परिचय
द्वारिका प्रसाद मिश्र (5 अगस्त 1901 – 31 मई 1988) भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, वरिष्ठ कांग्रेस नेता, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, प्रखर पत्रकार, चिंतक, साहित्यकार, इतिहासकार और राजनयिक थे।
वे अपनी अद्भुत मेधा, बेबाक लेखन, राजनीतिक दूरदर्शिता, सांस्कृतिक चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका के लिए प्रसिद्ध हैं।
मिश्र जी उन विरले व्यक्तियों में थे, जिन्होंने राजनीति, साहित्य, पत्रकारिता, विश्वविद्यालय-प्रशासन और इतिहास-लेखन—इन सभी क्षेत्रों में गहरा प्रभाव छोड़ा।
जन्म, परिवार एवं प्रारंभिक जीवन
द्वारिका प्रसाद मिश्र का जन्म 5 अगस्त 1901 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के पड़री गाँव में हुआ।
वे एक प्रतिष्ठित लेकिन सामान्य ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले परिवार से थे। बचपन से ही तेजस्वी बुद्धि, नेतृत्व-क्षमता और अध्ययन के प्रति लगाव उनके व्यक्तित्व का आधार रहा।
शिक्षा
उन्होंने आरंभिक शिक्षा उन्नाव में तथा उच्च शिक्षा इलाहाबाद में ग्रहण की।
हिन्दी, अंग्रेज़ी, संस्कृत और उर्दू भाषा पर उनका अद्भुत अधिकार था। साहित्य, राजनीति, इतिहास और दर्शन—चारों विषयों में उन्होंने गहन विद्वता अर्जित की।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
मिश्र जी केवल 19 वर्ष के थे जब वे 1920 में पहली बार स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गए।
उन्होंने:
- असहयोग आंदोलन
- सविनय अवज्ञा आंदोलन
- भारत छोड़ो आंदोलन
में सक्रिय भाग लिया।
उनकी राष्ट्रभक्ति, दृढ़ता और नेतृत्व क्षमता ने उन्हें आंदोलन का अग्रणी चेहरा बना दिया।
पत्रकारिता का सफ़र – प्रखर और निर्भीक पत्रकार
द्वारिका प्रसाद मिश्र एक उत्कृष्ट पत्रकार भी थे। उनकी लेखनी तेज, प्रखर और प्रभावी थी।
मुख्य पत्र-पत्रिकाएँ
उन्होंने निम्न पत्रिकाओं का संपादन किया—
- श्री शारदा मासिक (1921)
- दैनिक लोकमत (1931)
- साप्ताहिक सारथी (1947)
लाला लाजपत राय की अंग्रेज़ों की लाठी से हुई मृत्यु पर ‘लोकमत’ में लिखे उनके लेख को पढ़कर
पं. मोतीलाल नेहरू ने कहा था—
“भारत का सर्वश्रेष्ठ फौजदारी वकील भी इससे अच्छा अभियोग-पत्र तैयार नहीं कर सकता।”
उनकी पत्रकारिता व्यक्तित्व को निर्भीक, निडर और राष्ट्रवादी बनाती है।
शिक्षा-जगत में योगदान – सागर विश्वविद्यालय के कुलपति
1954 से 1964 तक वे सागर विश्वविद्यालय (मध्य प्रदेश) के कुलपति रहे।
विद्यार्थी और शिक्षक दोनों कहते थे—
“विश्वविद्यालय में सबसे अधिक पढ़ने वाला व्यक्ति उसका कुलपति है।”
सागर विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक, शैक्षणिक और शोध-कार्यों के विस्तार में उनका योगदान अविस्मरणीय है।
राजनीतिक जीवन
कांग्रेस में उन्नति
मिश्र जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे।
वे नेहरू युग के बड़े विचारक, योजनाकार और राजनीतिक रणनीतिकार माने जाते थे।
🌟 मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री (दो कार्यकाल)
उन्होंने दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा दी—
- 30 सितंबर 1963 – 8 मार्च 1967
- 9 मार्च 1967 – 29 जुलाई 1967
उनकी प्रशासनिक क्षमता, कठोर निर्णय, आर्थिक नीतियाँ और संगठनात्मक सुधार उस समय काफी चर्चित रहे।
1967 का सत्ता-साझेदारी समझौता
1967 के बाद जब कांग्रेस में संघर्ष बढ़ा, तब
इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई के बीच सत्ता-साझेदारी करवाने में मिश्र जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनकी मध्यस्थता से मोरारजी देसाई को उपप्रधानमंत्री बनाया गया।
हालाँकि 1969 में यह समझौता टूट गया और कांग्रेस विभाजित हो गई।
उनकी राजनीतिक बुद्धिमत्ता और रणनीति आज भी अध्ययन का विषय है।
✍️ लेखन एवं साहित्यिक योगदान
द्वारिका प्रसाद मिश्र एक बहुमुखी लेखक थे।
उनकी रचनाएँ इतिहास, राजनीति, संस्कृति, महाकाव्य-काव्य और संस्मरण—सभी क्षेत्रों में मिलती हैं।
मुख्य कृतियाँ
1. कृष्णायन (महाकाव्य)
1942 में जेल में रहते हुए उन्होंने महान महाकाव्य ‘कृष्णायन’ की रचना की।
यह कृष्ण के जन्म से लेकर स्वर्गारोहण तक की संपूर्ण कथा पर आधारित है।
कई साहित्यकारों के अनुसार, यह आधुनिक युग का श्रेष्ठ भारतीय महाकाव्य है।
2. राजनीतिक संस्मरण (तीन खंड)
मिश्र जी के संस्मरण भारत की राजनीतिक इतिहास का अनमोल दस्तावेज माने जाते हैं—
- एक युग का जीवन (भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, 1947 तक)
- नेहरू युग – लोकतंत्र से एकतंत्र तक (1947–1964)
- नेहरू के बाद का युग (नेहरू के बाद का राजनीतिक काल, 1980 तक)
इन संस्मरणों ने कई राजनीतिक विवाद भी खड़े किए, विशेषतः वह पत्र जिसमें सरदार पटेल ने नेहरू की गलतियों पर नाराज़गी व्यक्त की थी।
3. लंका की खोज (Search of Lanka)
इस ग्रंथ में उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि रामायण की लंका श्रीलंका नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में स्थित थी।
यह शोध-ग्रंथ भारतीय पुरातत्त्व और भूगोल अध्ययन में अत्यंत चर्चित रहा।
अन्य कृतियाँ
- Living an Era (अंग्रेज़ी आत्मकथा)
- Studies in the Proto History of India
- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक निबंध
- उर्दू-हिन्दी अनुवाद
उनकी भाषा-शैली विद्वतापूर्ण, शोधपूर्ण और प्रभावशाली थी।
व्यक्तित्व एवं रुचियाँ
- मिश्र जी शतरंज के माहिर खिलाड़ी थे।
- उन्हें संस्कृत कविता, उर्दू ग़ज़लों और इतिहास की पुस्तकों से गहरा लगाव था।
- वे सादगी, कठोर अनुशासन और सत्यनिष्ठा के प्रतिमान थे।
- जवाहरलाल नेहरू से मतभेद के कारण उन्हें लगभग 13 वर्ष का राजनीतिक वनवास भी झेलना पड़ा।
मृत्यु
राजनीति, साहित्य, पत्रकारिता और शिक्षा—चारों क्षेत्रों में महान योगदान देने वाले
द्वारिका प्रसाद मिश्र का निधन 31 मई 1988 को दिल्ली में हुआ।
उनका अंतिम संस्कार जबलपुर में नर्मदा तट पर किया गया।
