प्रस्तावना
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (1911–1987) हिंदी साहित्य के आधुनिक युग के सबसे प्रभावशाली और बहुआयामी रचनाकारों में गिने जाते हैं। वे कवि, कथाकार, उपन्यासकार, निबंधकार, पत्रकार, संपादक, विचारक और स्वतंत्रता सेनानी थे। हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद और नयी कविता आंदोलन को दिशा देने का श्रेय मुख्यतः अज्ञेय को ही जाता है।
उनका साहित्य व्यक्ति की स्वतंत्रता, आत्मबोध, अस्तित्व-बोध और आधुनिक चेतना का सशक्त प्रतिनिधित्व करता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन का जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया (आधुनिक कुशीनगर) में हुआ।
- जन्म-स्थान एक पुरातत्व उत्खनन स्थल था
- पिता एक पुरातत्वविद् थे, जिसके कारण अज्ञेय का बचपन विभिन्न स्थानों पर बीता
- यह घुमंतू जीवन आगे चलकर उनके साहित्य में यात्रा, अन्वेषण और जिज्ञासा के रूप में दिखाई देता है
शिक्षा और बौद्धिक निर्माण
अज्ञेय की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हुई, जहाँ उन्हें अनेक भाषाओं और विषयों का ज्ञान प्राप्त हुआ।
- संस्कृत
- फ़ारसी
- अंग्रेज़ी
- बांग्ला
उनका बचपन और किशोर जीवन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास जैसे स्थानों में बीता।
इस बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक वातावरण ने उन्हें प्रारंभ से ही अंतरराष्ट्रीय और आधुनिक दृष्टि प्रदान की।
क्रांतिकारी जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन
स्नातकोत्तर शिक्षा के दौरान अज्ञेय का संपर्क क्रांतिकारी गतिविधियों से हुआ।
- 1930 में पहली बार गिरफ्तार
- 1930 से 1936 तक विभिन्न जेलों में कारावास
- जेल में रहते हुए गहन अध्ययन और लेखन
जेल जीवन का प्रभाव
कारावास के दौरान अज्ञेय ने
- छायावाद
- मनोविज्ञान
- राजनीति विज्ञान
- अर्थशास्त्र
- विधि
जैसे विषयों का गंभीर अध्ययन किया।
यहीं उनके साहित्य में आत्मचिंतन, वैचारिक गहराई और प्रयोगशीलता का विकास हुआ।
‘अज्ञेय’ उपनाम की कथा
‘अज्ञेय’ उपनाम के पीछे एक रोचक साहित्यिक घटना जुड़ी हुई है।
- दिल्ली जेल में लिखी गई ‘साढ़े सात कहानियाँ’
- जैनेंद्र कुमार के माध्यम से प्रेमचंद तक पहुँचीं
- दो कहानियाँ स्वीकार की गईं
- लेखक का नाम उजागर करना उचित नहीं था
इसलिए लेखक का नाम ‘अज्ञेय’ (अर्थात अज्ञात) रखा गया।
बाद में अज्ञेय ने स्वीकार किया कि यह नाम उन्हें प्रारंभ में पसंद नहीं था, फिर भी यही नाम उनकी साहित्यिक पहचान बन गया।
उन्होंने रचनात्मक साहित्य ‘अज्ञेय’ नाम से और
आलोचना व विचार-लेखन अपने मूल नाम से प्रकाशित किया।
साहित्यिक व्यक्तित्व
अज्ञेय हिंदी साहित्य के सर्वाधिक बहुमुखी रचनाकारों में से एक हैं।
- कवि
- कथाकार
- उपन्यासकार
- निबंधकार
- आलोचक
- पत्रकार
- संपादक
उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तांत, डायरी, संस्मरण, नाटक और विचार-गद्य—सभी विधाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
प्रयोगवाद के प्रवर्तक
अज्ञेय को हिंदी कविता में प्रयोगवाद का प्रवर्तक माना जाता है।
- 1943 में संपादित ‘तार सप्तक’
- बाद में दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक
इन सप्तकों में प्रकाशित कविताओं ने परंपरागत छायावाद और प्रगतिवाद से हटकर नए काव्य प्रयोगों को जन्म दिया।
प्रयोगवाद की विशेषताएँ
- आत्मबोध
- व्यक्ति की स्वतंत्रता
- मनोवैज्ञानिक यथार्थ
- शिल्प और भाषा में नवीनता
नयी कविता आंदोलन
अज्ञेय को नयी कविता का पथ-प्रदर्शक भी माना जाता है।
- नयी कविता में
- व्यक्ति केंद्र में है
- अनुभूति और संवेदना प्रधान है
- वैचारिक स्वतंत्रता प्रमुख है
दूसरा और तीसरा सप्तक के कवि नयी कविता के प्रमुख स्तंभ बने।
अज्ञेय की काव्य-दृष्टि
अज्ञेय की कविता में
- अस्तित्व-बोध
- अकेलापन
- आत्मसंघर्ष
- आधुनिक मानव की पीड़ा
का गहन चित्रण मिलता है।
उनकी कविता संवेदना और बौद्धिकता का सुंदर संतुलन प्रस्तुत करती है।
प्रमुख काव्य-संग्रह
- भग्नदूत (1933)
- चिंता (1942)
- हरी घास पर क्षण भर (1949)
- बावरा अहेरी (1954)
- अरी ओ करुणा प्रभामय (1959)
- आँगन के पार द्वार (1961)
- कितनी नावों में कितनी बार (1967)
- पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (1974)
- महावृक्ष के नीचे (1977)
- नदी की बाँक पर छाया (1981)
कहानीकार के रूप में अज्ञेय
अज्ञेय की कहानियाँ मनोवैज्ञानिक और वैचारिक हैं।
प्रमुख कहानी-संग्रह
- विपथगा
- परंपरा
- कोठरी की बात
- शरणार्थी
- जयदोल
उपन्यासकार के रूप में अज्ञेय
अज्ञेय के उपन्यास हिंदी साहित्य के मील के पत्थर माने जाते हैं।
प्रमुख उपन्यास
- शेखर : एक जीवनी (दो भाग)
- नदी के द्वीप
- अपने-अपने अजनबी
इन उपन्यासों में व्यक्ति की आंतरिक यात्रा और आत्मसंघर्ष को गहराई से चित्रित किया गया है।
यात्रा-वृत्तांत, निबंध और अन्य विधाएँ
अज्ञेय ने हिंदी साहित्य को अनेक विधाओं से समृद्ध किया।
- यात्रा-वृत्तांत:
- अरे यायावर रहेगा याद?
- एक बूँद सहसा उछली
- निबंध-संग्रह:
- सबरंग
- त्रिशंकु
- आत्मनेपद
- डायरी:
- भवंती
- अंतरा
- शाश्वती
- नाटक:
- उत्तरप्रियदर्शी
संपादक के रूप में योगदान
अज्ञेय एक महान संपादक भी थे।
- तार सप्तक
- दूसरा सप्तक
- तीसरा सप्तक
- आधुनिक हिंदी साहित्य
- नए एकांकी
इन संकलनों ने आधुनिक हिंदी साहित्य की दिशा तय की।
सम्मान और पुरस्कार
अज्ञेय को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए।
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964)
– आँगन के पार द्वार के लिए - ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978)
– कितनी नावों में कितनी बार के लिए
मृत्यु
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का निधन 4 अप्रैल 1987 को नई दिल्ली में हुआ।
