प्रस्तावना
हरिवंश राय बच्चन (1907–2003) हिंदी साहित्य के उत्तर-छायावाद काल के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली कवि-लेखक थे। वे ‘मधुशाला’ जैसी कालजयी कृति के रचयिता, ‘हालावाद’ के प्रवर्तक, ‘नई कविता’ आंदोलन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर तथा सरल खड़ी बोली के महान प्रयोगकर्ता थे।
उन्होंने कविता को दर्शन, जीवन-मस्ती और मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि हिंदी के सांस्कृतिक प्रतिनिधि, शिक्षाविद् और राजनयिक भी थे। वे प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन के पिता थे और उन्हें पद्म भूषण सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया गया।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 ई. को बाबूपट्टी गाँव (प्रयागराज/इलाहाबाद के निकट), उत्तर प्रदेश में हुआ।
- मूल नाम: हरिवंश राय श्रीवास्तव
- पिता: प्रताप नारायण श्रीवास्तव
- माता: सरस्वती देवी
- परिवार: कायस्थ परिवार
बाल्यकाल में उन्हें प्रेम से ‘बच्चन’ कहा जाता था, जिसका अर्थ ‘बच्चा’ या ‘संतान’ होता है। यही नाम आगे चलकर उनकी साहित्यिक पहचान बन गया।
शिक्षा
हरिवंश राय बच्चन की शिक्षा अत्यंत व्यापक और बहुआयामी थी—
- प्रारंभिक शिक्षा: कायस्थ पाठशाला, प्रयाग
- पहले उर्दू, फिर हिंदी का अध्ययन
- इलाहाबाद विश्वविद्यालय
- अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.
- कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (इंग्लैंड)
- अंग्रेजी साहित्य में पीएच.डी.
- शोध विषय: डब्ल्यू. बी. यीट्स की कविताएँ
उनकी शिक्षा ने उनकी कविता को भारतीय दर्शन और पाश्चात्य विचारधारा दोनों से समृद्ध किया।
वैवाहिक एवं निजी जीवन
- पहला विवाह (1926): श्यामा बच्चन
- 1936 में टी.बी. से श्यामा का निधन
- दूसरा विवाह (1941): तेज़ी सूरी (तेज़ी बच्चन)
- रंगमंच और संगीत से जुड़ी विदुषी महिला
संतानें:
- अमिताभ बच्चन – विश्वविख्यात अभिनेता
- अजिताभ बच्चन
पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उनकी कविता में विरह, पीड़ा और आत्मसंघर्ष का स्वर गहराया, जिसका प्रभाव ‘नीड़ का निर्माण फिर’ जैसी रचनाओं में दिखाई देता है।
व्यावसायिक एवं सार्वजनिक जीवन
- इलाहाबाद विश्वविद्यालय – अंग्रेजी के प्राध्यापक
- भारत सरकार का विदेश मंत्रालय – हिंदी विशेषज्ञ
- राज्यसभा – मनोनीत सदस्य
वे विदेशों में हिंदी और भारतीय संस्कृति के सांस्कृतिक राजदूत के रूप में भी सक्रिय रहे।
साहित्यिक आंदोलन और काव्य-धारा
हालावाद
हरिवंश राय बच्चन को ‘हालावाद’ का प्रवर्तक माना जाता है। इसमें—
- जीवन की क्षणभंगुरता
- मस्ती, पीड़ा और स्वीकार
- मदिरा को जीवन-दर्शन के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया गया
नई कविता
उन्होंने ‘नई कविता’ आंदोलन को—
- आत्मकथ्य
- व्यक्तिगत अनुभूति
- आधुनिक मानव की मानसिकता
से समृद्ध किया।
काव्य-शैली एवं भाषा
- सरल, सुगम खड़ी बोली
- उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी शब्दों का सहज मिश्रण
- लयात्मकता, गीतात्मकता और भावप्रवणता
- दर्शन को आम जन के लिए सहज बनाना
उनकी कविता कठिन दर्शन को सरल जीवन-अनुभव में बदल देती है।
प्रमुख काव्य-कृतियाँ
कविता संग्रह
- तेरा हार (1929)
- मधुशाला (1935)
- मधुबाला (1936)
- मधुकलश (1937)
- निशा निमंत्रण (1938)
- एकांत संगीत (1939)
- आकुल अंतर (1943)
- सतरंगिनी (1945)
- हलाहल (1946)
- दो चट्टानें (1965)
- कटती प्रतिमाओं की आवाज़ (1968)
- जाल समेटा (1973)
आत्मकथा (चार खंड)
- क्या भूलूँ क्या याद करूँ (1969)
- नीड़ का निर्माण फिर (1970)
- बसेरे से दूर (1977)
- दशद्वार से सोपान तक (1985)
यह आत्मकथा हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ आत्मकथाओं में मानी जाती है।
अनुवाद एवं विविध रचनाएँ
- उमर खैय्याम की रुबाइयाँ
- खय्याम की मधुशाला
- शेक्सपियर कृतियाँ: हैमलेट, मैकबेथ, ओथेलो, किंग लियर
- नेहरू: राजनीतिक जीवनचरित
- आधुनिक कवि
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1968) – दो चट्टानें
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार
- सरस्वती सम्मान – आत्मकथा के लिए
- पद्म भूषण (1976) – भारत सरकार द्वारा
निधन
2002 से उनका स्वास्थ्य गिरने लगा। 18 जनवरी 2003 को मुंबई में सांस की बीमारी के कारण उनका निधन हुआ।
