भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (9 सितंबर 1850 – 6 जनवरी 1885) आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह, हिन्दी नाटक के जनक, हिन्दी पत्रकारिता के अग्रदूत, एवं भारतीय नवजागरण के प्रतिनिधि साहित्यकार थे। उन्होंने खड़ी बोली को हिंदी गद्य की मानक भाषा के रूप में स्थापित किया और रीतिकालीन काव्यधारा को आधुनिक रूप दिया। उनका साहित्य सामाजिक, राष्ट्रीय, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत है।
1. जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 9 सितंबर 1850
- जन्मस्थान: काशी (वाराणसी), उनके ननिहाल
- पिता: बाबू गोपालचन्द्र “गिरिधरदास” – स्वयं एक अच्छे कवि
- माता: पार्वती देवी
- परिवार: प्रतिष्ठित वैश्य (सेठ अमीचंद के वंशज)
बहुत छोटी आयु में ही मातापिता का देहांत हो गया — 5 वर्ष की आयु में माँ, और 10 वर्ष में पिता। इससे उनका बचपन कठिनाइयों में बीता। विमाता का कठोर व्यवहार और परंपरागत शिक्षा पद्धति ने उनके संवेदनशील मन को प्रभावित किया।
🔥 बचपन में अद्भुत प्रतिभा
पाँच वर्ष की उम्र में ही उन्होंने यह दोहा कहा, जिसे सुनकर पिता ने “भावी सुकवि” का आशीर्वाद दिया—
“ले ब्योढा ठाढ़े भये, श्री अनिरुद्ध सुजान।
बाणासुर की सैन्य को, हनन लगे भगवान॥”
2. शिक्षा और भाषागत दक्षता
औपचारिक शिक्षा उन्हें अधिक रुचिकर नहीं लगी। बनारस के क्वींस कॉलेज में प्रवेश लिया, परंतु उनका मन अध्ययन पद्धति से ऊब गया। इसके बावजूद उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी, इसलिए परीक्षाएँ आसानी से पास करते रहे।
उन्होंने स्वाध्याय से कई भाषाएँ सीखीं—
- संस्कृत
- हिंदी
- अंग्रेज़ी
- बंगला
- मराठी
- पंजाबी
- उर्दू
- गुजराती
अंग्रेज़ी उन्होंने राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ से विशेष रुचि के साथ सीखी।
3. भारतेन्दु का साहित्यिक जीवन
भारतेन्दु ने 15 वर्ष की आयु में साहित्य सेवा आरंभ कर दी। मात्र 34 वर्ष की आयु में विशाल साहित्य रचकर उन्होंने हिंदी में नए युग का उद्घाटन किया।
(A) हिंदी नाटक के जनक
हिंदी नाटक की विधा को सर्वाधिक विकसित करने का श्रेय भारतेन्दु को ही है।
उन्होंने—
- रूपक काव्य की प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित किया
- खड़ी बोली में आधुनिक नाटकों की रचना की
- नाटकीय प्रस्तुति की परंपरा स्थापित की
उनका पहला नाटक था—
बंगला नाटक ‘विद्यासुंदर’ का अनुवाद (1867)
इसके बाद कई नाटक लिखे, जिनमें ऐतिहासिक, सामाजिक और पौराणिक विषयों का समावेश था।
(B) हिंदी पत्रकारिता के अग्रदूत
उन्होंने हिंदी में तीन महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ निकालीं—
- कविवचनसुधा (1868)
- हरिश्चन्द्र मैगज़ीन (1873)
- बाला बोधिनी (1874) – स्त्री शिक्षा हेतु
इसके अतिरिक्त, “पेनी रीडिंग” और “तदीय समाज” जैसी संस्थाओं की स्थापना भी की।
(C) गद्य विधाओं का विकास
भारतेन्दु ने हिंदी गद्य को नया रूप दिया—
- निबंध
- पत्र
- यात्रा-वृत्तांत
- व्यंग्य
- जीवनी
- अनुवाद
- कहानी
हिंदी गद्य की आधुनिक शैली का निर्माण उन्हीं के द्वारा हुआ।
(D) कवि, व्यंग्यकार, समाज सुधारक
उन्होंने कविता को रीतिकाल की निर्जीव परंपरा से निकालकर समाज, राष्ट्र और यथार्थ के निकट लाया।
उनकी कविताओं में—
- देशभक्ति
- दार्शनिक भाव
- सामाजिक व्यथा
- राष्ट्रीय चेतना
- व्यंग्य और कटाक्ष
का अनूठा मिश्रण मिलता है।
4. साहित्यिक विचार और योगदान
(A) आधुनिक हिंदी साहित्य का प्रारंभ
आधुनिक काल की शुरुआत भारतेन्दु से मानी जाती है क्योंकि—
- उन्होंने खड़ी बोली को गद्य की भाषा बनाया
- प्रगतिशील चिंतन को आगे बढ़ाया
- नाटक और निबंध को नई दिशा दी
इसी कारण उनका समय भारतेन्दु युग (1857 – 1900) कहलाता है।
(B) भाषा और शैली
भाषा
- गद्य में सरल, सहज खड़ी बोली
- पद्य में ब्रजभाषा
- न उर्दू शब्दों का बोझ, न संस्कृत की गंभीरता
- स्पष्ट, प्रवाहपूर्ण और जनसुलभ शैली
शैली
- परिचयात्मक
- विवेचनात्मक
- भावात्मक
- व्यंग्य से भरपूर
उनकी गद्य शैली हिंदी गद्य साहित्य के लिए आदर्श बन गई।
5. सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना
भारतेन्दु का साहित्य अंग्रेज़ी शासन के अत्याचार और भारत की दयनीय हालत पर सीधी चोट करता है।
उनकी प्रसिद्ध पंक्ति—
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
पै निज भाषा ज्ञान बिनु, मिटै न हिय को शूल॥”
वे राष्ट्रवादी थे और भारतीय समाज की समस्याओं को खुलकर लिखते थे—
- गरीबी
- शोषण
- पाखंड
- धार्मिक रूढ़ियाँ
- सामाजिक कुरीतियाँ
उनकी रचना “भारत-दुर्दशा” अंग्रेज़ी शासन के ढोंग का परदाफाश करती है।
6. प्रमुख रचनाएँ
✔ नाटक
- विद्यासुंदर
- भारत-दुर्दशा
- अंधेर नगरी चौपट राजा
- नीलदेवी
- सत्यहरिश्चन्द्र
- वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति
✔ काव्य
- प्रेममालिका
- संग्रहपत्रिका
- कवित्त, दोहे, गीत
- वाणी के गौरव को दर्शाती कविताएँ
✔ निबंध
- यात्रा-वृत्त
- समाज-सुधार विषयक निबंध
- भाषा-विषयक लेख
7. भारतेन्दु मंडल
भारतेन्दु के साथ साहित्यकारों का एक समूह काम करता था जिसे भारतेन्दु मंडल कहा जाता है।
इस मंडल ने हिंदी के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया।
8. अंतिम समय और मृत्यु
अत्यधिक धन खर्च, सामाजिक कार्य, गरीबों की सहायता, नाट्यशालाएँ, पुस्तकालय—इन सबमें पैसा पानी की तरह खर्च करने के कारण वे ऋणी हो गए। मानसिक तनाव और निरंतर परिश्रम से उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। अंततः वे क्षय रोग से ग्रस्त हो गए।
मृत्यु: 6 जनवरी 1885
आयु: मात्र 34 वर्ष
इतनी अल्पायु में ही उन्होंने ऐसा साहित्य दिया जो हिंदी का आधार स्तंभ बन गया।
