जीवन परिचय
गिरिजाकुमार माथुर (1919–1994) आधुनिक हिंदी साहित्य के उन सशक्त रचनाकारों में हैं जिन्होंने कविता, नाटक, गीत और आलोचना—चारों क्षेत्रों में समान अधिकार के साथ योगदान दिया। वे प्रयोगवाद और नई कविता आंदोलन के प्रमुख स्तंभ, अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ के कवि तथा हिंदी कविता को आधुनिक संवेदना से जोड़ने वाले रचनाकार थे। उनका प्रसिद्ध गीत “छाया मत छूना मन” और विश्वविख्यात गीत “We Shall Overcome” का हिंदी भावानुवाद “हम होंगे कामयाब” उन्हें जन-जन तक पहुँचाता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
- जन्म: 22 अगस्त 1919
- जन्म स्थान: अशोकनगर, मध्य प्रदेश
- पिता: देवीचरण माथुर — स्कूल अध्यापक, साहित्य और संगीत प्रेमी, कवि एवं सितार-वादक
- माता: लक्ष्मी देवी — शिक्षित एवं संस्कारशील
गिरिजाकुमार माथुर को साहित्यिक वातावरण विरासत में मिला। पिता द्वारा घर पर ही इतिहास, भूगोल और अंग्रेजी पढ़ाए जाने से उनकी बौद्धिक नींव अत्यंत सुदृढ़ हुई।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा: घर पर तथा झांसी में
- इंटरमीडिएट के बाद: विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर
- बी.ए. (1938)
- एम.ए. (अंग्रेजी, 1941) — लखनऊ विश्वविद्यालय
- एल.एल.बी. — विधि की शिक्षा भी प्राप्त
उनकी शिक्षा में पाश्चात्य साहित्य और भारतीय परंपरा—दोनों का संतुलित प्रभाव दिखाई देता है।
वैवाहिक जीवन
- विवाह: 1940
- पत्नी: शकुंत माथुर
वे अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ की प्रथम कवयित्री थीं। यह दांपत्य हिंदी साहित्य के दो सृजनशील व्यक्तित्वों का संगम था।
पेशेवर जीवन
शिक्षा पूर्ण करने के बाद प्रारंभ में उन्होंने वकालत की, किंतु शीघ्र ही उनका झुकाव रचनात्मक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र की ओर हो गया।
आकाशवाणी और दूरदर्शन
- 1943 से ऑल इंडिया रेडियो (दिल्ली) में विभिन्न महत्वपूर्ण पद
- हिंदी को अंग्रेजी-उर्दू के प्रभुत्व के बीच पहचान दिलाने में योगदान
- ‘विविध भारती’ जैसे लोकप्रिय रेडियो चैनल की संकल्पना में अहम भूमिका
- बाद में दूरदर्शन में उच्च पदों पर कार्य
- उप-महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्ति (1978)
साहित्यिक जीवन की शुरुआत
गिरिजाकुमार माथुर की साहित्यिक यात्रा 1934 में ब्रजभाषा के कवित्त-सवैया लेखन से शुरू हुई।
वे प्रारंभ में—
- माखनलाल चतुर्वेदी
- बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’
जैसे विद्रोही और राष्ट्रवादी कवियों से प्रभावित रहे।
उनका पहला काव्य-संग्रह ‘मंजीर’ (1941) प्रकाशित हुआ, जिसकी भूमिका सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने लिखी—यह उनके साहित्यिक महत्व का प्रमाण है।
‘तार सप्तक’ और प्रयोगवाद
1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ में शामिल सात कवियों में गिरिजाकुमार माथुर भी थे।
यह संग्रह हिंदी कविता में—
- प्रयोगशीलता
- आधुनिक बोध
- व्यक्तिगत अनुभूति
का प्रतीक माना जाता है। यहाँ माथुर की कविता में नए शिल्प और नई दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।
काव्य-दृष्टि और शैली
भाषा और शिल्प
- सरल, सटीक और आधुनिक भाषा
- छायावाद से प्रयोगवाद तक का विकास
- बिंब, प्रतीक और लय का संतुलित प्रयोग
वैचारिक प्रभाव
- मार्क्सवाद
- भारतीय लोक-परंपरा
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन
- वैज्ञानिक और सामाजिक चेतना
उनकी कविताओं में लोक-जीवन और आधुनिक चिंतन का सुंदर संगम मिलता है।
प्रमुख कृतियाँ
काव्य-संग्रह
- मंजीर
- नाश और निर्माण
- धूप के धान
- शिलापंख चमकीले
- जो बँध नहीं सका
- भीतरी नदी की यात्रा
- साक्षी रहे वर्तमान
- पृथ्वीकल्प
- कल्पांतर
- मैं वक्त के हूँ सामने
- मुझे और अभी कहना है
नाटक
- जन्म कैद
आलोचना
- नई कविता: सीमाएँ और संभावनाएँ
गीत
- छाया मत छूना मन
- हम होंगे कामयाब
“हम होंगे कामयाब” का ऐतिहासिक महत्व
उन्होंने प्रसिद्ध अंग्रेजी गीत “We Shall Overcome” का हिंदी भावानुवाद किया।
यह गीत—
- 1970–80 के दशक में दूरदर्शन पर नियमित प्रसारित
- राष्ट्रीय पर्वों और सामाजिक आंदोलनों का प्रतीक
- सामूहिक आशा और संघर्ष का गीत बना
पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1991) — मैं वक्त के हूँ सामने
- व्यास सम्मान (1993) — के. के. बिड़ला फाउंडेशन
- शलाका सम्मान
- अन्य अनेक साहित्यिक सम्मान
निधन
- निधन: 10 जनवरी 1994
- स्थान: नई दिल्ली
- आयु: 75 वर्ष
