गुलज़ार का जन्म 18 अगस्त 1936 को दीना गाँव, झेलम ज़िला, अविभाजित पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनका मूल नाम सम्पूरण सिंह कालरा है।
वे अपने पिता की दूसरी पत्नी की इकलौती संतान थे। बचपन में ही उनकी माँ उन्हें छोड़कर चली गईं, जिससे उन्हें माँ का स्नेह और पिता का पूरा दुलार दोनों नहीं मिल पाया। वे कुल नौ भाई-बहनों में चौथे स्थान पर थे। बचपन का अकेलापन, बिछोह और स्मृतियाँ आगे चलकर उनकी रचनाओं का गहरा भाव बन गईं।
विभाजन का दर्द और विस्थापन
1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन ने गुलज़ार के जीवन पर गहरा असर डाला।
परिवार पाकिस्तान से विस्थापित होकर अमृतसर आया और बाद में गुलज़ार रोज़गार की तलाश में मुंबई (तब बॉम्बे) पहुँच गए।
विभाजन का दर्द, जड़ों से उखड़ने की पीड़ा और स्मृति का बोझ उनकी कविताओं और गीतों में बार-बार उभरकर आता है।
संघर्ष का दौर: मैकेनिक से साहित्यकार तक
मुंबई में जीवन आसान नहीं था।
गुलज़ार ने वर्ली के एक गैराज में मैकेनिक (पेंट मिक्सिंग और डेंटिंग) का काम किया। दिन भर मेहनत और रातों में किताबें—यही उनका जीवन था।
खाली समय में वे:
- उर्दू और हिंदी साहित्य पढ़ते
- कविताएँ और कहानियाँ लिखते
- भाषा और छंदों पर प्रयोग करते
यहीं से उनके भीतर का साहित्यकार धीरे-धीरे आकार लेने लगा।
फ़िल्म जगत में प्रवेश
गुलज़ार को फ़िल्म इंडस्ट्री में पहला अवसर मिला बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी और हेमंत कुमार के सहायक के रूप में।
गीतकार के रूप में शुरुआत
1963 में फ़िल्म ‘बंदिनी’ के लिए उन्होंने अपना पहला गीत लिखा—
“मोरा गोरा अंग लइ ले”
यहीं से उनके गीतकार जीवन की शुरुआत हुई।
गीतकार के रूप में योगदान
गुलज़ार ने हिंदी सिनेमा को ऐसे गीत दिए, जो:
- कविता भी हैं
- कहानी भी
- और दर्शन भी
उनके गीतों की विशेषताएँ:
- सरल लेकिन गहरी भाषा
- उपमा और रूपक का अनूठा प्रयोग
- मौन और खाली जगहों का महत्व
दिल से, ओमकारा, पिंजर, रेनकोट, इजाज़त, आंधी जैसी फ़िल्मों के गीत आज भी क्लासिक माने जाते हैं।
पटकथा और संवाद लेखक
गुलज़ार केवल गीतकार नहीं रहे, बल्कि उन्होंने कई यादगार फ़िल्मों की पटकथा और संवाद भी लिखे:
- आनंद
- ख़ामोशी
- मासूम
- रुदाली
- आँधी
उनके संवाद सादगी में गहराई और भावनाओं की सच्चाई लिए होते हैं।
निर्देशक के रूप में गुलज़ार
1971 में गुलज़ार ने निर्देशन की शुरुआत फ़िल्म ‘मेरे अपने’ से की।
इसके बाद उन्होंने संवेदनशील और यथार्थवादी सिनेमा दिया:
- कोशिश (गूंगे-बहरे दंपति की कथा)
- आंधी
- मौसम
- परिचय
- अंगूर
- माचिस
‘कोशिश’ में संजीव कुमार को राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला।
बच्चों के लिए लेखन
गुलज़ार का बाल मन हमेशा जीवित रहा।
उन्होंने बच्चों के लिए:
- कविताएँ
- कहानियाँ
- टीवी गीत
लिखे।
‘जंगल जंगल बात चली है’ (जंगल बुक) आज भी बच्चों की स्मृति में बसा हुआ है।
साहित्यिक कृतियाँ
गुलज़ार ने कविता, कहानी और गद्य—तीनों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रमुख पुस्तकें
- चौरस रात
- जानम
- एक बूँद चाँद
- रावी पार
- रात, चाँद और मैं
- रात पश्मीने की
- खराशें
उन्होंने त्रिवेणी छंद का सृजन भी किया, जो उनकी मौलिक देन है।
व्यक्तिगत जीवन
गुलज़ार ने अभिनेत्री राखी से विवाह किया।
उनकी बेटी मेघना गुलज़ार आज एक प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक हैं।
गुलज़ार और राखी अलग रहते हैं, लेकिन उन्होंने तलाक नहीं लिया।
वे सामाजिक कार्यों से भी जुड़े रहे:
- आरुषि (दिव्यांग बच्चों के लिए)
- एकलव्य (शिक्षा के लिए)
पुरस्कार और सम्मान
गुलज़ार को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला:
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (2002)
- पद्म भूषण (2004)
- ऑस्कर पुरस्कार (2009) – ‘जय हो’ (स्लमडॉग मिलियनेयर)
- ग्रैमी पुरस्कार (2010)
- दादा साहब फाल्के पुरस्कार (2013)
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (2023 – प्रस्तावित/घोषित)
