लाला श्रीनिवासदास (1850–1907) आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतिहास में वह साहित्यकार हैं जिनके नाम पर हिन्दी के प्रथम मौलिक उपन्यास “परीक्षागुरु” का श्रेय सुरक्षित है। भारतेंदु युग के प्रमुख नाटककार, समाज-सुधारक और खड़ी बोली के समर्थ प्रयोगधर्मी लेखक के रूप में वे साहित्य-जगत में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनकी रचनाएँ भारतीय समाज, नैतिक मूल्यों, शिक्षा, संस्कार और पारिवारिक दायित्वों के यथार्थ चित्रण के लिए जानी जाती हैं।
जन्म, परिवार और प्रारंभिक शिक्षा
लाला श्रीनिवासदास का जन्म सन् 1850 ई. में मथुरा (उत्तर प्रदेश) के एक संभ्रांत एवं शिक्षित परिवार में हुआ। परिवार में धार्मिकता, संस्कृतता और नैतिक संस्कारों का गहरा वातावरण था।
शिक्षा
वे बहुभाषी विद्वान थे—
- हिन्दी
- उर्दू
- संस्कृत
- फ़ारसी
- अंग्रेज़ी
इन सभी भाषाओं का उत्कृष्ट ज्ञान उन्हें साहित्यिक लेखन, संवाद रचना और व्यावहारिक जीवन के अनुभवों को गहराई से व्यक्त करने में सहायक सिद्ध हुआ।
उनका व्यक्तित्व व्यवहारिक, संतुलित और अनुभवसम्पन्न था, जो उनकी भाषा-शैली और लेखन कौशल में स्पष्ट दिखाई देता है।
साहित्यिक जीवन का प्रारंभ
भारतेंदु हरिश्चंद्र के समकालीन लेखकों में लाला श्रीनिवासदास का विशेष महत्व है। साहित्यिक वातावरण, मित्रमंडल और नाट्य-लेखन की परंपरा से प्रभावित होकर उन्होंने लेखन आरम्भ किया।
हिन्दी नाटक को आधुनिक स्वरूप देने वालों में उनका नाम अग्रणी माना जाता है।
लाला श्रीनिवासदास की प्रमुख रचनाएँ
1. “परीक्षागुरु” – हिन्दी का पहला मौलिक उपन्यास
प्रकाशन : 25 नवम्बर 1882
रामचंद्र शुक्ल ने इसे “अंग्रेज़ी ढंग का हिन्दी का पहला उपन्यास” माना है।
उपन्यास की मुख्य विशेषताएँ
- सभ्रांत परिवारों के युवाओं की गलत संगत और नैतिक पतन का चित्रण
- मध्यवर्गीय समाज का यथार्थ वर्णन
- औपनिवेशिक समाज में भारतीय सांस्कृतिक पहचान बचाने का संघर्ष
- जीवन-शिक्षा, सदाचार, व्यवहारिक बुद्धिमत्ता पर केंद्रित
- सरल, साफ-सुथरी और बोलचाल की खड़ी बोली
यह उपन्यास सामाजिक सुधार और युवा वर्ग के मार्गदर्शन का श्रेष्ठ उदाहरण है।
2. प्रमुख नाटक
लाला श्रीनिवासदास को नाटक लेखन में भारतेंदु हरिश्चंद्र के समकक्ष माना गया है।
उनके मुख्य नाटक—
(1) प्रह्लाद चरित्र
- 11 दृश्यों वाला बड़ा नाटक
- पौराणिक आधार लेकिन संवाद अपेक्षाकृत सरल
- धार्मिक और नैतिक शिक्षाओं पर बल
(2) तप्ता संवरण (1874 / 1883)
- “हरिश्चंद्र मैगज़ीन” में प्रथम प्रकाशन
- तप्ता और संवरण की पौराणिक प्रेमकथा
(3) रणधीर और प्रेममोहनी (संवत 1934)
- “रोमियो ऐंड जुलियट” से प्रेरित
- अंग्रेज़ी नाट्य शिल्प और कथानक की शैली
- काल्पनिक मध्ययुगीन राजकुमार-राजकुमारी की कथा
यह नाटक अपने समय में अत्यंत चर्चित हुआ।
(4) संयोगिता स्वयंवर
- पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता के हरण की लोकप्रिय कथा
- ऐतिहासिक प्रसंग पर आधारित
3. निबंध
लाला श्रीनिवासदास ने उपयोगी, सुधारवादी और सामाजिक दृष्टिकोण वाले निबंध भी लिखे।
मुख्य निबंध
- भरतखंड की समृद्धि
- सदाचार
उनके निबंधों में स्पष्टता, उद्देश्यबद्धता और सरल अभिव्यक्ति प्रमुख है।
भाषा-शैली
लाला श्रीनिवासदास भाषा के व्यवहार-कुशल कलाकार थे। उनके लेखन में—
- खड़ी बोली का शुद्ध, सहज और व्यावहारिक प्रयोग
- उर्दू-फ़ारसी शब्दों का उपयुक्त समावेश
- संवादों में स्वाभाविकता
- सामाजिक यथार्थ का सजीव चित्रण
- अनावश्यक अलंकारिकता से परहेज़
उन्हें भाषा की मितव्ययिता और स्पष्टता का उस्ताद माना जाता है।
लाला श्रीनिवासदास का साहित्यिक योगदान
उनके योगदान को हिन्दी साहित्य में निम्न रूप में सराहा जाता है—
1. हिन्दी उपन्यास का प्रथम आधार स्तंभ
“परीक्षागुरु” ने हिन्दी उपन्यास को दिशा दी।
इस उपन्यास ने सामाजिक-यथार्थवादी लेखन की मजबूत नींव रखी।
2. नाटक को आधुनिक रूप देने में अग्रणी
उन्होंने
- अंग्रेज़ी नाट्य शैली
- पाश्चात्य संरचना
- संवाद-कला
को हिन्दी रंगमंच में स्थापित किया।
3. नैतिक और सामाजिक सुधार के लेखक
उनकी कृतियाँ शिक्षाप्रद, प्रेरक और समाज-उन्मुख हैं।
वे युवा पीढ़ी को जीवन की वास्तविकता समझाने और चरित्र निर्माण पर बल देते हैं।
4. भाषिक स्पष्टता और संतुलन
उनकी भाषा उस दौर की उथल-पुथल से दूर, संयत एवं परिष्कृत थी।
मृत्यु
लाला श्रीनिवासदास का निधन सन् 1907 में हुआ।
उनकी आयु अपेक्षाकृत कम रही, परंतु साहित्य में उनका योगदान अत्यंत मूल्यवान है।
