रतन नाथ ‘सरशार’ उर्दू साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण, प्रभावशाली और इतिहास निर्माता उपन्यासकार, व्यंग्यकार, स्तंभकार और संपादक माने जाते हैं। उर्दू कथा साहित्य में आधुनिक उपन्यास विधा के विकास में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण है कि उन्हें उर्दू उपन्यास का प्रारम्भिक निर्माता, फसाना-ए-आज़ाद का सर्जक और लखनऊ की तहज़ीब का श्रेष्ठ चित्रकार कहा जाता है।
जन्म और परिवार
रतन नाथ सरशार का जन्म 1846 ई० में लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। वे एक कश्मीरी पंडित परिवार से संबंधित थे। उनका वास्तविक नाम रतन नाथ धर था, जबकि “सरशार” उनका साहित्यिक उपनाम (तख़ल्लुस) था।
उनका परिवार शिक्षित और सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध था। लखनऊ उस समय नवाबी संस्कृति, तहज़ीब और साहित्य का केंद्र था, जिसका गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व और लेखन पर पड़ा।
प्रारम्भिक जीवन
सरशार का बचपन लखनऊ के सांस्कृतिक वातावरण में बीता। उस समय लखनऊ में कला, साहित्य, संगीत और तहज़ीब का विशेष महत्व था। इसी वातावरण ने उनके मन में साहित्य के प्रति रुचि पैदा की। वे बचपन से ही बुद्धिमान, जिज्ञासु और व्यंग्यप्रिय स्वभाव के थे। समाज को देखने और समझने की उनकी क्षमता आगे चलकर उनके लेखन की शक्ति बनी।
शिक्षा
उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लखनऊ में प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने उर्दू, फारसी और अरबी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। वे बहुभाषी विद्वान थे और उर्दू भाषा पर उनका विशेष अधिकार था। उनकी शिक्षा केवल पुस्तकीय नहीं थी, बल्कि उन्होंने समाज और जीवन के अनुभवों से भी बहुत कुछ सीखा।
पत्रकारिता जीवन
रतन नाथ ‘सरशार’ ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की। वे प्रसिद्ध उर्दू समाचार पत्र “अवध अख़बार” से जुड़े। यहीं पर उन्होंने अपनी लेखन प्रतिभा का परिचय दिया। इसी पत्र में उनका प्रसिद्ध उपन्यास “फ़साना-ए-आज़ाद” धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें अत्यधिक प्रसिद्धि दिलाई। पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने समाज की समस्याओं, लोगों के व्यवहार और जीवन की वास्तविकताओं को उजागर किया।
साहित्यिक परिचय
सरशार उर्दू साहित्य के प्रमुख उपन्यासकार, व्यंग्यकार और कथाकार थे। उन्होंने समाज के यथार्थ को हास्य और व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में समाज की कमजोरियों, पाखंड, अज्ञानता और दिखावे पर तीखा व्यंग्य मिलता है। वे समाज को सुधारने के उद्देश्य से लिखते थे, केवल मनोरंजन के लिए नहीं।
प्रमुख रचना – “फ़साना-ए-आज़ाद”
उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति “फ़साना-ए-आज़ाद” है, जो उर्दू साहित्य का एक महत्वपूर्ण उपन्यास माना जाता है। इस उपन्यास में मुख्य पात्र आज़ाद और खोजी के माध्यम से समाज का व्यंग्यात्मक चित्रण किया गया है।
इस रचना में—
- लखनऊ की संस्कृति का चित्रण
- सामाजिक जीवन की झलक
- हास्य और व्यंग्य
- मानवीय कमजोरियों का प्रदर्शन
मिलता है। यह उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे उर्दू साहित्य की अमर कृतियों में गिना जाता है।
भाषा-शैली
सरशार की भाषा अत्यंत सरल, बोलचाल की, प्रवाहपूर्ण और हास्यपूर्ण है। उन्होंने कठिन और जटिल भाषा के स्थान पर सामान्य जन की भाषा का प्रयोग किया। उनकी शैली में व्यंग्य, चुटीलापन और संवादात्मकता प्रमुख है। वे घटनाओं और पात्रों को इतने रोचक ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक पूरी कहानी में खो जाता है।
काव्य/लेखन की विशेषताएँ
उनके लेखन में हास्य और व्यंग्य की प्रधानता है। उन्होंने समाज की बुराइयों, अंधविश्वास और पाखंड पर तीखा प्रहार किया। उनकी रचनाओं में यथार्थ का जीवंत चित्रण मिलता है। वे मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक संदेश भी देते हैं।
व्यक्तित्व
रतन नाथ ‘सरशार’ अत्यंत हाजिरजवाब, बुद्धिमान, व्यंग्यप्रिय और सामाजिक दृष्टि से सजग व्यक्ति थे। उनका स्वभाव मिलनसार था और वे समाज को गहराई से समझते थे। उनकी सोच में स्पष्टता और आलोचनात्मक दृष्टि थी।
साहित्य में स्थान
उर्दू साहित्य में रतन नाथ ‘सरशार’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्हें आधुनिक उर्दू उपन्यास के प्रारम्भिक और प्रमुख लेखकों में गिना जाता है। उन्होंने उपन्यास विधा को लोकप्रिय बनाया और उसे साहित्यिक ऊँचाई प्रदान की।
निधन
रतन नाथ ‘सरशार’ का निधन 1903 ई० में हुआ। उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाएँ साहित्य जगत में अमर बनी रहीं।
