गोपालदास नीरज का जीवन परिचय (Gopaldas Neeraj Biography in Hindi)

प्रारंभिक जीवन और परिवार

गोपालदास नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरावली गाँव में हुआ। उनका वास्तविक नाम गोपाल दास सक्सेना था।

  • पिता: बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना
  • माता-पिता के निधन: मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता का निधन
  • शिक्षा:
    • 1942: एटा से हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण
    • 1949: इंटरमीडिएट
    • 1951: बी.ए.
    • 1953: एम.ए. (हिंदी साहित्य, प्रथम श्रेणी)

बचपन और संघर्ष:

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  • जीवन की शुरुआत संघर्षपूर्ण थी।
  • कई छोटे-मोटे काम किए: टाइपिंग, ट्यूशन पढ़ाना, विज्ञापन पेंटिंग।
  • इन अनुभवों ने उनके व्यक्तित्व और साहित्य में गहराई दी।

शिक्षा और करियर

  • हिंदी साहित्य में एम.ए.
  • शिक्षक पद:
    • मेरठ कॉलेज: हिंदी प्रवक्ता
    • धर्म समाज कॉलेज, अलीगढ़: हिंदी विभाग के प्राध्यापक
  • नौकरी छोड़ने का कारण: मेरठ कॉलेज में कक्षाएँ न लेने और रोमांस करने के आरोप

साहित्यिक योगदान

गोपालदास नीरज अपने सरल, भावुक और दार्शनिक कविताओं के लिए प्रसिद्ध थे।
उनकी रचनाएँ आज भी हिंदी साहित्य में उच्च सम्मानित हैं।

प्रमुख कविता और गीत संग्रह

  1. संघर्ष (1944)
  2. अन्तर्ध्वनि (1946)
  3. विभावरी (1948)
  4. प्राणगीत (1951)
  5. दर्द दिया है (1956)
  6. बादल बरस गयो (1957)
  7. मुक्तकी (1958)
  8. दो गीत (1958)
  9. नीरज की पाती (1958)
  10. गीत भी अगीत भी (1959)
  11. आसावरी (1963)
  12. नदी किनारे (1963)
  13. लहर पुकारे (1963)
  14. कारवाँ गुजर गया (1964)
  15. फिर दीप जलेगा (1970)
  16. तुम्हारे लिए (1972)
  17. नीरज की गीतिकाएँ (1987)

फ़िल्मों में गीत लेखन

नीरज जी ने कई लोकप्रिय फ़िल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें प्रमुख हैं:

  • मेरा नाम जोकर – \”ए भाई! ज़रा देख के चलो\”
  • शर्मीली
  • प्रेम पुजारी – \”लिखे जो खत तुझे\”
  • कन्यादान
  • तेरे मेरे सपने

फ़िल्म फेयर पुरस्कार:

  • 1970: काल का पहिया घूमे रे भइया! (चंदा और बिजली)
  • 1971: बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ (पहचान)
  • 1972: ए भाई! ज़रा देख के चलो (मेरा नाम जोकर) – पुरस्कार विजेता

व्यक्तिगत जीवन

  • नीरज जी ने हमेशा खुद को “बदकिस्मत कवि” कहा, क्योंकि उनका मन हमेशा साहित्य और मंच पर काव्य पाठ में रहता था।
  • उनके जीवन का मूल उद्देश्य साहित्य और मानवता था।
  • उनके शेर और गीत आज भी मुशायरों में लोकप्रिय हैं।
  • प्रसिद्ध शेर: इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगी आपको सदियाँ हमें भुलाने में। न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में॥

पुरस्कार और सम्मान

  • पद्मश्री (1991) – भारत सरकार
  • पद्मभूषण (2007) – भारत सरकार
  • फिल्म फेयर पुरस्कार – लगातार तीन बार
  • यश भारती पुरस्कार (1994) – उत्तर प्रदेश
  • विश्व उर्दू परिषद् पुरस्कार
  • उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान अध्यक्ष – कैबिनेट मंत्री का दर्जा

अंतिम वर्ष और निधन

  • निधन: 19 जुलाई 2018, दिल्ली, एम्स
  • आयु: 93 वर्ष
  • गोपालदास नीरज का साहित्य और गीत लेखन आज भी हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान माना जाता है।
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