जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
ममता कालिया का जन्म 2 नवंबर 1940 को वृंदावन, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका पारिवारिक वातावरण साहित्यिक और बौद्धिक था। उनके पिता स्वर्गीय विद्याभूषण अग्रवाल हिंदी और अंग्रेजी साहित्य के विद्वान थे। उन्होंने पहले अध्यापन कार्य किया और बाद में आकाशवाणी से जुड़े। पिता के विद्वतापूर्ण व्यक्तित्व और साहित्यिक रुचि का ममता कालिया के जीवन और लेखन पर गहरा प्रभाव पड़ा। बचपन से ही उन्होंने भाषा, समाज और स्त्री-जीवन को बहुत निकट से देखा और समझा।
शिक्षा और बौद्धिक विकास
ममता कालिया की शिक्षा भारत के कई शहरों—दिल्ली, मुंबई, पुणे, नागपुर और इंदौर—में हुई, जिससे उन्हें विविध सामाजिक और सांस्कृतिक अनुभव प्राप्त हुए। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। अंग्रेजी साहित्य की गहन पढ़ाई ने उनके लेखन को वैचारिक व्यापकता, वैश्विक दृष्टि और शिल्पगत सुदृढ़ता प्रदान की।
शैक्षणिक और प्रशासनिक जीवन
उच्च शिक्षा पूर्ण करने के बाद ममता कालिया ने दिल्ली और मुंबई के विभिन्न महाविद्यालयों में अंग्रेजी की प्राध्यापिका के रूप में कार्य किया। बाद में वे इलाहाबाद के एक डिग्री कॉलेज की प्राचार्य रहीं और इसी पद से सेवानिवृत्त हुईं। शिक्षण और प्रशासनिक अनुभव ने उन्हें समाज, शिक्षा व्यवस्था और स्त्री की पेशेवर चुनौतियों को भीतर से समझने का अवसर दिया, जो उनके साहित्य में यथार्थ के रूप में उभरता है।
संपादन और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ाव
ममता कालिया साहित्यिक संस्थानों और पत्रिकाओं से भी सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। वे भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता की निदेशक रह चुकी हैं। इसके अतिरिक्त वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की त्रैमासिक पत्रिका ‘हिंदी’ की संपादिका भी रही हैं। संपादकीय कार्य ने उन्हें समकालीन हिंदी साहित्य की दिशा और प्रवृत्तियों को गहराई से देखने का अवसर दिया।
साहित्यिक यात्रा और रचनात्मक विस्तार
ममता कालिया की साहित्यिक उपस्थिति सातवें दशक (1970 के आसपास) से निरंतर बनी हुई है। लगभग पचास वर्षों से अधिक के साहित्यिक जीवन में उन्होंने 200 से अधिक कहानियाँ लिखीं। वे उन विरल लेखिकाओं में हैं जिन्होंने कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक, निबंध, संस्मरण, अनुवाद और पत्रकारिता—सभी विधाओं में समान अधिकार के साथ लेखन किया।
उनकी रचनाएँ नारीवादी चेतना से जुड़ी होने के बावजूद केवल वैचारिक घोषणाएँ नहीं हैं, बल्कि मध्यमवर्गीय भारतीय स्त्री के जीवन का जीवंत दस्तावेज़ हैं।
कहानी लेखन में योगदान
ममता कालिया की कहानियाँ सामान्य जीवन की असामान्य सच्चाइयों को उजागर करती हैं। वे स्त्री के अकेलेपन, दांपत्य की जटिलताओं, सामाजिक पाखंड और रोज़मर्रा के संघर्षों को सहज, व्यंग्यात्मक और तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत करती हैं।
प्रमुख कहानी संग्रह
- छुटकारा
- एक अदद औरत
- सीट नम्बर छह
- उसका यौवन
- जाँच अभी जारी है
- प्रतिदिन
- मुखौटा
- निर्मोही
- थिएटर रोड के कौए
- पच्चीस साल की लड़की
उपन्यासों में यथार्थ और स्त्री-दृष्टि
ममता कालिया के उपन्यास आधुनिक हिंदी उपन्यास परंपरा में स्त्री-अनुभव के प्रामाणिक दस्तावेज़ माने जाते हैं। उनके उपन्यासों में शहरी मध्यवर्ग, नौकरीपेशा स्त्री, विवाह संस्था, अकेलापन और सामाजिक दबाव प्रमुखता से उभरते हैं।
प्रमुख उपन्यास
- बेघर (1971)
- नरक दर नरक (1975)
- प्रेम कहानी (1980)
- लड़कियाँ (1987)
- एक पत्नी के नोट्स (1997)
- दौड़ (2000)
- अँधेरे का ताला (2009)
- दुक्खम-सुक्खम (2009)
- कल्चर वल्चर (2016)
- सपनों की होम डिलीवरी (2017)
कविता, नाटक और अन्य विधाएँ
ममता कालिया की कविताओं में घरेलू स्त्री, उसकी चुप्पी और उसकी बेचैनी मुखर होती है। नाटकों में सामाजिक पाखंड और स्त्री की स्थिति पर व्यंग्यात्मक दृष्टि दिखाई देती है।
कविता संग्रह
- खाँटी घरेलू औरत
- कितने प्रश्न करूँ
- प्रेम कहानी
नाटक संग्रह
- यहाँ रहना मना है
- आप न बदलेंगे
अन्य रचनाएँ
- संस्मरण: कितने शहरों में कितनी बार
- अनुवाद: मानवता के बंधन (सॉमरसेट मॉम का उपन्यास)
- संपादन: बीसवीं सदी का हिंदी महिला-लेखन (खंड 3)
साहित्यिक शैली और वैचारिक विशेषताएँ
ममता कालिया का लेखन सजावटी नहीं, सीधा और ईमानदार है। वे नारी-विमर्श को नारेबाज़ी के बजाय जीवन-अनुभव के स्तर पर प्रस्तुत करती हैं। व्यंग्य, आत्मस्वीकृति और संवेदनशीलता उनके लेखन की प्रमुख पहचान है। उनकी भाषा सहज, संवादात्मक और प्रभावशाली है, जिससे पाठक सीधे जुड़ता है।
पुरस्कार और सम्मान
ममता कालिया को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
- व्यास सम्मान (2017) – दुक्खम-सुक्खम
- साहित्य भूषण सम्मान (2004)
- यशपाल स्मृति सम्मान
- महादेवी वर्मा स्मृति पुरस्कार
- कमलेश्वर स्मृति सम्मान
- सावित्री बाई फुले स्मृति सम्मान
- लमही सम्मान (2009)
- जनवाणी सम्मान (2008)
- सीता पुरस्कार (2012)
- अभिनव भारती सम्मान
- अमृत सम्मान
