जीवन परिचय
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और शिक्षाविद् थे, जबकि उनकी माता वरदा सुंदरी एक कवयित्री थीं। बचपन से ही सरोजिनी अत्यंत प्रतिभाशाली थीं। उन्होंने मात्र 12 वर्ष की आयु में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। उनकी प्रारंभिक शिक्षा हैदराबाद में हुई। बाद में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गईं, जहाँ उन्होंने किंग्स कॉलेज, लंदन और गर्टन कॉलेज, कैम्ब्रिज में अध्ययन किया।
बचपन और प्रारंभिक शिक्षा
सरोजिनी नायडू बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थीं। उनकी बुद्धि तीव्र और स्मरण शक्ति अद्भुत थी। मात्र 12 वर्ष की आयु में उन्होंने 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंग्रेज़ी में ‘लेडी ऑफ द लेक’ नामक कविता लिखी, जिसने उनकी साहित्यिक प्रतिभा को उजागर कर दिया।
उच्च शिक्षा
उनकी असाधारण योग्यता से प्रभावित होकर हैदराबाद के निज़ाम ने उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की। इसके फलस्वरूप वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गईं। वहाँ उन्होंने पहले लंदन के किंग्स कॉलेज में अध्ययन किया और बाद में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के गिरटन कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। इस दौरान उनकी कविता-प्रतिभा और अधिक परिपक्व हुई।
वैवाहिक जीवन
सन् 1898 में सरोजिनी नायडू का विवाह डॉ. गोविंदराजुलू नायडू से हुआ। यह विवाह उस समय सामाजिक दृष्टि से साहसिक माना जाता था, क्योंकि यह अंतरजातीय था। उनके पति ने उनके साहित्यिक और राजनीतिक जीवन में हर संभव सहयोग दिया।
साहित्यिक जीवन और काव्य-रचनाएँ
सरोजिनी नायडू एक उत्कृष्ट कवयित्री थीं। उनकी कविताओं में भारतीय संस्कृति, प्रकृति, प्रेम, करुणा और देशभक्ति का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
प्रमुख काव्य-संग्रह:
- The Golden Threshold (1905)
- The Bird of Time (1912)
- The Broken Wing (1917)
उनकी कविताओं की गीतात्मकता और भावनात्मक गहराई के कारण ही उन्हें “भारत की कोकिला” की उपाधि मिली।
स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
सन् 1905 में बंगाल विभाजन के बाद सरोजिनी नायडू भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गईं। वे गोपाल कृष्ण गोखले और महात्मा गांधी से अत्यंत प्रभावित थीं। सन् 1914 में गांधीजी से भेंट के बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रसेवा को समर्पित कर दिया।
उन्होंने असहयोग आंदोलन, सत्याग्रह और विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलनों में भाग लिया और कई बार जेल गईं। वे गाँव-गाँव जाकर लोगों में देशभक्ति की भावना जागृत करती थीं।
वक्तृत्व कला और नेतृत्व क्षमता
सरोजिनी नायडू एक प्रभावशाली वक्ता थीं। वे अंग्रेज़ी, हिंदी, बंगला और गुजराती सहित कई भाषाओं में भाषण देती थीं। उनके ओजस्वी भाषण जनता को गहराई से प्रभावित करते थे और स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित करते थे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भूमिका
अपनी लोकप्रियता और नेतृत्व क्षमता के कारण 1925 में कानपुर में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन की अध्यक्षता उन्हें सौंपी गई। वे इस पद पर पहुँचने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। बाद में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।
स्वतंत्र भारत में योगदान
भारत की स्वतंत्रता के बाद सरोजिनी नायडू को उत्तर प्रदेश (संयुक्त प्रांत) का पहली महिला राज्यपाल नियुक्त किया गया। उन्होंने इस पद पर रहते हुए गरिमा, संवेदनशीलता और निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया।
सम्मान और उपलब्धियाँ
- कैसर-ए-हिंद पदक (प्लेग सेवा के लिए) – बाद में जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में लौटाया
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष
- उत्तर प्रदेश की पहली महिला राज्यपाल
- भारत सरकार द्वारा 1964 में उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी
निधन
2 मार्च 1949 को लखनऊ में हृदयाघात के कारण सरोजिनी नायडू का निधन हो गया। उनका संपूर्ण जीवन देशभक्ति, नारी सशक्तिकरण और साहित्यिक चेतना का प्रतीक रहा।
