लक्ष्मीबाई केलकर (जन्म– 6 जुलाई 1905, नागपुर, मृत्यु– 27 नवम्बर 1978) भारत की एक महान समाज सुधारक, नारी जागरण की अग्रदूत और राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका थीं। उन्हें पूरे देश में सम्मानपूर्वक “मौसी जी” के नाम से जाना जाता है।
लक्ष्मीबाई केलकर ने भारतीय समाज में महिलाओं की शक्तियों को पहचान दिलाने, उन्हें संगठित करने और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में सक्रिय रूप से जोड़ने के लिए असाधारण योगदान दिया। उनका जीवन त्याग, सेवा, साहस और संगठन-कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है।
प्रारंभिक जीवन
- जन्म : 6 जुलाई 1905, नागपुर, महाराष्ट्र
- मूल नाम : कमल
- परिवार : साधारण मध्यमवर्गीय, संस्कारी और राष्ट्रवादी वातावरण
छोटे से ही उनके भीतर देशभक्ति, सेवा-भावना और समाज के प्रति गहरी संवेदनाएँ थीं। यही कारण था कि साधारण परिवार में जन्म लेने के बावजूद वे आगे चलकर भारत के नारी जागरण का एक स्तंभ बनीं।
विवाह एवं पारिवारिक जीवन
केवल 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह वर्धा के एक विधुर वकील पुरुषोत्तम राव केलकर से हुआ।
विवाह के बाद:
- वे 6 पुत्रों की माता बनीं।
- साथ ही अपने पति की बाल-विधवा ननद का दायित्व भी इनके सिर पर आ गया।
परिवार बड़ा होने के बावजूद लक्ष्मीबाई ने कभी अपने समाज-सेवा कार्यों को पीछे नहीं छोड़ा।
रूढ़िवादिता से संघर्ष
लक्ष्मीबाई केलकर सामाजिक कुरीतियों से मुकाबला करने के लिए जानी जाती थीं।
उन्होंने –
- अपने घर में हरिजन नौकर रखकर जाति-पांति की दीवारें तोड़ीं
- गांधीजी से प्रेरित होकर चरखा चलाया
- गांधीजी की एक सभा में अपनी सोने की जंजीर दान कर दी
उनका जीवन सामाजिक समानता और मानवता के मूल्यों पर आधारित था।
पति का देहांत और संघर्ष
सन 1932 में उनके पति का निधन हो गया।
इसके बाद:
- पूरे परिवार का दायित्व उन्हीं पर आ गया।
- आर्थिक कठिनाइयों से निपटने के लिए उन्होंने घर के 2 कमरे किराए पर दे दिए।
- उन्होंने साहस और संयम के साथ परिवार, समाज और संगठन—सबका नेतृत्व किया।
RSS के संपर्क में आने का अवसर
उनके बेटों ने RSS की शाखा में जाना शुरू किया।
बच्चों में आए:
- अनुशासन
- आचार
- राष्ट्रभक्ति
जैसे गुणों को देखकर लक्ष्मीबाई केलकर प्रभावित हुईं और डॉ. केशवराव हेडगेवार से मिलने गईं।
यहीं से उनके जीवन का ऐतिहासिक मोड़ शुरू हुआ।
राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना (1936)
1936 में उन्होंने स्त्रियों के लिए एक समर्पित संगठन की स्थापना की—
“राष्ट्र सेविका समिति”
यह संगठन महिलाओं को—
- आत्मनिर्भर
- संस्कारी
- राष्ट्रवादी
- समाजसेवी
- चरित्रवान
बनाने की दिशा में कार्य करता है।
उन्होंने अगले 10 वर्षों तक लगातार भारत भ्रमण करके इस संगठन को राज्य-दर-राज्य फैलाया।
🕊 स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन काल में योगदान
सन 1945 में समिति का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ।
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ और देश का विभाजन हुआ, तब लक्ष्मीबाई केलकर कराची में थीं।
उन्होंने सेविकाओं को निर्देश दिया —
- अपने साहस को बनाए रखें
- अपनी पवित्रता और चरित्र की रक्षा करें
- किसी भी परिस्थिति का मुकाबला करें
उन्होंने अनेक हिंदू परिवारों को भारत लाने और सुरक्षित पहुंचाने का प्रबंध भी किया।
यह उनकी दूरदृष्टि और मातृ-शक्ति को संगठित करने की क्षमता का अद्भुत उदाहरण है।
नारी शक्ति के तीन आदर्श
लक्ष्मीबाई केलकर ने भारतीय नारी के आदर्श इन तीन ऐतिहासिक स्त्रियों को माना—
- जीजाबाई – मातृत्व और संस्कार
- अहल्याबाई होलकर – प्रशासन और कर्तृत्व
- रानी लक्ष्मीबाई – नेतृत्व और वीरता
समाज में चलाए गए प्रमुख प्रकल्प
उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक संस्थाएँ और योजनाएँ शुरू कीं—
- बाल मंदिर
- भजन मंडली
- योग वर्ग
- बालिका छात्रावास
- सेवा केंद्र
- समिति कार्यालय
वे एक उत्कृष्ट रामायण प्रवचनकार भी थीं। प्रवचनों की आय से उन्होंने समिति के अनेक भवन बनवाए।
उनके लिखे एवं योगदान
- नारी शिक्षा
- राष्ट्रवाद
- समाज सुधार
- संगठन विकास
- अध्यात्म
- आदर्श नारी निर्माण पर निरंतर कार्य
उनकी सोच हमेशा –
“नारी जागेगी, तो राष्ट्र जागेगा”
पर आधारित रही।
मृत्यु
27 नवम्बर 1978 को लक्ष्मीबाई केलकर का देहांत हुआ।
उनका जीवन भारत की नारी शक्ति के लिए प्रेरणा-स्रोत बना हुआ है।
