जोश मलीहाबादी का जन्म 5 दिसंबर 1898 को मलीहाबाद, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था। वे एक ऐसे परिवार में जन्मे जहाँ शायरी पीढ़ियों से चली आ रही थी।
उनके पिता, दादा और परदादा—तीनों शायर थे और साहिब-ए-दीवान माने जाते थे। इस प्रकार कविता और साहित्य जोश के लिए विरासत के रूप में मिला। बचपन से ही वे भाषा, लय और शब्दों की शक्ति से परिचित हो गए थे।
उनके पिता का नाम बशीर अहमद खान था। 1916 में पिता की मृत्यु ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया और उनकी औपचारिक शिक्षा में भी बाधा उत्पन्न हुई।
शिक्षा और बौद्धिक विकास
जोश मलीहाबादी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद सेंट पीटर्स कॉलेज, आगरा में अध्ययन किया।
उन्होंने 1914 में सीनियर कैम्ब्रिज परीक्षा उत्तीर्ण की।
इसके साथ-साथ उन्होंने:
- अरबी और फ़ारसी का गहन अध्ययन किया
- उर्दू व्याकरण और शास्त्रीय साहित्य पर असाधारण पकड़ बनाई
कुछ समय के लिए वे रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन भी रहे। यहाँ रहकर उनके विचारों में मानवतावाद, स्वतंत्रता और वैश्विक चेतना का विस्तार हुआ। हालांकि पिता की मृत्यु के कारण वे उच्च शिक्षा पूरी नहीं कर सके, लेकिन स्वाध्याय और अनुभवों ने उन्हें असाधारण विद्वान बना दिया।
साहित्यिक जीवन की शुरुआत
जोश मलीहाबादी ने बहुत कम उम्र में शायरी लिखना शुरू कर दिया था। उनकी कविताओं में आरंभ से ही:
- जोश
- विद्रोह
- ओज
- राष्ट्रप्रेम
स्पष्ट दिखाई देता है।
उनका पहला काव्य-संग्रह 1921 में प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें उर्दू साहित्य में एक नई पहचान दिलाई।
पेशेवर जीवन और क्रांतिकारी लेखन
हैदराबाद और निष्कासन
1925 में जोश मलीहाबादी ने उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद में अनुवाद विभाग में कार्य शुरू किया। लेकिन वहाँ उन्होंने एक ऐसी नज़्म लिख दी, जो रियासत के शासक के विरुद्ध थी। परिणामस्वरूप उन्हें हैदराबाद से निष्कासित कर दिया गया।
पत्रिका “कलीम”
इसके बाद उन्होंने उर्दू पत्रिका “कलीम” की स्थापना की।
इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने:
- ब्रिटिश शासन का खुला विरोध किया
- स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया
यहीं से उनकी पहचान एक क्रांतिकारी कवि के रूप में स्थापित हो गई और वे “शायर-ए-इंक़लाब” कहलाने लगे।
उनके जवाहरलाल नेहरू सहित कई राष्ट्रीय नेताओं से घनिष्ठ संबंध बने।
स्वतंत्र भारत और संपादन कार्य
भारत की स्वतंत्रता के बाद जोश मलीहाबादी “आज-कल” पत्रिका के संपादक बने। इस दौर में भी उन्होंने सत्ता, समाज और व्यवस्था पर बेबाक लेखन जारी रखा।
पाकिस्तान जाने का निर्णय
हालाँकि नेहरू के आग्रह के बावजूद, जोश मलीहाबादी 1958 में पाकिस्तान चले गए।
उनका मानना था कि:
- भारत में हिंदी को अधिक महत्व मिलेगा
- उर्दू भाषा का भविष्य अनिश्चित हो जाएगा
पाकिस्तान जाकर वे कराची और बाद में इस्लामाबाद में बसे। वहाँ उन्होंने मौलवी अब्दुल हक के साथ मिलकर अंजुमन-ए-तरक्की-ए-उर्दू के लिए कार्य किया।
शायरी की विशेषताएँ और साहित्यिक योगदान
जोश मलीहाबादी को:
- “शब्दों का बादशाह”
- उर्दू व्याकरण का महान आचार्य
माना जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
- ओजस्वी और गर्जनात्मक भाषा
- विशाल शब्द-भंडार
- क्रांतिकारी चेतना
- प्रकृति और सौंदर्य का भव्य चित्रण
रचनात्मक विस्तार
- 1 लाख से अधिक शेर/कविताएँ
- 1000 से अधिक रुबाइयाँ
- ग़ज़लें, नज़्में, मरसिए, गीत
प्रमुख काव्य-संग्रह
जोश मलीहाबादी की प्रमुख रचनाएँ हैं:
- शोला-ओ-शबनम
- जुनून-ओ-हिकमत
- फ़िक्र-ओ-निशात
- सुंबल-ओ-सलासल
- हर्फ़-ओ-हिकायत
- सरोद-ओ-ख़रोश
- इरफ़ानियत-ए-जोश
उन्होंने फिल्मों के लिए गीत भी लिखे और कुछ समय पुणे में भी रहे।
आत्मकथा – यादों की बारात
जोश मलीहाबादी की आत्मकथा “यादों की बारात” उर्दू साहित्य की सबसे प्रसिद्ध आत्मकथाओं में मानी जाती है।
यह पुस्तक अपनी:
- ईमानदारी
- निर्भीकता
- आत्मस्वीकृति
के लिए जानी जाती है।
पुरस्कार और सम्मान
- पद्म भूषण (1954) – भारत सरकार द्वारा
- उर्दू साहित्य में अंतरराष्ट्रीय सम्मान और प्रतिष्ठा
यह विशेष तथ्य है कि पाकिस्तान जाने के बावजूद भारत ने उन्हें सम्मानित किया।
मृत्यु
जोश मलीहाबादी का निधन 22 फरवरी 1982 को इस्लामाबाद में हुआ।
