कवि देव, जिनका पूरा नाम देवदत्त द्विवेदी था, हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख तथा अत्यंत प्रतिभाशाली कवियों में गिने जाते हैं। इनका जन्म सन् 1673 ई. में उत्तर प्रदेश के इटावा नगर में एक घोसरिया ब्राह्मण परिवार में हुआ था। देव की काव्य प्रतिभा ने उन्हें रीतिकाल के श्रेष्ठ रचनाकारों की पंक्ति में विशेष स्थान दिलाया। उनकी कविता श्रृंगार, सौंदर्य, प्रकृति, प्रेम, नायिका-भेद तथा दैनंदिन दरबारी जीवन के सूक्ष्म चित्रों से परिपूर्ण है।
जन्म, परिवार और प्रारम्भिक जीवन
- पूरा नाम: देवदत्त द्विवेदी
- जन्म: 1673 ई., इटावा (उत्तर प्रदेश)
- कुल / जाति: ब्राह्मण (घोसरिया ब्राह्मण समुदाय)
- बचपन से ही उनमें कविता, भाषा सौंदर्य और अलंकारों के प्रति गहरी रुचि दिखाई दी।
- उनकी शिक्षा-दीक्षा पारंपरिक संस्कृत और ब्रजभाषा के साहित्यिक वातावरण में हुई, जिससे उनमें भाषा-प्रभुता और काव्य-कौशल विकसित हुआ।
आश्रयदाता और दरबारी जीवन
रीतिकालीन कवियों की तरह देव भी अनेक आश्रयदाताओं के साथ जुड़े रहे।
मुख्य आश्रयदाता
- आलमशाह — मुगल सम्राट औरंगजेब के पुत्र
- राजा भोगीलाल — सबसे प्रिय और सहृदय आश्रयदाता
राजा भोगीलाल देव की काव्य प्रतिभा से अत्यंत प्रसन्न थे। उन्होंने देव को
“लाखों की संपत्ति दान” में दी—जो यह दर्शाता है कि देव अपनी प्रतिभा के कारण दरबारी कवियों में सर्वाधिक सम्मानित थे।
परंतु विभिन्न दरबारों में रहते हुए देव ने वहाँ की चापलूसी, आडंबर, शक्ति-प्रदर्शन और कृत्रिम जीवन को बहुत निकट से देखा। इसके कारण उन्हें राजसी जीवन से गहरी निराशा और वितृष्णा होने लगी। फिर भी दरबारी वातावरण ने उन्हें जीवन के विविध आयामों को देखने और उन्हें अपनी कविता में उकेरने का अवसर दिया।
कवि देव का साहित्यिक व्यक्तित्व
देव मूलतः श्रृंगार रस, सौंदर्य-चित्रण, नारी-मन, प्रेम, रति, विरह, प्रकृति और अलंकारिक काव्य के कवि हैं।
रीतिकालीन काव्य में जो कोमलता, अलंकारिकता, सौंदर्य और भावप्रवाह देखा जाता है—उसके श्रेष्ठ उदाहरण देव के ग्रंथों में मिलते हैं।
उनकी रचनाओं में दुनिया की क्षणभंगुरता, राजसी जीवन का दिखावा और भक्ति-वैराग्य के भाव भी पाए जाते हैं—यह उनके अनुभवों का परिणाम था।
कवि देव की रचनाएँ (52–72 ग्रंथों का व्यापक साहित्य)
देव का साहित्य अत्यंत विस्तृत है। उनके ग्रंथों की संख्या 52 से 72 मानी जाती है। प्रमुख रचनाएँ:
मुख्य ग्रंथ
- रसविलास
- भावविलास
- भवानी विलास
- कुशल विलास
- अष्टयाम
- काव्यरसायन
- प्रेम दीपिका
इन कृतियों में नायिका-भेद, प्रेम-भाव, सौंदर्य-रस, प्रकृति-चित्रण और अलंकारिक सौन्दर्य का अनूठा मेल मिलता है।
भाषा-शैली और काव्य विशेषताएँ
देव की काव्य शैली रीतिकालीन सौंदर्य-प्रधान शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
1. भाषा
- ब्रजभाषा – कोमल-कान्त पदावली से युक्त
- शब्दों में संगीतात्मक लय और मधुर प्रवाह
- अनुप्रास, यमक और ध्वनि-अलंकारों का प्रबल प्रयोग
2. काव्य विशेषताएँ
- श्रृंगार रस का अत्यंत उत्कृष्ट और उदात्त चित्रण
- प्रकृति के सुकुमार, रोमांटिक और रमणीय दृश्य
- नारी-सौंदर्य, प्रेम-भाव और हृदय की रागात्मक अभिव्यक्ति
- सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण
- अलंकारों की परंपरा का गहरा प्रभाव
- रीतिकाल की ‘कोमलकान्त’ प्रवृत्ति को नई ऊँचाई देना
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा:
“देव की भाषा में रसर्दता और चलतापन कम है, परंतु सौंदर्य-चित्रण और अलंकार-वैभव में वे अद्वितीय हैं।”
देव के काव्य की प्रमुख थीम (Themes)
- श्रृंगार (उदात्त और संवेगपूर्ण)
- प्रेम-भाव और नायिका-भेद
- प्रकृति और ऋतु-चित्रण
- दरबारी जीवन, उसका दिखावा और स्थितियाँ
- भक्तिभाव तथा क्षणिक संसार का दर्शन
देव का व्यक्तित्व और साहित्यिक प्रभाव
देव को रीतिकाल का उत्कृष्ट श्रृंगारिक कवि माना जाता है।
उनका साहित्य—
- काव्य-सौंदर्य का प्रखर उदाहरण है,
- अलंकार परंपरा का श्रेष्ठ रूप है,
- और ब्रजभाषा के मधुरतम स्वरूपों में से एक है।
उनकी रचनाओं ने आगे आने वाले कवियों और साहित्यकारों पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
मृत्यु
कवि देव का निधन सन् 1767 ई. में हुआ।
उन्होंने लगभग 94 वर्षों तक जीवन जिया और इस दौरान हिंदी साहित्य को अमूल्य काव्य-धरोहर प्रदान की।
