प्रस्तावना
भगवती चरण वर्मा हिंदी साहित्य के आधुनिक युग के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार, कथाकार, कवि, नाटककार और साहित्य-चिंतक थे। उन्होंने हिंदी उपन्यास को दार्शनिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक गहराई प्रदान की। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘चित्रलेखा’ हिंदी साहित्य की कालजयी कृतियों में गिना जाता है। उन्हें साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्म भूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
भगवती चरण वर्मा का जन्म 30 अगस्त 1903 ई. को शफीपुर गाँव, उन्नाव जिला, उत्तर प्रदेश में हुआ।
वे एक संस्कारवान और शिक्षित परिवार से संबंध रखते थे, जहाँ साहित्य, संस्कृति और बौद्धिकता का वातावरण था। इसी वातावरण ने उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को आकार दिया।
शिक्षा
- इलाहाबाद विश्वविद्यालय (प्रयागराज)
- बी.ए.
- एल.एल.बी.
शिक्षा काल में ही उन्होंने साहित्य की ओर रुझान दिखाया और कविता लेखन से अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ की।
साहित्यिक जीवन का प्रारंभ
भगवती चरण वर्मा ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत कवि के रूप में की, किंतु शीघ्र ही वे उपन्यासकार के रूप में अधिक प्रसिद्ध हुए। उनके लेखन में—
- दर्शन और जीवन-मूल्यों का प्रश्न
- पाप-पुण्य, नैतिकता और मानव स्वतंत्रता
- सामाजिक यथार्थ और राजनीतिक चेतना
प्रमुख विषय रहे।
कार्यक्षेत्र एवं व्यावसायिक जीवन
भगवती चरण वर्मा का जीवन बहुआयामी रहा। उन्होंने साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता, फिल्म और रेडियो के क्षेत्र में भी सक्रिय योगदान दिया।
प्रमुख कार्य
- 1933 के आसपास प्रतापगढ़ के राजा भदरी के साथ रहे
- 1936 में फ़िल्म कॉरपोरेशन, कोलकाता में कार्य
- ‘विचार’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन
- मुंबई में
- फ़िल्म कथा-लेखन
- दैनिक ‘नवजीवन’ का संपादन
- आकाशवाणी के कई केंद्रों से जुड़े
- 1957 के बाद पूर्णतः स्वतंत्र साहित्यकार के रूप में लेखन
साहित्यिक योगदान
1. उपन्यासकार के रूप में
भगवती चरण वर्मा हिंदी के उन उपन्यासकारों में हैं जिन्होंने उपन्यास को विचार और दर्शन का माध्यम बनाया।
प्रमुख उपन्यास
- पतन (1928)
- चित्रलेखा (1934)
- तीन वर्ष
- टेढ़े-मेढ़े रास्ते (1946) – मार्क्सवाद की आलोचना
- अपने खिलौने (1957)
- भूले-बिसरे चित्र (1959)
- सामर्थ्य और सीमा (1962)
- थके पाँव (1964)
- रेखा
- सबहिं नचावत राम गोसाईं (1970)
- प्रश्न और मरीचिका (1973)
- धुप्पल
- चाणक्य
2. ‘चित्रलेखा’ – एक कालजयी उपन्यास
चित्रलेखा भगवती चरण वर्मा की सर्वाधिक चर्चित कृति है।
मुख्य विषय
- पाप और पुण्य की दार्शनिक समस्या
- नैतिकता की सापेक्षता
- मानव दृष्टिकोण का महत्व
महाप्रभु रत्नांबर का कथन—
“संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है।”
इस उपन्यास पर दो बार फ़िल्म निर्माण हुआ, जो इसकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
3. कहानीकार
कहानी-संग्रह
- दो बाँके (1936)
- मोर्चाबंदी
- इंस्टालमेंट
- मुगलों ने सल्तनत बख्श दी
- क्या निराश हुआ जाए
4. कवि
काव्य-संग्रह
- मधुकण (1932)
- प्रेम-संगीत
- मानव
यद्यपि वे मुख्यतः उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हुए, पर उनकी कविता में भी भावनात्मक गहराई मिलती है।
5. नाटक, संस्मरण एवं आलोचना
- नाटक – वसीहत, रुपया तुम्हें खा गया, सबसे बड़ा आदमी
- संस्मरण – अतीत के गर्भ से
- साहित्यालोचना – साहित्य के सिद्धांत
पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) – भूले-बिसरे चित्र
- पद्म भूषण (1971) – साहित्य एवं शिक्षा में योगदान
- राज्यसभा के मानद सदस्य – मनोनीत
हिंदी साहित्य में स्थान
भगवती चरण वर्मा आधुनिक हिंदी साहित्य के उन लेखकों में हैं जिन्होंने—
- उपन्यास को दार्शनिक ऊँचाई दी
- मानव-केन्द्रित दृष्टिकोण अपनाया
- स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-पश्चात समाज को साहित्य में प्रतिबिंबित किया
वे प्रसाद, निराला और जैनेन्द्र की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण लेखक माने जाते हैं।
निधन
भगवती चरण वर्मा का निधन 5 अक्टूबर 1981 ई. को नई दिल्ली में हुआ।
