श्रीधर पाठक (11 जनवरी 1858 / 1860 – 13 सितंबर 1928) हिंदी साहित्य के उन महान कवियों में से एक थे, जिन्होंने स्वदेश प्रेम, प्राकृतिक सौंदर्य, मानवीय संवेदना, समाज सुधार और व्यक्तिगत अनुभूति को अपनी रचनाओं का आधार बनाया।
उनकी काव्य-शैली में प्रकृति की निर्मलता, देशभक्ति की ऊष्मा, और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का आधुनिक स्वर एक साथ मिलता है।
वे हिंदी साहित्य में खड़ी बोली के समर्थक, उद्भावनात्मक काव्य-धारा के प्रवर्तक, और राष्ट्रप्रिय कवि के रूप में अत्यंत सम्मानित रहे।
उन्हें ‘कविभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया और 1915 में हिंदी साहित्य सम्मेलन, लखनऊ के पांचवें अधिवेशन की अध्यक्षता की।
1. जन्म, परिवार एवं प्रारंभिक जीवन
श्रीधर पाठक का जन्म 11 जनवरी 1858 / 1860 को उत्तर प्रदेश के आगरा ज़िले के जौंधरी गाँव में एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ।
उनके पिता पंडित लीलाधर एक सुसंस्कृत, धार्मिक और विद्वान व्यक्ति थे।
उनका परिवार (सारस्वत/सनाड्य ब्राह्मण) 8वीं शती में पंजाब के सिरसा से आगरा के जौंधरी गाँव में बस गया था।
बचपन से ही पाठक जी में—
- अध्ययन की गहरी रुचि
- साहित्य के प्रति अनुराग
- प्रकृति के प्रति प्रेम
स्पष्ट दिखाई देता था।
2. शिक्षा – संस्कृत, फारसी और अंग्रेज़ी में समान दक्षता
श्रीधर पाठक ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही प्राप्त की, जहाँ उन्होंने—
- संस्कृत
- फारसी (फ़ारसी)
का गहन अध्ययन किया। वे दोनों भाषाओं में अत्यंत दक्ष हो गए।
इसके बाद उन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त की और क्रमशः—
- हिंदी प्रवेशिका परीक्षा (1875) – प्रथम स्थान
- अंग्रेजी मिडिल परीक्षा (1879) – प्रथम स्थान
- एंट्रेंस परीक्षा (1880–81) – प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण
उत्तीर्ण की।
उन दिनों एंट्रेंस तक की शिक्षा उच्च मानी जाती थी, इसलिए वे अत्यंत शिक्षित व्यक्तियों में गिने जाते थे।
3. व्यावसायिक जीवन – सरकारी सेवा और यात्राएँ
शिक्षा पूर्ण होने के बाद श्रीधर पाठक की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार के विभिन्न कार्यालयों में हुई।
उनके प्रमुख पद:
- जनगणना विभाग, कलकत्ता
- रेलवे विभाग
- पब्लिक वर्क्स विभाग
- सिंचाई विभाग (Irrigation Department)
जनगणना विभाग में काम करते हुए उन्हें भारत के अनेक शहरों और पर्वतीय क्षेत्रों की यात्रा करनी पड़ी।
इन्हीं यात्राओं के दौरान—
- कश्मीर का सौंदर्य
- हिमालय की भव्यता
- वन-संपदा एवं प्रकृति
का गहरा प्रभाव उनकी काव्य-चेतना पर पड़ा, जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है।
1914 में वे सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए और जीवन के अंतिम वर्षों में प्रयाग (इलाहाबाद) में रहने लगे।
4. साहित्यिक जीवन – खड़ी बोली के समर्थक और आधुनिक काव्य के अग्रदूत
✔ खड़ी बोली हिंदी के प्रमुख प्रवर्तक
यद्यपि पाठक जी ने ब्रजभाषा और खड़ी बोली दोनों में रचनाएँ कीं,
फिर भी वे खड़ी बोली को स्थापित करने वाले प्रारंभिक कवियों में से एक थे।
