गंगा दास पांडे का जीवन परिचय | Ganga Das Pandey Biography in Hindi

गंगा दास पांडे (1823–1913 ई.) उन्नीसवीं शताब्दी के महान संत, दार्शनिक, भावुक भक्त, उदासी संप्रदाय के महात्मा और खड़ी बोली के प्रारंभिक कवियों में माने जाते हैं। वे केवल संत ही नहीं, बल्कि एक महाकवि, विचारक और समाज-संस्कारक भी थे। उनके शिष्यों की संख्या अत्यंत विशाल थी और उनके पद, भजन व उपदेश जन-जन में लोकप्रिय थे।

1. गंगा दास पांडे का संक्षिप्त परिचय

  • पूरा नाम: महात्मा गंगा दास (पूर्व नाम – गंगाबख्श)
  • जन्म: 1823 ई., बसंत पंचमी
  • जन्म स्थान: रसूलपुर ग्राम, बाबूगढ़ छावनी के निकट
  • मृत्यु: 1913 ई. (संवत 1970), भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
  • निवास स्थान (अंतिम काल): गढ़मुक्तेश्वर, जिला गाजियाबाद
  • पहचान: संत, दार्शनिक, उदासी महात्मा, खड़ी बोली कवि

2. प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

महात्मा गंगा दास का जन्म मुंडेर गोत्र के सिख जाट परिवार में हुआ था।

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  • पिता: चौधरी सुखीराम सिंह (समृद्ध जमींदार)
  • माता: दारवा कौर (दयालपुर, बल्लभगढ़ के निकट)

उनका बचपन का नाम गंगाबख्श था। परिवार अत्यंत सम्पन्न था—

  • लगभग 600 एकड़ भूमि
  • मेरठ मंडल में उनके पूर्वजों की 15 पीढ़ियाँ निवास कर चुकी थीं

बाल्यकाल की विशेषताएँ

  • अत्यंत स्वच्छता प्रिय
  • तनिक सी गंदगी से भी विचलित हो जाते थे
  • इसी कारण लोग उन्हें व्यंग्य में “भगत जी” कहने लगे

3. वैराग्य और संन्यास की ओर प्रवृत्ति

अल्पायु में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया।

  • माता के निधन के बाद उनके मन में संसार से वैराग्य उत्पन्न हो गया
  • मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने गृहत्याग कर दिया

इसके बाद उन्होंने संत विष्णु दास उदासीन से दीक्षा ली और
👉 गंगाबख्श से गंगा दास कहलाए।

4. शिक्षा, साधना और दार्शनिक अध्ययन

महात्मा गंगा दास ने काशी (वाराणसी) में लगभग 20 वर्षों तक निवास किया।
यहाँ उन्होंने गहन अध्ययन किया—

  • वेदांत
  • व्याकरण (संस्कृत व हिंदी)
  • गीता
  • रामायण
  • महाभारत
  • रामचरितमानस
  • अद्वैत कौस्तुभ
  • मुक्तावली

उनका ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं, बल्कि अनुभवजन्य और साधनात्मक था।

5. भारत भ्रमण और शिष्य परंपरा

काशी के बाद उन्होंने

  • उत्तर प्रदेश
  • हरियाणा
  • पंजाब
  • दिल्ली
  • राजस्थान

आदि क्षेत्रों में भ्रमण किया।

फतापुर (बक्सर के निकट) प्रवास

  • यहाँ 19 वर्षों तक रहे
  • चौधरी रकम सिंह को हिंदी व्याकरण
  • पंडित चिरंजीव लाल को संस्कृत व्याकरण पढ़ाया
  • यहीं जियाकौर नामक शिष्या को दीक्षा दी

6. संगीत, बंशी और लोकआकर्षण

संध्या समय वे गाँव से बाहर बाग़ के कुएँ पर बैठकर बंशी (मुरली) बजाया करते थे।
कहा जाता है—

  • उनकी बंशी की धुन इतनी मधुर होती थी कि
    • सैकड़ों लोग
    • और यहाँ तक कि मोर (मयूर) भी एकत्र हो जाते थे

यह उनके भावुक भक्त और दिव्य व्यक्तित्व का प्रमाण था।

7. चमत्कारिक व्यक्तित्व और लोककथाएँ

झंडा गुजर की घटना

  • ग्राम ललाने में सेठ हरलाल की हवेली में ठहरे
  • कुख्यात डाकू झंडा गुजर ने डाका डाला
  • संत जी के हस्तक्षेप से
    • डाकू ने लूटा धन लौटाया
    • उनके चरण छुए
    • क्षमा माँगी

संतान-प्राप्ति का वरदान

सेठ काशी राम को संतान न थी—
संत गंगा दास की सेवा से संतान प्राप्ति की कथा अत्यंत प्रसिद्ध है।

8. खड़ी बोली के प्रथम कवि के रूप में महत्व

अनेक विद्वान गंगा दास को—
👉 खड़ी बोली का प्रथम कवि मानते हैं।

उनके प्रमुख शिष्य

  • चेतराम
  • बालूराम
  • दयाराम
  • मोतीराम
  • मोहनलाल

ये शिष्य उनके पद और भजन गाकर जनता तक पहुँचाते थे।

9. गढ़मुक्तेश्वर में अंतिम जीवन

जीवन के अंतिम 25–26 वर्ष उन्होंने
👉 गढ़मुक्तेश्वर (गाजियाबाद) में बिताए।

  • यहाँ वे गहन समाधि साधना करते थे
  • एक बार उन्होंने कोठरी में ताला लगवाकर
    • एक माह तक समाधि लगाई
  • इस घटना से उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई

10. अंतिम समय और महाप्रयाण

  • तिथि: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, संवत 1970 (1913 ई.)
  • समय: प्रातः 6 बजे

जन्माष्टमी के दिन उन्होंने आदेश दिया—

  • मेरा शव गंगा में प्रवाहित कर देना
  • आश्रम की कोई वस्तु घर न ले जाना, यह दान-माल है

इसके बाद—

  • पद्मासन में बैठे
  • ध्यानस्थ हुए
  • और ब्रह्मलीन हो गए
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