महाकवि भूषण रीतिकाल के एक प्रमुख कवि थे, जो वीर रस के विशेष प्रवर्तक माने जाते हैं। वे अपने युग के नायकों, जैसे शिवाजी और छत्रसाल, के शौर्य और वीरता का गुणगान करने के लिए प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म 1613 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के तिकवांपुर, कानपुर जिले में हुआ था।
1. जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 1613 ईस्वी
- जन्मस्थान: तिकवांपुर, कानपुर, उत्तर प्रदेश
- पिता: रत्नाकर त्रिपाठी
- भाई: मतिराम और चिंतामणि त्रिपाठी
- जाति: कान्यकुब्ज ब्राह्मण
प्रारंभिक जीवन
भूषण का बचपन संघर्षपूर्ण और साधारण था। कहा जाता है कि वे प्रारंभ में अल्पकुशल और आलसी माने जाते थे। एक प्रसंग के अनुसार, जब भाभी ने उन्हें ताना दिया कि “नमक कमाकर लाए हो?” तो भूषण ने घर छोड़ दिया और कहा –
“कमाकर लाएंगे तभी खाएंगे।”
बाद में उन्होंने अपनी प्रतिभा से एक लाख रुपए का नमक भाभी को भिजवाया, जिससे उनकी दृढ़ता और जीवन के संघर्ष की झलक मिलती है।
2. आश्रयदाता और प्रतिष्ठा
भूषण ने अपने जीवनकाल में कई राजाओं और शासकों के संरक्षण में रहकर कविता रची, लेकिन उनके प्रमुख आश्रयदाता थे:
- चित्रकूट के राजा रुद्र प्रताप सिंह (सोलंकी वंश) – इन्हीं से उन्होंने ‘भूषण’ की उपाधि प्राप्त की।
- शिवाजी महाराज – उनका आदर्श और प्रेरणा स्रोत।
- छत्रसाल बुंदेला – वीरता और शौर्य के लिए उनकी प्रशंसा की।
भूषण का जीवन और काव्य उनकी राष्ट्रीय चेतना और वीरता के भावों से गहराई से जुड़ा था।
3. साहित्यिक जीवन और योगदान
भूषण रीतिकाल के कवि थे, लेकिन उन्होंने श्रृंगार रस से हटकर वीर रस को प्रमुखता दी।
काव्यगत विशेषताएँ
- मुख्य रस: वीर रस
- प्रमुख विषय: शौर्य, वीरता, देशभक्ति, नायक-गाथा
- शैली: कवित्त, सवैया, मुक्तक
- भाषा: ब्रजभाषा, जिसमें प्राकृत, अरबी, फारसी और बुंदेलखंडी शब्दों का समावेश
- अलंकार: शब्दों का अत्यंत ललित और सजीव प्रयोग, अनुप्रास और यमक का मार्मिक उपयोग
भूषण की कविता इतिहासपरक, प्रेरक और राष्ट्रवादी भाव से ओतप्रोत होती थी।
4. प्रमुख रचनाएँ
भूषण की रचनाएँ वीर रस में अपूर्व योगदान रखती हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं:
- शिवराज भूषण – शिवाजी के शौर्य का वर्णन और वीर रस का अलंकारिक प्रदर्शन।
- शिवाबावनी – शिवाजी के 52 युद्धों और विजय गाथाओं का चित्रण।
- छत्रसाल दशक – छत्रसाल बुंदेला के शौर्य का वर्णन।
इन ग्रंथों में भूषण ने न केवल वीर रस का सुंदर चित्रण किया, बल्कि राष्ट्रभक्ति, युद्धनीति और शौर्य की प्रेरणा भी दी।
5. भाषा और शैली
भूषण की कविता का प्रमुख आकर्षण उनकी भाषा और अलंकारिक शैली है।
- भाषा: ब्रजभाषा में प्रवीण, शब्दों की शक्ति और ध्वनि-चित्रण का अद्भुत प्रयोग
- अलंकार: अनुप्रास, यमक, मिश्रभाषा शैली (प्राकृत, फारसी, अरबी, बुंदेलखंडी)
- काव्य शैली: कवित्त, सवैया, मुक्तक – जिसमें वीर रस और ओजपूर्ण शब्दावलियाँ
उनकी शैली विरल, प्रेरक और रोमांचक थी, जिससे पाठक वीरता और साहस की अनुभूति कर सके।
6. साहित्यिक महत्त्व और विरासत
- भूषण को “राष्ट्रीय चेतना और वीर रस के कवि” के रूप में जाना जाता है।
- उनके काव्य ने रीतिकाल के कवियों में वीर रस और देशभक्ति का नया आदर्श स्थापित किया।
- उनके शौर्य और वीरता वर्णन ने इतिहास और कविता का संगम किया।
- वे रीतिकाल के उन कवियों में गिने जाते हैं जिन्होंने कविता में सृजनात्मक स्वतंत्रता और वीरता का मिश्रण प्रस्तुत किया।
7. मृत्यु
महाकवि भूषण का निधन 1715 ईस्वी में हुआ। उनके साहित्य और वीर रस की महिमा आज भी हिंदी साहित्य में गूंजती है।