उनकी कृति ‘गुनवंत हेमंत’ (1900) को खड़ी बोली का पहला मौलिक काव्य भी माना जाता है।
✔ कविता में आधुनिक स्वर
वे आधुनिक हिंदी कविता में—
- व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति
- स्वच्छंदता
- नई छंद-योजनाएँ
- मानसिक और प्राकृतिक सौंदर्य
- राष्ट्रीय चेतना
के लिए प्रसिद्ध रहे।
वे हिंदी साहित्य में छायावाद के आगमन से पहले उस भावभूमि को तैयार करने वाले कवियों में गिने जाते हैं।
5. श्रीधर पाठक की प्रमुख रचनाएँ
नीचे उनकी मुख्य रचनाएँ श्रेणी अनुसार दी गई हैं।
(A) प्रमुख काव्य-संग्रह और काव्य-रचनाएँ
- मनोविनोद (भाग 1, 2, 3) – 1882
- एकांतवासी योगी – 1886 (गोल्डस्मिथ के The Hermit का अनुवाद)
- जगत सचाई सार – 1887
- धन विनय – 1900
- गुनवंत हेमंत – 1900
- बाल भूगोल
- काश्मीर सुषमा – 1904
- वनाष्टक – 1912
- देहरादून – 1915
- गोखले गुनाष्टक – 1915
- सांध्य-अटन – 1918
- गोपिका गीत
- भारत-गीत – 1928
- तिलस्माती मुँदरी
(B) अनुवाद-रचनाएँ (Hindi Translations)
श्रीधर पाठक के अनुवाद अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
- एकांतवासी योगी (1886) – Goldsmith की The Hermit का खड़ी बोली अनुवाद
- उजड़ ग्राम (1889) – Goldsmith की The Deserted Village का ब्रजभाषा अनुवाद
- श्रांत पथिक (1902) – Goldsmith की The Traveller का खड़ी बोली अनुवाद
इन अनुवादों ने हिंदी कविता को नई प्रवृत्तियों से परिचित कराया।
(C) अन्य प्रसिद्ध रचनाएँ
- श्री गोखले प्रशस्ति
- आराध्य शोकांजलि (अपने पिता की मृत्यु पर)
- जॉर्ज वंदना (1912)
- भक्ति विभा
- विविध निबंध, पत्र और संस्मरण
6. काव्य-शैली और साहित्यिक विशेषताएँ
श्रीधर पाठक की कविता कई विशिष्ट गुणों से सम्पन्न है—
✔ 1. सहज और मनोहारी प्रकृति-चित्रण
कश्मीर, हिमालय, देहरादून, वन, जलप्रपात—सब उनकी कविताओं में जीवित नजर आते हैं।
✔ 2. स्वदेश प्रेम और राष्ट्रीय चेतना
उनकी कविताएँ देशभक्ति की आंतरिक लहर से भरी हैं।
✔ 3. सरल, लयपूर्ण और साहित्यिक भाषा
न भाषा बोझिल, न कठिन—सीधी, प्रवाहमयी और मधुर।
✔ 4. स्वच्छंद भावधारा के प्रवर्तक
उन्होंने कविता को ‘नए भावों और नए ढंग’ से लिखा, जिससे आधुनिक हिंदी काव्य को नई दिशा मिली।
✔ 5. प्राच्य और पाश्चात्य का सुंदर मिश्रण
संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी साहित्य का संतुलित प्रभाव।
✔ 6. छायावाद की भावभूमि का निर्माण
उन्होंने वैयक्तिक भाव, प्रकृति और सौंदर्य के माध्यम से छायावादी युग की नींव रखी।
7. साहित्यिक सम्मान और योगदान
- ‘कविभूषण’ की उपाधि
- 1915 – हिंदी साहित्य सम्मेलन (लखनऊ) के सभापति
- आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख आधार-स्तंभ
- खड़ी बोली के प्रारंभिक समर्थक
- अनुवाद-काव्य के क्षेत्र में क्रांतिकारी योगदान
उनका साहित्य हिंदी के पुनर्जागरण काल की अमूल्य धरोहर है।
8. अंतिम समय और निधन
सेवानिवृत्ति के बाद वे प्रयाग (इलाहाबाद) में रहने लगे।
वहीं 13 सितंबर 1928 को उनका निधन हो गया।
उनकी मृत्यु हिंदी साहित्य में प्रकृति-चित्रण और स्वदेश प्रेम की एक स्वर्णिम परंपरा का अंत थी।
