सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जीवन परिचय |Sarveshwar Dayal Saxena Biography in Hindi

भूमिका

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927–1983) आधुनिक हिंदी साहित्य के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि, कथाकार, नाटककार, पत्रकार और बाल-साहित्यकार थे। वे नई कविता आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षर और ‘तीसरा सप्तक’ के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाओं में आम आदमी का संघर्ष, सामाजिक विडंबनाएँ, राजनीतिक विद्रूपता, मानवीय करुणा और ग्राम्य जीवन की संवेदना अत्यंत प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त हुई है।

जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का जन्म 15 सितंबर 1927 को बस्ती जिला, उत्तर प्रदेश में हुआ।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now
Instagram Group Join Now
  • पिता: श्री विश्वेश्वर दयाल
  • उनका बचपन ग्राम्य परिवेश, कुआनो नदी, पोखरों, खेतों और आंचलिक जीवन के बीच बीता।
    यही ग्रामीण अनुभव आगे चलकर उनकी कविता और कथा-साहित्य की मूल संवेदना बने।

प्रारंभिक जीवन और स्वभाव

बचपन से ही सर्वेश्वर जी विद्रोही, स्वतंत्रचेता और अन्याय-विरोधी स्वभाव के थे।
राजनीतिक गतिविधियों में रुचि के कारण उन्हें बस्ती के राजकीय हाईस्कूल से निकाल दिया गया, बाद में एंग्लो संस्कृत हाईस्कूल, बस्ती से उन्होंने 1941 में हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की।

ग्राम्य जीवन की मिट्टी की महक, सामाजिक विषमता और संघर्ष की पीड़ा को वे जीवनभर नहीं भूले।

शिक्षा

  • 1943 – क्वींस कॉलेज, वाराणसी से इंटरमीडिएट
  • आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी
  • बाद में इलाहाबाद (प्रयाग) जाकर
    • बी.ए.
    • 1949 – एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की

इसी दौरान उनकी माँ का निधन हुआ, जिसने उनके जीवन और लेखन पर गहरा भावनात्मक प्रभाव डाला।

शिक्षा के साथ संघर्ष और नौकरी

आर्थिक विपन्नता के कारण उन्होंने बस्ती के खैर इंडस्ट्रियल इंटर कॉलेज में नौकरी की (₹60 मासिक वेतन)।
परंतु साहित्यिक आकांक्षा उन्हें प्रयाग ले आई।

प्रयाग का साहित्यिक जीवन

  • ए.जी. ऑफिस में नौकरी (1955 तक)
  • साहित्यिक वातावरण में सक्रिय भागीदारी
  • ‘परिमल’ साहित्यिक संस्था की स्थापना (उर्दू शायर ताराशंकर ‘नाशाद’ के साथ)

पत्रकारिता एवं आकाशवाणी

  • 1955 – ऑल इंडिया रेडियो (हिंदी समाचार विभाग) में सहायक निर्माता
  • दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, इंदौर रेडियो केंद्रों में कार्य
  • पत्रकारिता ने उनकी कविता को समकालीन यथार्थ और जन-सरोकार से जोड़ा

‘दिनमान’ और ‘पराग’ से जुड़ाव

1964 में अज्ञेय के आग्रह पर वे आकाशवाणी छोड़कर ‘दिनमान’ साप्ताहिक से जुड़े।

  • ‘दिनमान’ में प्रकाशित उनका स्तंभ ‘चरचे और चरखे’ अत्यंत लोकप्रिय हुआ
  • 1982 – बाल पत्रिका ‘पराग’ के संपादक बने
  • ‘पराग’ के माध्यम से हिंदी बाल पत्रकारिता को नई दिशा और शिल्प दिया

साहित्यिक आरंभ और ‘तीसरा सप्तक’

  • काव्य-लेखन की शुरुआत: 1951
  • 1959 – पहला कविता संग्रह ‘काठ की घंटियाँ’
  • उसी वर्ष अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में उनकी कविताएँ शामिल हुईं

यहीं से वे नई कविता के प्रतिनिधि कवि के रूप में स्थापित हो गए।

काव्य-दृष्टि और वैचारिक आधार

उनके काव्य के विकास में दो प्रमुख तत्व रहे—

  1. भारतीय ग्राम्य जीवन की संवेदना
  2. समाजवादी विचारधारा

प्रयाग शुक्ल के अनुसार, उनके कवित्व के पाँच ठिकाने थे—

  • गाँव
  • परिवार
  • मित्र
  • सताए हुए लोग
  • प्रकृति (चिड़िया, घास, बारिश, टहनी)

प्रमुख काव्य संग्रह

  • काठ की घंटियाँ (1959)
  • बाँस का पुल
  • एक सूनी नाव
  • गर्म हवाएँ
  • कुआनो नदी
  • जंगल का दर्द
  • खूँटियों पर टँगे लोग
  • क्या कह कर पुकारूँ
  • कोई मेरे साथ चले

👉 ‘खूँटियों पर टँगे लोग’ के लिए उन्हें 1983 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।

कथा-साहित्य

उपन्यास / लघु उपन्यास

  • सोया हुआ जल
  • पागल कुत्तों का मसीहा
  • उड़े हुए रंग (सूने चौखटे)

कहानी संग्रह

  • अंधेरे पर अंधेरा
  • कच्ची सड़क

उनकी कथाओं में आम आदमी, व्यवस्था की क्रूरता और मनुष्य की विवशता सशक्त रूप में उभरती है।

नाट्य साहित्य

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के नाटक राजनीतिक व्यंग्य और सामाजिक आलोचना के लिए प्रसिद्ध हैं।

प्रमुख नाटक

  • बकरी (सबसे चर्चित)
  • हवालात
  • लड़ाई
  • अब ग़रीबी हटाओ
  • कल भात आएगा
  • लाख की नाक

बाल साहित्य

  • बतूता का जूता
  • महंगू की टाई
  • भों-भों खों-खों
  • लाख की नाक

उन्होंने बच्चों के लिए संवेदनशील, रचनात्मक और मूल्यपरक साहित्य रचा।

भाषा और शैली

  • सरल, बोलचाल की खड़ीबोली
  • लोक-भाषा और प्रतीकों का प्रभावी प्रयोग
  • व्यंग्य और करुणा का संतुलन
  • भावुकता के स्थान पर विचारों की ठोस भूमि

साहित्यिक महत्व

  • नई कविता को जनपक्षधर स्वर दिया
  • कविता को सामाजिक संघर्ष का माध्यम बनाया
  • नाटक और पत्रकारिता में राजनीतिक चेतना को धार दी

रघुवीर सहाय के अनुसार—

“सर्वेश्वर ने कविता को एक नई भाषा और नया रूप दिया।”


पुरस्कार एवं सम्मान

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1983)खूँटियों पर टँगे लोग

निधन

23 सितंबर 1983 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ।
हिंदी साहित्य ने एक जनकवि, निर्भीक पत्रकार और संवेदनशील रचनाकार को खो दिया।

Scroll to Top