प्रस्तावना
राजेन्द्र यादव हिंदी साहित्य के उन विरल लेखकों में से थे जिन्होंने केवल साहित्य सृजन ही नहीं किया, बल्कि साहित्य को सामाजिक हस्तक्षेप का सशक्त माध्यम बनाया। वे हिंदी कथा साहित्य के ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रमुख स्तंभ, निर्भीक संपादक, प्रखर विचारक और सामाजिक सरोकारों के प्रतिबद्ध लेखक थे। उनका संपूर्ण साहित्य मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों, स्त्री-पुरुष संबंधों, सामाजिक पाखंड और राजनीतिक चेतना को गहराई से अभिव्यक्त करता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
राजेन्द्र यादव का जन्म 28 अगस्त 1929 को आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका परिवार मध्यमवर्गीय था, जहाँ शिक्षा और वैचारिक स्वतंत्रता का वातावरण मौजूद था। यही कारण रहा कि बचपन से ही उनमें पढ़ने-लिखने और समाज को समझने की प्रवृत्ति विकसित हो गई।
उनकी पत्नी मन्नू भंडारी स्वयं हिंदी साहित्य की एक प्रतिष्ठित लेखिका और उपन्यासकार थीं। दोनों का दांपत्य जीवन साहित्यिक संवाद, वैचारिक असहमति और रचनात्मक साझेदारी का अनूठा उदाहरण रहा।
शिक्षा
राजेन्द्र यादव ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा आगरा में प्राप्त की। बाद में उन्होंने मेरठ के मवाना में भी अध्ययन किया।
- 1949 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की
- 1951 में आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया
उनकी अकादमिक शिक्षा ने उनके भीतर साहित्य के साथ-साथ सामाजिक चिंतन को भी गहराई प्रदान की।
साहित्यिक जीवन की शुरुआत
राजेन्द्र यादव का साहित्यिक जीवन बहुत कम उम्र में शुरू हो गया था। उनकी सृजनशीलता प्रारंभ से ही सक्रिय रही। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संपादन और अनुवाद — हिंदी साहित्य की लगभग हर विधा में प्रभावशाली योगदान दिया।
उनका पहला उपन्यास ‘प्रेत बोलते हैं’ (1951) था, जिसे बाद में ‘सारा आकाश’ नाम दिया गया। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में इसलिए ऐतिहासिक माना जाता है क्योंकि इसने रूढ़िवादी सामाजिक मूल्यों और पारिवारिक ढाँचों पर सीधा प्रहार किया।
‘सारा आकाश’ और समानांतर सिनेमा
‘सारा आकाश’ को 1969 में प्रसिद्ध फिल्मकार बासु चटर्जी ने फिल्म रूप में प्रस्तुत किया। यह फिल्म मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ के साथ मिलकर हिंदी के समानांतर सिनेमा आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है।
इस उपन्यास और फिल्म ने मध्यवर्गीय युवक-युवती के मानसिक द्वंद्व, वैवाहिक तनाव और सामाजिक दबावों को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया।
नई कहानी आंदोलन में योगदान
राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर के साथ मिलकर हिंदी साहित्य के ‘नई कहानी’ आंदोलन के प्रमुख अग्रदूत बने।
नई कहानी आंदोलन की विशेषताएँ थीं—
- यथार्थवादी दृष्टिकोण
- मध्यवर्गीय जीवन की समस्याएँ
- व्यक्ति की आंतरिक टूटन
- सामाजिक-राजनीतिक चेतना
राजेन्द्र यादव की कहानियाँ भावुकता से अधिक बौद्धिक तीक्ष्णता और सामाजिक प्रश्नों पर केंद्रित रहीं।
प्रमुख उपन्यास
राजेन्द्र यादव ने कम लेकिन प्रभावशाली उपन्यास लिखे—
- सारा आकाश
- उखरे हुए लोग — जड़विहीनता और अस्तित्व संकट का उपन्यास
- कुल्टा — स्त्री-स्वतंत्रता और सामाजिक नैतिकता पर प्रश्न
- शाह और मात — सत्ता, राजनीति और व्यक्ति के संबंधों की कथा
कहानियाँ और अन्य रचनाएँ
उनकी कहानियाँ मध्यवर्गीय जीवन के दबे-कुचले यथार्थ को उजागर करती हैं।
- रौशनी कहाँ है
- अगले लोक में दो
- रैंडुआ
अनुवाद कार्य
राजेन्द्र यादव ने विश्व साहित्य को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने—
- तुर्गनेव
- चेखव
- लेर्मोंतोव
- अल्बर्ट कामू (द आउटसाइडर)
जैसे लेखकों की रचनाओं का हिंदी अनुवाद किया।
‘हंस’ पत्रिका का संपादन
राजेन्द्र यादव का संपादकीय जीवन उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना उनका रचनात्मक जीवन।
उन्होंने 31 जुलाई 1986 को, प्रेमचंद की स्मृति में, बंद हो चुकी प्रतिष्ठित पत्रिका ‘हंस’ का पुनर्प्रकाशन शुरू किया।
‘हंस’ के माध्यम से उन्होंने—
- स्त्री विमर्श को केंद्रीय स्थान दिया
- दलित साहित्य को मंच प्रदान किया
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन किया
- सत्ता और समाज की आलोचना को निर्भीक स्वर दिया
उनकी स्पष्टवादिता के कारण कई बार विवाद भी हुए, लेकिन वे कभी पीछे नहीं हटे।
सामाजिक और वैचारिक दृष्टि
राजेन्द्र यादव का मानना था कि—
“साहित्य का काम समाज को खुश करना नहीं, उसे असहज करना है।”
वे स्त्री अधिकारों, दलित सशक्तिकरण और सामाजिक समानता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने साहित्य को आंदोलन का स्वर दिया।
अन्य दायित्व
- 1999–2001 : प्रसार भारती के मनोनीत बोर्ड सदस्य
- अनेक साहित्यिक मंचों और विचार गोष्ठियों में सक्रिय सहभागिता
पुरस्कार और सम्मान
- यश भारती पुरस्कार – उत्तर प्रदेश सरकार (2013)
- साहित्यिक योगदान के लिए राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान
- हिंदी साहित्य में आजीवन योगदान के लिए व्यापक सम्मान
निधन
राजेन्द्र यादव का निधन 28 अक्टूबर 2013 को नई दिल्ली में हुआ। वे 84 वर्ष के थे। उनके निधन से हिंदी साहित्य ने एक निर्भीक, विचारशील और जनपक्षधर लेखक को खो दिया।
