प्रस्तावना
मृदुला गर्ग आधुनिक हिंदी साहित्य की एक सशक्त, निर्भीक और वैचारिक रूप से स्वतंत्र लेखिका हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य को ऐसे विषय दिए जिन पर पहले खुलकर बात नहीं होती थी। नारी स्वतंत्रता, स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता, सामाजिक बंधन, मानसिक संघर्ष और व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता उनकी रचनाओं के केंद्र में रहे हैं। उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध, व्यंग्य और यात्रा-संस्मरण—सभी विधाओं में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
मृदुला गर्ग का जन्म 25 अक्टूबर 1938 को कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में हुआ। उनका परिवार शिक्षित और प्रगतिशील विचारों वाला था, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व और लेखन पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। बचपन से ही वे अध्ययनशील और स्वतंत्र सोच रखने वाली रहीं। सामाजिक विषमताओं और स्त्री की स्थिति को वे बहुत निकट से देखती-समझती रहीं, जिसने आगे चलकर उनके लेखन को वैचारिक गहराई प्रदान की।
शिक्षा और बौद्धिक निर्माण
मृदुला गर्ग ने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर (M.A.) की उपाधि प्राप्त की। उच्च शिक्षा के दौरान उनका झुकाव साहित्य, समाज और मनोविज्ञान की ओर अधिक हुआ। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में लगभग तीन वर्षों तक अध्यापन भी किया। शिक्षण कार्य ने उन्हें समाज और युवा पीढ़ी की मानसिकता को गहराई से समझने का अवसर दिया, जिसका लाभ उनकी रचनात्मक दृष्टि को मिला।
लेखन की शुरुआत और साहित्यिक यात्रा
मृदुला गर्ग की साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कहानी लेखन से हुई। उनकी पहली कहानी ‘रुकावट’ वर्ष 1972 में प्रसिद्ध पत्रिका ‘सारिका’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद वे निरंतर लिखती रहीं और शीघ्र ही हिंदी साहित्य में एक अलग पहचान बना ली।
उनका पहला उपन्यास ‘उसके हिस्से की धूप’ (1975) था, जिसने उन्हें साहित्य जगत में स्थापित कर दिया। इसके बाद उनके उपन्यासों ने कथ्य और शिल्प—दोनों स्तरों पर परंपरागत सोच को चुनौती दी।
उपन्यासों में विचार और नवीनता
मृदुला गर्ग के उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र सोच रखने वाले मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनका चर्चित उपन्यास ‘चित्तकोबरा’ स्त्री-पुरुष संबंधों में देह और मन के द्वंद्व को सामने लाने के कारण अत्यंत विवादास्पद और चर्चित रहा।
उनके उपन्यास सामाजिक नैतिकता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विवाह संस्था और स्त्री की पहचान जैसे विषयों पर गहन विमर्श प्रस्तुत करते हैं।
प्रमुख उपन्यास
- उसके हिस्से की धूप
- वंशज
- चित्तकोबरा
- अनित्य
- मैं और मैं
- कठगुलाब
- मिलजुल मन
- वसु का कुटुम
कहानी लेखन में योगदान
कहानी लेखन में मृदुला गर्ग ने आम जीवन की सूक्ष्म सच्चाइयों को बड़ी सहजता से उकेरा है। उनकी कहानियाँ स्त्री-जीवन, मध्यवर्गीय समाज, रिश्तों की टूटन और मानसिक अकेलेपन को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती हैं। उनकी भाषा सरल होते हुए भी तीखी और प्रभावशाली है।
प्रमुख कहानी संग्रह
- कितनी कैदें
- टुकड़ा टुकड़ा आदमी
- डैफ़ोडिल जल रहे हैं
- ग्लेशियर से
- उर्फ सैम
- शहर के नाम
- समागम
- संगति विसंगति
- जूते का जोड़ गोभी का तोड़
- मेरे देश की मिट्टी अहा
नाटक, निबंध और व्यंग्य लेखन
मृदुला गर्ग ने नाटक लेखन में भी अपनी अलग पहचान बनाई। उनके नाटकों में स्त्री की मानसिक स्वतंत्रता और सामाजिक दबावों का गहन विश्लेषण मिलता है।
इसके साथ-साथ उन्होंने निबंध और व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर तीखी टिप्पणी की। वे ‘इंडिया टुडे’ (हिंदी) में ‘कटाक्ष’ नामक स्तंभ भी लिखती रहीं, जो अपने व्यंग्य और स्पष्टता के लिए चर्चित रहा।
प्रमुख नाटक
- एक और अजनबी
- जादू का कालीन
- तीन कैदें
- सामदाम दंड भेद
निबंध और व्यंग्य संग्रह
- रंग ढंग
- चुकते नहीं सवाल
- कृति और कृतिकार
- कर लेंगे सब हज़म
- खेद नहीं है
साहित्यिक शैली और वैचारिक दृष्टि
मृदुला गर्ग की साहित्यिक शैली स्पष्ट, निर्भीक और तर्कसंगत है। वे किसी भी विचारधारा की कट्टर समर्थक न होकर मानवीय स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानती हैं। नारीवाद उनके लेखन में नारे की तरह नहीं, बल्कि जीवन-अनुभव के रूप में उपस्थित है। वे स्त्री और पुरुष दोनों को सामाजिक बंधनों से मुक्त देखने की पक्षधर हैं।
सम्मान और पुरस्कार
मृदुला गर्ग को उनके साहित्यिक योगदान के लिए देश-विदेश में अनेक सम्मान प्राप्त हुए।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (2013) – मिलजुल मन
- व्यास सम्मान (2004) – कठगुलाब
- महाराजा वीर सिंह पुरस्कार – उसके हिस्से की धूप
- हिंदी अकादमी, दिल्ली – साहित्यकार सम्मान
- हेलमैन-हैमेट ग्रांट (Human Rights Watch, न्यूयॉर्क)
- राम मनोहर लोहिया सम्मान
- डी.लिट. (मानद उपाधि)
