जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय (Jaindendra Kumar Biography in Hindi)

प्रस्तावना

जैनेंद्र कुमार हिंदी साहित्य के उन विशिष्ट रचनाकारों में से हैं जिन्होंने कथा साहित्य को बाह्य घटनाओं से हटाकर मनुष्य के अंतर्मन, मानसिक द्वंद्व और आत्मसंघर्ष की ओर मोड़ा। वे प्रेमचंदोत्तर युग के प्रमुख मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार, कहानीकार और निबंधकार थे। हिंदी उपन्यास में मनोविश्लेषणात्मक परंपरा की स्थापना का श्रेय उन्हें दिया जाता है।

जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

जैनेंद्र कुमार का जन्म 2 जनवरी 1905 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज गाँव में हुआ। उनका बचपन का नाम आनंदी लाल था।
उनके पिता का देहांत उनके बचपन में ही हो गया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनकी माता और मामा ने किया। उनके मामा ने हस्तिनापुर में एक जैन गुरुकुल की स्थापना की थी, जहाँ जैनेंद्र कुमार की प्रारंभिक शिक्षा हुई।

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प्रारंभिक एवं उच्च शिक्षा

जैनेंद्र कुमार की शिक्षा पारंपरिक ढर्रे से अलग रही।

  • प्रारंभिक शिक्षा हस्तिनापुर के जैन गुरुकुल में
  • गुरुकुल छोड़ने के बाद निजी रूप से मैट्रिक की तैयारी
  • मैट्रिक परीक्षा पंजाब से उत्तीर्ण
  • उच्च शिक्षा के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रवेश

1921 में असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने विश्वविद्यालय की पढ़ाई अधूरी छोड़ दी।

स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीतिक जीवन

जैनेंद्र कुमार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़े रहे।

  • 1921 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी
  • दिल्ली आकर कांग्रेस के कार्यकर्ता बने
  • लाला लाजपत राय के तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स में अध्ययन
  • राजनीतिक गतिविधियों के कारण गिरफ्तार भी हुए

यह राजनीतिक अनुभव उनके साहित्य में वैचारिक गंभीरता और नैतिक द्वंद्व के रूप में दिखाई देता है।

जीविका संघर्ष और लेखन की शुरुआत

राजनीति से हटने के बाद जैनेंद्र कुमार ने जीविका के लिए कई प्रयास किए।

  • कुछ समय व्यापार किया
  • नागपुर में राजनीतिक पत्रों के संवाददाता बने
  • कलकत्ता जाकर भी संघर्ष किया

अंततः उन्होंने लेखन को ही अपना जीवन लक्ष्य बनाया।
1928 में उनकी पहली कहानी ‘विशाल भारत’ पत्रिका में प्रकाशित हुई।
1929 में उनका पहला उपन्यास ‘परख’ प्रकाशित हुआ, जिससे वे साहित्य जगत में स्थापित हो गए।

साहित्यिक व्यक्तित्व

जैनेंद्र कुमार मूलतः मनोवैज्ञानिक लेखक थे।
उनका ध्यान समाज से अधिक व्यक्ति की आत्मा, चेतना और मनोविज्ञान पर केंद्रित रहा।
वे प्रेमचंद के पूरक माने जाते हैं—विरोधी नहीं।

उनकी रचनाओं में

  • घटनाओं की कमी
  • चरित्रों की गहराई
  • दर्शन और आत्मविश्लेषण की प्रधानता
    स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ

उपन्यास

  • परख
  • सुनीता
  • त्यागपत्र
  • कल्याणी
  • सुखदा
  • विवर्त
  • व्यतीत
  • जयवर्द्धन
  • मुक्तिबोध

कहानी-संग्रह

  • फाँसी
  • वातायन
  • नीलम देश की राजकन्या
  • एक रात
  • दो चिड़ियाँ
  • पाजेब
  • जयसंधि
  • जैनेंद्र की कहानियाँ (सात खंड)

निबंध-संग्रह

  • प्रस्तुत प्रश्न
  • जड़ की बात
  • पूर्वोदय
  • साहित्य का श्रेय और प्रेय
  • मंथन
  • सोच विचार
  • समय और हम
  • परिप्रेक्ष्य
  • साहित्य और संस्कृति

अनुवाद एवं संपादन

  • मंदालिनी
  • प्रेम में भगवान
  • पाप और प्रकाश
  • साहित्य चयन
  • विचार वल्लरी

लेखन शैली और साहित्यिक विशेषताएँ

मनोवैज्ञानिक दृष्टि

  • व्यक्ति के आंतरिक द्वंद्व का सूक्ष्म विश्लेषण
  • चेतना, अवचेतन और आत्मसंघर्ष पर गहन ध्यान

दर्शन और आध्यात्मिकता

  • जैन दर्शन, स्यादवाद और गाँधीवादी विचारों का प्रभाव
  • नैतिकता, त्याग और आत्मबोध की प्रधानता

नारी पात्रों का चित्रण

  • नारी पात्र केंद्रीय भूमिका में
  • स्त्री-पुरुष संबंधों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
  • ‘सुनीता’, ‘त्यागपत्र’, ‘सुखदा’ इसके श्रेष्ठ उदाहरण

भाषा और गद्य शैली

  • सरल, पारदर्शी खड़ी बोली
  • हिंदी गद्य को नया सिंटैक्स दिया
  • अज्ञेय जैसे लेखकों पर प्रभाव

साहित्यिक योगदान और महत्व

  • हिंदी में मनोवैज्ञानिक उपन्यास परंपरा के प्रवर्तक
  • हिंदी गद्य को वैचारिक गहराई प्रदान की
  • कथा साहित्य को आत्मसंघर्ष की दिशा दी
  • प्रयोगशील कहानी लेखन की नींव रखी

पुरस्कार एवं सम्मान

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1961) – ‘मुक्तिबोध’ के लिए
  • पद्म भूषण (1971)
  • दिल्ली विश्वविद्यालय और आगरा विश्वविद्यालय से डी.लिट् की मानद उपाधि

निधन

जैनेंद्र कुमार का निधन 24 दिसंबर 1988 को हुआ।
उनका निधन हिंदी साहित्य के मनोवैज्ञानिक युग का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त होने जैसा था।

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