प्रस्तावना
डॉ. हरिओम पंवार हिंदी साहित्य के ऐसे विशिष्ट कवि हैं जिन्होंने कानून, शिक्षा और कविता—तीनों क्षेत्रों में समान रूप से अपनी पहचान बनाई। वे पेशे से विधि विशेषज्ञ और प्राध्यापक रहे, लेकिन हृदय से एक संवेदनशील कवि हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदना, राष्ट्रीय चेतना और जीवन-दर्शन का सशक्त स्वर सुनाई देता है।
एक ओर वे विधि के गूढ़ सिद्धांतों के अध्येता रहे, तो दूसरी ओर कविता के माध्यम से आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष और आशाओं को स्वर देते रहे। यही द्वंद्व और संतुलन उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
डॉ. हरिओम पंवार का जन्म 24 मई 1951 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में सिकन्दराबाद के निकट बुटना गाँव में हुआ था। उनका परिवार ग्रामीण परिवेश से जुड़ा हुआ था, जहाँ संस्कार, परिश्रम और सादगी को जीवन का मूल मूल्य माना जाता था। इसी परिवेश ने उनके भीतर सामाजिक सरोकार और जीवन के प्रति गंभीर दृष्टि विकसित की।
प्रारंभिक जीवन और संस्कार
डॉ. हरिओम पंवार का बचपन गाँव की मिट्टी, खेतों, लोकजीवन और सामाजिक संबंधों के बीच बीता। ग्रामीण जीवन की कठिनाइयों, संघर्षों और मानवीय रिश्तों ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला।
यही कारण है कि उनकी कविताओं में ग्रामीण जीवन की सच्चाई, आम आदमी की पीड़ा और नैतिक मूल्यों की चिंता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
शिक्षा
डॉ. हरिओम पंवार ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त कीं।
उन्होंने 1975 में मेरठ विश्वविद्यालय से एल.एल.एम. (विधि में स्नातकोत्तर) की उपाधि प्राप्त की। विधि के अध्ययन के दौरान उन्होंने न्याय, समाज और संविधान के गहरे सिद्धांतों को समझा, जिसका प्रभाव आगे चलकर उनकी वैचारिक कविताओं में भी दिखाई देता है।
शैक्षणिक एवं व्यावसायिक जीवन
शिक्षा पूर्ण करने के बाद डॉ. हरिओम पंवार मेरठ विश्वविद्यालय से संबद्ध मेरठ महाविद्यालय में विधि संकाय में प्रोफेसर नियुक्त हुए।
एक विधि प्राध्यापक के रूप में उन्होंने अनेक वर्षों तक विद्यार्थियों को कानून की बारीकियाँ सिखाईं। उनका अध्यापन केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं था, बल्कि वे विद्यार्थियों को सामाजिक न्याय, नैतिकता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति भी जागरूक करते थे।
कवि के रूप में पहचान
डॉ. हरिओम पंवार ने साहित्यिक यात्रा कविता से प्रारंभ की। वे मंचीय कविता और साहित्यिक गोष्ठियों दोनों में सक्रिय रहे।
उनकी कविताएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि पाठक और श्रोता को सोचने पर मजबूर करती हैं। वे शब्दों के माध्यम से समाज की विसंगतियों, अन्याय, नैतिक पतन और मानवीय संघर्षों को उजागर करते हैं।
काव्य की प्रमुख विशेषताएँ
डॉ. हरिओम पंवार की कविता की भाषा सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली है। वे कठिन शाब्दिक आडंबर से दूर रहकर सीधे भावों की अभिव्यक्ति करते हैं।
उनकी कविताओं में—
- सामाजिक यथार्थ
- न्याय और अन्याय का द्वंद्व
- मानवीय संवेदना
- राष्ट्रीय चेतना
- नैतिक मूल्यों की चिंता
स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।
विधि और साहित्य का समन्वय
डॉ. हरिओम पंवार का साहित्यिक व्यक्तित्व इसलिए भी विशिष्ट है क्योंकि उनकी कविता में विधि और समाज का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।
कानून के अध्येता होने के कारण उनकी रचनाओं में तर्क, विवेक और न्याय की चेतना मौजूद रहती है। वे कविता को भावुकता तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे सामाजिक विमर्श का माध्यम बनाते हैं।
साहित्यिक योगदान और प्रभाव
डॉ. हरिओम पंवार ने हिंदी कविता को वैचारिक गहराई प्रदान की। उन्होंने यह सिद्ध किया कि कविता केवल कल्पना नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी है।
उनका साहित्य छात्रों, शोधार्थियों और साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणास्रोत है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में संतुलन बनाना चाहते हैं।
व्यक्तित्व और विचारधारा
डॉ. हरिओम पंवार एक गंभीर, चिंतनशील और संवेदनशील व्यक्तित्व के धनी हैं। उनका जीवन सादगी, अनुशासन और बौद्धिक ईमानदारी का उदाहरण है।
वे मानते हैं कि साहित्य का उद्देश्य समाज को आईना दिखाना और मनुष्य को बेहतर इंसान बनाना है।
