जीवन परिचय
केदारनाथ अग्रवाल (1911–2000) हिंदी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के ऐसे विशिष्ट कवि हैं जिन्होंने कविता को जनता के संघर्ष, श्रम, प्रकृति और सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। वे पेशे से वकील थे, किंतु मन और कर्म से पूर्णतः कवि। उनकी कविता में बुंदेलखंड की मिट्टी की सोंधी गंध, श्रमजीवी जीवन की पीड़ा और आशा—तीनों एक साथ उपस्थित हैं।
केदारनाथ अग्रवाल को जनकवि कहा जाता है क्योंकि उनकी रचनाएँ आम आदमी की आवाज़ बनकर उभरती हैं।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
- जन्म तिथि: 1 अप्रैल 1911
- जन्म स्थान: कमासिन गाँव, बाँदा जिला, उत्तर प्रदेश
- पिता: हनुमान प्रसाद अग्रवाल
- माता: घसिट्टो देवी
केदारनाथ अग्रवाल का जन्म एक मध्यवर्गीय वैश्य परिवार में हुआ। उनके पिता स्वयं कवि थे और उनका काव्य-संग्रह ‘मधुरिम’ प्रकाशित हुआ था। काव्य-संस्कार उन्हें विरासत में मिले।
उनका बचपन ग्रामीण बुंदेलखंड के वातावरण में बीता, जहाँ प्रकृति, खेत-खलिहान, श्रमिक जीवन और सामूहिकता ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा: कमासिन गाँव
- आगे की पढ़ाई: रायबरेली, कटनी, जबलपुर
- बी.ए.: इलाहाबाद विश्वविद्यालय
- क़ानूनी शिक्षा (LLB): कानपुर
इलाहाबाद का साहित्यिक वातावरण और प्रगतिशील विचारधारा उनके बौद्धिक विकास में निर्णायक सिद्ध हुआ।
विवाह एवं पारिवारिक जीवन
विद्यालयी जीवन के दौरान ही उनका विवाह हुआ। पारिवारिक दायित्वों के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा पूरी की और साहित्य-साधना को कभी नहीं छोड़ा। जीवन भर वे सादगी, ईमानदारी और आत्मसम्मान के साथ जिए।
आजीविका: वकालत और जन-सरोकार
1938 से केदारनाथ अग्रवाल ने बाँदा में वकालत प्रारंभ की।
- 1963–1970 तक वे सरकारी वकील भी रहे
- वकालत के दौरान उन्होंने गरीब, पीड़ित और शोषित वर्ग को निकट से देखा
यही अनुभव उनकी कविता की आत्मिक शक्ति बने। अदालत, किसान, मजदूर और गाँव—सब उनकी कविता में जीवित हो उठते हैं।
साहित्यिक जीवन का आरंभ
केदारनाथ अग्रवाल की काव्य-यात्रा लगभग 1930 से आरंभ मानी जाती है।
उनका पहला काव्य-संग्रह—
👉 ‘युग की गंगा’ (1947)
स्वतंत्रता-पूर्व भारत की सामाजिक-राजनीतिक चेतना का एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।
काव्य-धारा और वैचारिक दृष्टि
प्रगतिशील काव्यधारा
केदारनाथ अग्रवाल ने मार्क्सवादी दर्शन को जीवन और कविता का आधार बनाया।
उनकी कविता में—
- श्रमजीवी जनता के प्रति गहरी आस्था
- सत्ता, शोषण और अन्याय का निर्भीक विरोध
- स्वतंत्रता के बाद भी जन-दमन पर तीखी टिप्पणी
वे उन प्रगतिशील कवियों में थे जिन्होंने सत्ता-समर्थन के बजाय जन-पक्षधरता को चुना।
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—
“भजन का नहीं मैं भुजा का प्रतापी”
उनकी वैचारिक दृढ़ता का घोष है।
काव्य-विशेषताएँ
- लोकजीवन से जुड़ी भाषा
- ठेठ बुंदेली शब्दावली
- सशक्त बिंब और दृश्यात्मकता
- संगीतात्मकता
- प्रकृति और मानव-श्रम का अद्भुत संयोजन
उनकी कविता नारे नहीं लगाती, बल्कि जीवन को उसकी पूरी सच्चाई के साथ प्रस्तुत करती है।
बुंदेलखंड और प्रकृति-चित्रण
केदारनाथ अग्रवाल हिंदी के उन दुर्लभ कवियों में हैं जिन्होंने प्रकृति को रोमानी नहीं, श्रमशील रूप में चित्रित किया—
- खेत
- नदियाँ
- पत्थर
- धूप
- किसान और मजदूर
प्रकृति उनके यहाँ मानव-सहचरी बन जाती है।
प्रमुख काव्य-संग्रह
मुख्य कृतियाँ
- युग की गंगा (1947)
- नींद के बादल (1947)
- लोक और आलोक (1957)
- फूल नहीं, रंग बोलते हैं (1965)
- आग का आइना (1970)
- पंख और पतवार (1979)
- हे मेरी तुम! (1981)
- मार प्यार की थापें (1981)
- कहे केदार खरी-खरी (1983)
- जमुन जल तुम (1984)
- बोले बोल अबोल (1985)
- आत्मगंध (1988)
- अनहारी हरियाली (1990)
- वसंत में प्रसन्न हुई पृथ्वी (1996)
अन्य साहित्यिक विधाएँ
- उपन्यास: पतिया, बैल बाजी मार ले गए
- यात्रा-वृत्तांत: बस्ती खिले गुलाबों की
- निबंध: समय-समय पर, विचार-बोध, विवेक-विवेचन
उनकी कई रचनाएँ अंग्रेज़ी, रूसी और जर्मन भाषाओं में अनूदित हुईं।
परिमल प्रकाशन से संबंध
केदारनाथ अग्रवाल की अधिकांश प्रमुख कृतियाँ इलाहाबाद के परिमल प्रकाशन से प्रकाशित हुईं।
प्रकाशक शिवकुमार सहाय से उनका संबंध अत्यंत आत्मीय था। उन्होंने बड़े प्रकाशकों के प्रस्ताव ठुकराकर परिमल के प्रति निष्ठा बनाए रखी—यह उनके साहित्यिक चरित्र का परिचायक है।
सम्मान एवं पुरस्कार
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1973) – फूल नहीं, रंग बोलते हैं
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1986)
- तुलसी सम्मान
- मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार
- हिन्दी संस्थान पुरस्कार
- डी.लिट. (बुंदेलखंड विश्वविद्यालय)
- साहित्य वाचस्पति (हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग)
अंतिम समय और निधन
- निधन: 22 जून 2000
- आयु: 90 वर्ष
लगभग नौ दशकों तक उन्होंने कविता को जीवन-धर्म की तरह जिया। उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति था।
