प्रस्तावना
डॉ. रामकुमार वर्मा (1905–1990) आधुनिक हिंदी साहित्य के उन विशिष्ट रचनाकारों में से हैं जिन्होंने कविता, एकांकी, आलोचना, निबंध और साहित्य-इतिहास—सभी विधाओं में अमिट योगदान दिया। वे हिंदी में एकांकी नाटक के जनक माने जाते हैं और इसी कारण उन्हें “एकांकी सम्राट” की उपाधि प्राप्त हुई। उनके साहित्य में छायावाद और रहस्यवाद का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म 15 सितंबर 1905 को सागर (मध्य प्रदेश) में हुआ।
- पिता: लक्ष्मी प्रसाद वर्मा (डिप्टी कलेक्टर)
- माता: श्रीमती राजरानी देवी (स्वयं एक प्रतिभाशाली कवयित्री)
बचपन में उन्हें स्नेहपूर्वक “कुमार” कहा जाता था। उनका पालन-पोषण साहित्यिक और संस्कारवान वातावरण में हुआ, जिससे उनमें प्रारंभ से ही अध्ययन, कला और सृजनशीलता के संस्कार विकसित हुए।
बचपन और व्यक्तित्व विकास
रामकुमार वर्मा बचपन से ही अत्यंत मेधावी थे और प्रायः कक्षा में प्रथम आते थे।
- उन्हें अभिनय और रंगमंच में विशेष रुचि थी
- विद्यार्थी जीवन में कई नाटकों में सफल अभिनेता के रूप में अभिनय किया
- कविता, संगीत और ललित कलाओं में उनकी गहरी अभिरुचि थी
17 वर्ष की आयु में उन्होंने एक कविता प्रतियोगिता में 51 रुपये का पुरस्कार जीता—यहीं से उनके साहित्यिक जीवन की वास्तविक शुरुआत मानी जाती है।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा: घर पर माता से
- स्नातकोत्तर शिक्षा: प्रयाग विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. (प्रथम स्थान)
- शोध उपाधि: नागपुर विश्वविद्यालय से
👉 “हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास” विषय पर पीएचडी
उनकी शोध-कृति आज भी हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन में एक प्रामाणिक ग्रंथ मानी जाती है।
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
1921–22 के समय जब असहयोग आंदोलन की लहर उठी, तब रामकुमार वर्मा भी राष्ट्रसेवा से जुड़े।
उन्होंने पढ़ाई कुछ समय के लिए स्थगित कर राष्ट्रीय कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय भूमिका निभाई। यह राष्ट्रचेतना आगे चलकर उनके साहित्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
साहित्यिक योगदान का परिचय
1. कवि के रूप में
रामकुमार वर्मा की कविता में—
- छायावाद की कोमल कल्पना
- रहस्यवाद की दार्शनिक गहराई
- सौंदर्य, आत्मा और अनुभूति की सूक्ष्म अभिव्यक्ति
प्रमुख काव्य कृतियाँ
- वीर हमीर (1922)
- चित्तौड़ की चिंता (1929)
- अंजलि (1930)
- निशीथ (1935)
- चित्ररेखा (1936) – देव पुरस्कार से सम्मानित
- जौहर (1941)
भगवतीचरण वर्मा के अनुसार —
“रहस्यवाद को समझने के लिए ‘चित्ररेखा’ से श्रेष्ठ कोई काव्य-ग्रंथ नहीं।”
2. एकांकीकार – “एकांकी सम्राट”
डॉ. रामकुमार वर्मा को हिंदी एकांकी नाटक का जनक माना जाता है।
- उन्होंने 150 से अधिक एकांकी लिखे
- ऐतिहासिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विषयों पर सशक्त लेखन
प्रमुख एकांकी एवं संग्रह
- बादलों की मृत्यु (1930) – पहला एकांकी
- पृथ्वीराज की आँखें (1938)
- रेशमी टाई (1941)
- सप्त किरण (एकांकी संग्रह)
- रूपरंग
- चार ऐतिहासिक एकांकी
3. आलोचक एवं साहित्य-इतिहासकार
डॉ. रामकुमार वर्मा हिंदी के प्रमुख आलोचकों में से एक थे।
उनका ग्रंथ—
- हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (1939)
हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन में मील का पत्थर माना जाता है।
इसमें कबीर, भक्ति, रीति और आधुनिक काव्य पर गहन विवेचन है।
अध्यापन एवं शैक्षणिक सेवाएँ
- प्रयाग विश्वविद्यालय
- हिंदी विभाग में प्राध्यापक
- बाद में विभागाध्यक्ष
अंतरराष्ट्रीय योगदान
- मास्को विश्वविद्यालय (सोवियत संघ) – हिंदी अध्यापन
- त्रिभुवन विश्वविद्यालय (नेपाल) – शिक्षा सहायक
- श्रीलंका – भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष
उन्होंने विदेशों में हिंदी भाषा और साहित्य का गौरवपूर्ण प्रचार किया।
पुरस्कार एवं सम्मान
- पद्म भूषण – 1963
- देव पुरस्कार – ‘चित्ररेखा’ के लिए
- अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन पुरस्कार
- डी.लिट. – मूर विश्वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड
- मध्य प्रदेश शासन से ‘विजयपर्व’ नाटक पर प्रथम पुरस्कार
भाषा और साहित्य पर विचार
डॉ. रामकुमार वर्मा हिंदी के प्रति गहन आस्था रखते थे। उनका प्रसिद्ध कथन—
“जिस देश के पास हिंदी जैसी मधुर भाषा है, वह अंग्रेज़ी के पीछे दीवाना क्यों है?”
यह कथन उनके भाषा-स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना को दर्शाता है।
निधन
डॉ. रामकुमार वर्मा का निधन 1990 ई. में हुआ।
उनके निधन से हिंदी साहित्य, विशेषकर एकांकी नाटक परंपरा, को अपूरणीय क्षति पहुँची।
