश
- वंश : कश्मीरी पंडित परिवार
- पिता : पंडित बेज़ नाथ धर (कश्मीरी व्यापारी)
- माता : नाम उपलब्ध नहीं, पर जीवनभर संघर्ष करने वाली धार्मिक और सशक्त महिला
सरशार के पिता का निधन तब हो गया जब वे मात्र चार वर्ष के थे। पिता की मृत्यु और आर्थिक अभावों के कारण परिवार कठिनाइयों से गुज़रा और उनका पालन-पोषण पूरी तरह उनकी माँ ने किया।
2. प्रारंभिक शिक्षा और भाषागत दक्षता
सरशार की शुरुआती शिक्षा स्थानीय मकतब में हुई, जहाँ उन्होंने—
- अरबी
- फ़ारसी
- धार्मिक साहित्य
- दास्तानें
- मुहावरे और शायरी
गहराई से सीखी।
इसके बाद उन्होंने कैनिंग कॉलेज, लखनऊ (बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय) में पढ़ाई आरंभ की, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों और निजी परिस्थितियों के कारण वे कॉलेज की डिग्री पूरी न कर सके।
शिक्षा अधूरी रह गई, लेकिन ज्ञान का अकाल कभी नहीं पड़ा, क्योंकि वे जीवनभर किताबों के बेहद शौकीन रहे।
3. करियर की शुरुआत – शिक्षक से संपादक तक
कॉलेज छोड़ने के बाद उन्होंने—
- एक जिला स्कूल में शिक्षक के रूप में नौकरी की
- कई स्थानीय अख़बारों में लेख भेजने शुरू किए
- सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषयों पर नियमित लिखना आरंभ किया
उनके शुरुआती लेख इन पत्रों में छपे—
- अवध पंच
- मरासल-ए-कश्मीर
- मुराआत-उल-हिंद
- रियाज़-उल-अख़बार
उनकी भाषा, शैली और तीक्ष्ण बुद्धि ने उन्हें जल्दी ही साहित्य जगत में पहचान दिला दी।
4. अवध अख़बार के संपादक — साहित्यिक जीवन का मोड़
1878 में मुंशी नवलकिशोर ने जब अवध अख़बार शुरू किया, तो रतन नाथ सरशार को उसका एडिटर (Editor) नियुक्त किया गया।
यहीं से उनकी साहित्यिक यात्रा ने ऐतिहासिक मोड़ लिया क्योंकि—
👉 उनकी महान कृति “फ़साना-ए-आज़ाद” की धारावाहिक किस्तें इसी अख़बार में छपनी शुरू हुईं।
उनका लेखन इतना लोकप्रिय हुआ कि लोग अख़बार केवल उनकी किस्तें पढ़ने के लिए खरीदने लगे।
5. फ़साना-ए-आज़ाद — उर्दू साहित्य का क्रांतिकारी उपन्यास
पाँच वर्षों (1878–1883) में धारावाहिक रूप में प्रकाशित।
मुख्य बिंदु—
- 3000+ पृष्ठों का विशाल उपन्यास
- नायक आज़ाद और उसके साथी खोजी के साहसिक किस्से
- लखनऊ की पतनशील, रंगीन, हास्य-व्यंग्यपूर्ण तहज़ीब का यथार्थ चित्रण
- शैली में हास्य, व्यंग्य, संवाद, सामाजिक आलोचना का अनोखा मिश्रण
- डॉन क्विक्ज़ोट और पिकविक पेपर्स से प्रेरणा
- दास्तान शैली और यूरोपीय उपन्यास शैली का संगम
फ़साना-ए-आज़ाद ने उन्हें—
- उर्दू उपन्यास का अग्रदूत
- उच्च कोटि का हास्य-व्यंग्यकार
- लखनऊ की संस्कृति का जीवंत चितेरा
बना दिया।
प्रेमचंद ने इसे हिंदी में “आज़ाद कथा” नाम से अनूदित किया।
बाद में दूरदर्शन पर शरद जोशी द्वारा लिखित TV शो “वाह जनाब” भी इसी पर आधारित था।
6. लखनऊ की तहज़ीब — सरशार की गहरी पकड़
सरशार को मुस्लिम समाज, उनकी—
- तहज़ीब
- बोलचाल
- रीति-रिवाज
- रहन-सहन
- मुहावरे
- नैतिकता
से अत्यंत लगाव था।
इसी कारण उनकी रचनाओं में लखनवी अदब और नफ़ासत का असली रूप दिखाई देता है।
उनके किरदार—
- खोजी — अतीत का प्रतिनिधि
- आज़ाद — आधुनिकता का प्रतीक
दोनों मिलकर पतनशील समाज, लखनऊ की बदलती संस्कृति और समाज-सुधार की आवश्यकता को उजागर करते हैं।
7. सरशार का व्यक्तित्व – हास्यप्रिय, बेपरवाह और प्रतिभाशाली
- वे अत्यंत हाज़िरजवाब, हास्यप्रिय और मिलनसार थे।
- शराब और कबाब के अत्यधिक शौक़ीन होने के कारण उनका जीवन कुछ असंयमित भी रहा।
- लेकिन इसके बावजूद उनका लेखन हमेशा जीवंत, शक्तिशाली और ईमानदार रहा।
- उन्होंने सामाजिक बुराइयों और पतन का हास्य के माध्यम से चित्रण किया, व्यंग्य कम किया।
- उन्होंने उपहास नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना पैदा की।
8. हैदराबाद प्रवास — अंतिम वर्षों की साहित्यिक गतिविधि
1895 में वे अवध अख़बार छोड़कर—
👉 हैदराबाद में महाराजा किशन प्रसाद के निमंत्रण पर चले गए।
यहाँ—
- वे महाराजा के साहित्यिक सुधारक, सलाहकार और काव्य-गद्य प्रशिक्षक बने।
- उन्होंने दबदबा-ए-आसफी नामक पत्र का संपादन किया।
- यहीं उनका अंतिम समय बीता।
9. मृत्यु
- तिथि : 21 जनवरी 1903
- स्थान : हैदराबाद
- मृत्यु का कारण — अत्यधिक मद्यपान
उनकी मृत्यु के साथ ही उर्दू साहित्य का एक शानदार, चमकदार और बहुआयामी अध्याय समाप्त हो गया।
10. रचनाएँ (Works of Ratan Nath Sarshar)
⭐ प्रमुख उपन्यास
- फ़साना-ए-आज़ाद — शाहकार
- जाम-ए-सरशार — विरोधी शैली
- सैर-ए-कोहसार — दो खंडों में
- गोर-ए-ग़रीबाँ — अधूरा
- ख़ुदाई फ़ौजदार — डॉन क्विक्ज़ोट का उर्दू अनुवाद
⭐ अन्य रचनाएँ
- शम्स-उल-जुहा
- आमाल-नामा-ए-रूस
- कामिनी
- अलिफ़-लैला (अनुवाद)
- कई संपादकीय लेख, स्तंभ और निबंध
11. साहित्य में रतन नाथ सरशार का स्थान
उर्दू साहित्य में सरशार का स्थान अत्यंत ऊँचा है—
- उर्दू उपन्यास विधा के अग्रदूत
- लखनऊ की तहज़ीब के श्रेष्ठ चित्रकार
- समाज-सुधारक और व्यंग्य-हास्य के माहिर
- चरित्र-निर्माण में अप्रतिम कौशल
- उर्दू गद्य शैली के विकास में निर्णायक योगदान
इतिहासकार राम बाबू सक्सेना उन्हें “19वीं सदी के अंतिम दशक का सबसे उल्लेखनीय व्यक्ति” बताते हैं।
