जीवन परिचय
परमानन्द श्रीवास्तव हिंदी साहित्य के उन विशिष्ट साहित्यकारों में शामिल हैं जिन्होंने आलोचना को केवल ग्रंथों की व्याख्या तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक, ऐतिहासिक और मानवीय चेतना से जोड़ा। वे हिंदी के शीर्ष आलोचकों में गिने जाते हैं। उनकी आलोचना में वैचारिक गहराई, ऐतिहासिक दृष्टि और समकालीन समाज के प्रति गहरी प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है।
वे केवल आलोचक ही नहीं, बल्कि संवेदनशील कवि, कहानीकार, निबंधकार और संपादक भी थे। हिंदी आलोचना को उन्होंने अकादमिक जड़ता से मुक्त कर जीवंत, संवादात्मक और वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया।
आलोचना के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें व्यास सम्मान (2006) और भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
परमानन्द श्रीवास्तव का जन्म 10 फ़रवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के बाँसगाँव में हुआ। उनका बचपन और प्रारंभिक जीवन एक साधारण ग्रामीण परिवेश में बीता।
ग्रामीण समाज की संरचना, वहाँ की सामाजिक विषमताएँ और मानवीय संघर्ष उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक दृष्टि को गहराई से प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि उनकी आलोचना और कविता में मनुष्य की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीद बराबर उपस्थित रहती है।
शिक्षा और बौद्धिक निर्माण
परमानन्द श्रीवास्तव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पैतृक गाँव में पूर्ण करने के बाद सेंट एंड्रूज़ कॉलेज, गोरखपुर से
- स्नातक (B.A.)
- परास्नातक (M.A.)
- डॉक्टरेट (Ph.D.)
की उपाधियाँ प्राप्त कीं।
उनकी उच्च शिक्षा ने उन्हें मार्क्सवादी, आधुनिकतावादी और मानवतावादी चिंतन से गहराई से परिचित कराया, जिसका प्रभाव आगे चलकर उनकी आलोचना और कविता में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
शैक्षणिक जीवन और अध्यापन
शिक्षा पूर्ण करने के बाद परमानन्द श्रीवास्तव ने सेंट एंड्रूज़ कॉलेज, गोरखपुर में प्रवक्ता के रूप में अध्यापन कार्य आरंभ किया। बाद में वे गोरखपुर विश्वविद्यालय से जुड़ गए और वहीं से हिंदी विभाग के आचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए।
गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रेमचंद पीठ की स्थापना में उनका विशेष योगदान रहा। यह पीठ हिंदी साहित्य, विशेषकर प्रेमचंद के साहित्य और विचारधारा के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनी।
संपादन और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ाव
परमानन्द श्रीवास्तव ने हिंदी की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘आलोचना’ का संपादन किया।
इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने
- नई आलोचना को मंच दिया
- युवा रचनाकारों और आलोचकों को प्रोत्साहित किया
- हिंदी आलोचना को वैचारिक बहसों से जोड़ा
उनका संपादकीय कार्य हिंदी आलोचना के विकास में मील का पत्थर माना जाता है।
साहित्यिक यात्रा और वैचारिक दृष्टि
परमानन्द श्रीवास्तव ने साहित्यिक लेखन की शुरुआत कविता से की, लेकिन उनकी पहचान मुख्यतः आलोचक के रूप में बनी।
उनकी आलोचना का केंद्र बिंदु रहा—
- साहित्य और समाज का संबंध
- रचना प्रक्रिया
- भाषा और शिल्प
- आधुनिकता और उत्तर-आधुनिक समय के संकट
वे आलोचना को रचनात्मक संवाद मानते थे, न कि केवल निर्णयात्मक टिप्पणी।
कविता में योगदान
कविता के क्षेत्र में परमानन्द श्रीवास्तव ने समकालीन मनुष्य के संकटों, पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा पैदा किए गए अंधेरे समय और मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को गहराई से रेखांकित किया।
उनकी कविताएँ जातीय पहचान, सामाजिक चेतना और मानवीय संवेदना से भरपूर हैं।
कविता संग्रह
- उजली हँसी के छोर पर (1960)
- अगली शताब्दी के बारे में (1981)
- चौथा शब्द (1993)
- एक अनायक का वृत्तांत (2004)
कहानी लेखन
यद्यपि उनकी पहचान आलोचक और कवि के रूप में अधिक है, फिर भी कहानी लेखन में भी उन्होंने समय, स्मृति और ठहराव को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
कहानी संग्रह
- रुका हुआ समय (2005)
हिंदी आलोचना में योगदान
परमानन्द श्रीवास्तव हिंदी आलोचना के सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों में माने जाते हैं। उनकी आलोचनात्मक कृतियाँ हिंदी साहित्य के अध्ययन के लिए अनिवार्य मानी जाती हैं।
प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ
- नयी कविता का परिप्रेक्ष्य (1965)
- हिन्दी कहानी की रचना प्रक्रिया (1965)
- कवि कर्म और काव्यभाषा (1975)
- उपन्यास का यथार्थ और रचनात्मक भाषा (1976)
- जैनेन्द्र के उपन्यास (1976)
- समकालीन कविता का व्याकरण (1980)
- समकालीन कविता का यथार्थ (1980)
- जायसी (1981)
- निराला (1985)
- शब्द और मनुष्य (1988)
- उपन्यास का पुनर्जन्म (1995)
- कविता का अर्थात् (1999)
- कविता का उत्तरजीवन (2004)
डायरी और निबंध
उनकी डायरी और निबंधों में आत्मचिंतन, समय-बोध और सामाजिक प्रश्नों पर गहरी दृष्टि मिलती है।
अन्य रचनाएँ
- डायरी: एक विस्थापित की डायरी (2005)
- निबंध: अँधेरे कुएँ से आवाज़ (2005)
साहित्यिक शैली और विशेषताएँ
परमानन्द श्रीवास्तव की आलोचना की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
- गहरी वैचारिक स्पष्टता
- भाषा की सादगी और संप्रेषणीयता
- साहित्य और समाज के द्वंद्व को समझने की क्षमता
- मानवीय संवेदना के प्रति प्रतिबद्धता
वे आलोचना को रचनात्मक कर्म मानते थे, न कि केवल मूल्यांकन की प्रक्रिया।
पुरस्कार और सम्मान
परमानन्द श्रीवास्तव को उनके साहित्यिक और आलोचनात्मक योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
- व्यास सम्मान (2006)
- भारत भारती पुरस्कार (2006)
निधन
लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे परमानन्द श्रीवास्तव को रक्त शर्करा अनियंत्रित होने के कारण गोरखपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ 5 नवम्बर 2013 को उनका निधन हो गया।
उनके निधन से हिंदी साहित्य, विशेषकर हिंदी आलोचना को अपूरणीय क्षति हुई।
