परिचय
संत नाभादास 16वीं–17वीं शताब्दी के महान भक्ति संत, श्रेष्ठ भक्त-चरित्रकार और प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भक्तमाल’ के रचयिता थे।
उन्होंने भक्ति आंदोलन के संतों, भक्तों और आचार्यों के जीवन, कार्य और उपदेशों को एक ही ग्रंथ में एकत्रित करके भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक अद्वितीय आध्यात्मिक धरोहर छोड़ दी।
भक्तमाल में लगभग 200–300 से अधिक संतों की जीवनगाथा का संक्षेप है, जिसे बाद में कई भक्तों और टीकाकारों ने विस्तार दिया।
नाभादास की शैली, भाषा और दृष्टि उन्हें भक्ति साहित्य का “आधार स्तंभ” बनाती है।
1. जन्म और प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 16वीं सदी का प्रारंभ (अनुमानित 1537 ईस्वी)
- जन्म स्थान: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले का अग्रेर गाँव
- माता-पिता: उनके बारे में स्पष्ट ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं
- कुल/वर्ग: संप्रदायिक मते भिन्नता — कई विद्वान उन्हें वैष्णव-भक्त कुल का मानते हैं।
संत नाभादास ने अल्पायु में ही वैराग्य धारण कर लिया था।
कहते हैं कि बचपन से ही वे एकांत, भजन और साधु-संतों की संगति को पसंद करते थे।
उनका मन सांसारिक विषयों में नहीं लगता था।
2. वैष्णव भक्ति परंपरा में प्रवेश
संत नाभादास श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों के भक्त थे।
उनके आध्यात्मिक गुरु संत अचार्य प्रियादास माने जाते हैं।
भक्ति-मार्ग में प्रवेश के बाद नाभादास ने—
- संतों की यात्राएँ कीं
- आश्रमों में रहकर साधना की
- हरि-भक्ति, हरिनाम-स्मरण और संत-संगति को जीवन का लक्ष्य बना लिया
उनका अधिकांश समय संतों के जीवन और उपदेशों को संग्रहित करने में बीता।
3. संत नाभादास और संत मंडली
नाभादास उस समय के प्रमुख संतों—
- तुलसीदास
- अचार्य प्रियादास
- अचार्य विट्ठलनाथ
- हरीराम व्यास
- भगवंताचार्य
- श्रीहित हरिवंश जी
आदि के समकालीन थे।
कई कथाओं के अनुसार वे इन संतों के सीधे संपर्क में थे और इसी संगति ने उन्हें भक्त-चरित्र लेखन की प्रेरणा दी।
4. भक्तमाल की रचना – नाभादास का सबसे बड़ा योगदान
संत नाभादास का सबसे अमर और ऐतिहासिक कार्य है —
“भक्तमाल” की रचना
📌 भक्तमाल क्या है?
यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है जिसमें भक्ति आंदोलन के संतों की संक्षिप्त जीवन-रचना, उनकी भक्ति, विशेषताएँ और उपदेश उल्लेखित हैं।
यह ग्रंथ भक्ति साहित्य का विश्वकोश माना जाता है।
📌 भाषा
- अवधी
- सरल, भक्तिपूर्ण, सहज शब्दावली
📌 भक्तमाल में शामिल संत
- कबीर
- रैदास
- तुलसी
- मीरा
- नामदेव
- नानक
- पीपा
- जयदेव
- सूरदास
- नरसी मेहता
- अनेक वैष्णव-अचार्य
नाभादास ने संतों की पुन्य-गाथा को छोटे-छोटे दोहों और छंदों में लिखा, जिसे बाद में प्रियादास ने विस्तृत रूप दिया।
5. नाभादास की आध्यात्मिक मान्यताएँ
उनकी भक्ति मुख्यतः सगुण-साकार ईश्वर (राम-कृष्ण) की ओर केंद्रित थी।
लेकिन उन्होंने किसी भी संप्रदाय का विरोध नहीं किया।
प्रमुख आध्यात्मिक सिद्धांत
- ईश्वर एक है, उपासना के अनेक मार्ग हैं।
- सच्चा संत वही है जो विनम्र, दयालु और ईश्वर-निष्ठ हो।
- जन्म से नहीं, कर्म से मनुष्य महान बनता है।
- हरि-नाम जप ही कलियुग की श्रेष्ठ साधना है।
- संतों का सम्मान, सेवा और स्मरण मोक्ष का मार्ग है।
उनकी रचनाएँ भक्ति की सरलता, व्यापकता और निष्कपटता का अद्भुत उदाहरण हैं।
6. साहित्यिक योगदान (Works of Nabhadas)
✔ मुख्य ग्रंथ
- भक्तमाल – उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना
- कुछ आचार्य और साहित्यकार उनके नाम पर छोटे ग्रंथों और पदों का उल्लेख करते हैं, पर प्रमाणित रूप से “भक्तमाल” ही उनकी मुख्य और मौलिक रचना मानी जाती है।
✔ भाषा-शैली
- सरल अवधी
- भक्तिरस से पूर्ण
- दोहा/छंद आधारित
- कथन में सहजता, अर्थ में गहराई
7. संत नाभादास का निधन
- निधन: लगभग 1630 ईस्वी
- स्थान: गोकुल/वृंदावन क्षेत्र (मतभेद संभव)
