जीवन परिचय
भवानी प्रसाद मिश्र (1913–1985) हिंदी कविता के उन दुर्लभ रचनाकारों में हैं जिन्होंने कविता को आडंबर से मुक्त, जीवन के अत्यंत निकट और जनभाषा में संवाद का माध्यम बनाया। वे गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित थे और इसी कारण उन्हें “कविता का गांधी” कहा जाता है।
वे ‘दूसरा सप्तक’ के प्रथम कवि थे और उनकी कविता सहजता, सादगी, मानवीय संवेदना और नैतिक साहस का अनुपम उदाहरण है।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
- जन्म तिथि: 29 मार्च 1913
- जन्म स्थान: टिगरिया गाँव, तहसील सिवनी मालवा, जिला होशंगाबाद (वर्तमान नर्मदापुरम), मध्य प्रदेश
भवानी प्रसाद मिश्र का जन्म एक साधारण ग्रामीण परिवेश में हुआ। गाँव का जीवन, प्रकृति की निकटता और लोक-संस्कृति ने उनके व्यक्तित्व और रचना-दृष्टि को गहराई से प्रभावित किया। आगे चलकर यही ग्रामीण जीवन-बोध उनकी कविता की आत्मा बना।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा: सोहागपुर, होशंगाबाद, नरसिंहपुर
- उच्च शिक्षा: जबलपुर
- स्नातक (B.A.): 1934–35
- विषय: हिंदी, अंग्रेज़ी और संस्कृत
उनकी शिक्षा बहुविषयक थी, जिसने उनकी भाषा को सरल, संस्कारवान और विचारपूर्ण बनाया।
गांधीवादी विचार और स्वतंत्रता आंदोलन
भवानी प्रसाद मिश्र महात्मा गांधी के विचारों से अत्यंत प्रभावित थे।
- गांधी के शैक्षिक आदर्शों से प्रेरित होकर उन्होंने एक विद्यालय खोला
- 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण गिरफ्तार हुए
- 1945 में जेल से रिहा हुए
इसके बाद वे वर्धा के महिलाश्रम में शिक्षक के रूप में कार्यरत रहे और वहाँ 4–5 वर्ष बिताए।
यहीं से उनके जीवन में सेवा, सादगी और सत्य का भाव और गहरा हुआ।
साहित्यिक जीवन की शुरुआत
भवानी प्रसाद मिश्र ने लगभग 1930 से नियमित कविता-लेखन आरंभ कर दिया था।
- उनकी प्रारंभिक कविताएँ पं. ईश्वरी प्रसाद वर्मा के संपादन में हिंदूपंच में प्रकाशित हुईं
- 1932–33 में वे माखनलाल चतुर्वेदी के संपर्क में आए
- कर्मवीर और हंस जैसी पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ प्रकाशित हुईं
बाद में अज्ञेय ने उन्हें ‘दूसरा सप्तक’ में स्थान दिया, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
‘दूसरा सप्तक’ और साहित्यिक प्रतिष्ठा
भवानी प्रसाद मिश्र ‘दूसरा सप्तक’ (1951) के प्रथम कवि थे।
इस संकलन में उनकी कविताओं ने यह सिद्ध किया कि—
कविता को जटिल नहीं, जीवन के समान सरल होना चाहिए।
उनकी पहली काव्य-पुस्तक ‘गीत-फ़रोश’ ने उन्हें अत्यधिक लोकप्रिय बनाया। यह कृति कवि के आत्मसंघर्ष और बाज़ारवाद की विडंबना को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
काव्य-शैली और काव्य-दृष्टि
भाषा और शिल्प
- बोलचाल की सहज, संवादात्मक भाषा
- कोई अलंकारिक बोझ नहीं
- गेयता और लय का स्वाभाविक प्रवाह
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
“जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।”
उनकी कविता पढ़ते समय ऐसा लगता है मानो कवि सीधे पाठक से बात कर रहा हो।
विषय-वस्तु
- गांधी-दर्शन और नैतिकता
- ग्रामीण जीवन
- प्रकृति (विशेषकर ‘सतपुड़ा के जंगल’)
- मानवीय करुणा
- स्वतंत्रता, लोकतंत्र और तानाशाही का विरोध
आपातकाल और ‘त्रिकाल संध्या’
1975 के आपातकाल के समय भवानी प्रसाद मिश्र ने साहसपूर्वक विरोध किया।
- नियमपूर्वक दिन में तीन कविताएँ लिखीं
- ये कविताएँ बाद में ‘त्रिकाल संध्या’ के रूप में प्रकाशित हुईं
यह उनके नैतिक साहस और लोकतांत्रिक चेतना का अद्भुत उदाहरण है।
अन्य साहित्यिक एवं व्यावसायिक कार्य
- पत्रिका संपादन: कल्पना
- गांधी वाङ्मय के हिंदी खंडों का संपादन
- फिल्मों के लिए संवाद लेखन
- मद्रास (ABM) में संवाद निर्देशन
- आकाशवाणी: मुंबई और दिल्ली में प्रोड्यूसर
33 वर्ष की आयु से उन्होंने खादी पहनना शुरू किया, जो उनके गांधीवादी जीवन-मूल्यों का प्रतीक था।
प्रमुख कृतियाँ
काव्य-संग्रह
- गीत-फ़रोश
- चकित है दुख
- गांधी पंचशती
- बुनी हुई रस्सी
- खुशबू के शिलालेख
- त्रिकाल संध्या
- व्यक्तिगत
- परिवर्तन जिए
- अनाम तुम आते हो
- इदम् न मम
- फसलें और फूल
- मानसरोवर दिन
- सम्प्रति
- अँधेरी कविताएँ
- तूस की आग
- कालजयी
- नीली रेखा तक और सन्नाटा
बाल साहित्य
- तुकों के खेल
संस्मरण
- जिन्होंने मुझे रचा
निबंध
- कुछ नीति कुछ राजनीति
पुरस्कार और सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1972) – बुनी हुई रस्सी
- उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान साहित्यकार सम्मान (1981–82)
- मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान (1983)
- पद्म श्री (भारत सरकार)
पारिवारिक जीवन
उनके पुत्र अनुपम मिश्र प्रसिद्ध पर्यावरणविद और जल-संरक्षण चिंतक थे।
यह भी दिखाता है कि भवानी प्रसाद मिश्र का जीवन संवेदना और जिम्मेदारी से भरा था।
निधन
- मृत्यु तिथि: 20 फरवरी 1985
- स्थान: नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश
वे जीवन की अंतिम घड़ी तक सादगी, करुणा और मानवता के प्रतीक बने रहे। कहा जाता है कि उन्होंने मरते समय भी किसी को कष्ट नहीं दिया।
