प्रस्तावना
महात्मा गांधी आधुनिक भारत के इतिहास के सबसे महान व्यक्तित्वों में से एक हैं। उन्हें “राष्ट्रपिता” के रूप में सम्मान दिया जाता है। उनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। उन्होंने सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांतों के आधार पर भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए आजीवन संघर्ष किया।
गांधीजी केवल एक राजनीतिक नेता ही नहीं थे, बल्कि वे एक महान चिंतक, समाज सुधारक, नैतिक दार्शनिक और मानवता के उपासक भी थे। उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक कार्य में सत्य और अहिंसा को सर्वोच्च स्थान दिया। उनका जीवन त्याग, संघर्ष, अनुशासन और नैतिक साहस का अद्वितीय उदाहरण है।
जन्म
महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर रियासत के दीवान थे। उनकी माता पुतलीबाई अत्यंत धार्मिक और संस्कारी महिला थीं।
परिवार का वातावरण धार्मिक और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण था। उनकी माता की भक्ति, उपवास और सेवा-भाव का गांधीजी के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
बाल्यकाल और शिक्षा
गांधीजी का बचपन साधारण था। वे स्वभाव से शर्मीले और ईमानदार थे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर और राजकोट में प्राप्त की।
1888 में वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहाँ उन्होंने तीन वर्षों तक अध्ययन किया और बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त की। इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को निकट से देखा, परंतु भारतीय संस्कारों को नहीं छोड़ा।
दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष
1893 में गांधीजी एक कानूनी कार्य के लिए दक्षिण अफ्रीका गए। वहाँ उन्हें नस्लभेद का सामना करना पड़ा। एक बार उन्हें प्रथम श्रेणी के डिब्बे से केवल इसलिए बाहर फेंक दिया गया क्योंकि वे भारतीय थे।
यह घटना उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया।
यहीं उन्होंने सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों का प्रयोग किया। लगभग 21 वर्षों तक वे दक्षिण अफ्रीका में रहे और भारतीयों के नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन चलाया।
भारत वापसी और स्वतंत्रता आंदोलन
1915 में गांधीजी भारत लौटे। उन्होंने भारतीय राजनीति में सक्रिय भाग लेना शुरू किया।
चंपारण सत्याग्रह (1917)
बिहार के चंपारण में किसानों पर अत्याचार के विरोध में गांधीजी ने आंदोलन किया। यह भारत में उनका पहला सफल सत्याग्रह था।
असहयोग आंदोलन (1920)
उन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध असहयोग आंदोलन चलाया। लोगों से विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने और स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया।
नमक सत्याग्रह (1930)
1930 में गांधीजी ने दांडी यात्रा कर नमक कानून का विरोध किया। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक ऐतिहासिक कदम था।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
1942 में उन्होंने “करो या मरो” का नारा दिया और अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग की।
सत्य और अहिंसा का सिद्धांत
गांधीजी का मानना था कि सत्य ही ईश्वर है। उन्होंने अहिंसा को जीवन का सर्वोच्च सिद्धांत माना।
उनका विश्वास था कि बिना हिंसा के भी अन्याय का विरोध किया जा सकता है। सत्याग्रह का अर्थ है—सत्य के लिए आग्रह।
उनके इन सिद्धांतों ने न केवल भारत में बल्कि विश्वभर में लोगों को प्रेरित किया।
सामाजिक सुधार
गांधीजी ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए ही संघर्ष नहीं किया, बल्कि सामाजिक सुधार के लिए भी प्रयास किए।
- छुआछूत के विरुद्ध आंदोलन
- हरिजनों के उत्थान के लिए कार्य
- महिलाओं के अधिकारों का समर्थन
- ग्राम स्वराज की परिकल्पना
उन्होंने समाज में समानता और नैतिकता का संदेश दिया।
आर्थिक विचार
गांधीजी का आर्थिक दृष्टिकोण स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर आधारित था।
उन्होंने चरखा और खादी को आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बनाया।
उनका मानना था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, इसलिए ग्राम उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए।
साहित्यिक योगदान
गांधीजी एक लेखक भी थे। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें प्रमुख हैं—
- सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)
- हिंद स्वराज
इन पुस्तकों में उनके जीवन-दर्शन और विचारों का वर्णन मिलता है।
स्वतंत्रता और विभाजन
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
हालाँकि स्वतंत्रता के साथ देश का विभाजन भी हुआ, जिससे गांधीजी अत्यंत दुखी हुए। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अंतिम समय तक प्रयास किया।
निधन
30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली में नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी। उनकी मृत्यु से पूरे देश में शोक की लहर फैल गई।
