प्रस्तावना
भीष्म साहनी आधुनिक हिंदी साहित्य के उन विरल रचनाकारों में से हैं, जिन्होंने प्रेमचंद की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उसे नई संवेदना, गहराई और मानवीय दृष्टि प्रदान की। वे केवल लेखक नहीं थे, बल्कि उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार, अनुवादक और अभिनेता के रूप में भी साहित्य और कला जगत में सक्रिय रहे।
जन्म और परिवार
भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915 ई० को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता का नाम हरबंस लाल साहनी तथा माता का नाम लक्ष्मी देवी था। उनका परिवार शिक्षित, संस्कारी और साहित्य-प्रेमी था। प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी उनके बड़े भाई थे। घर का वातावरण साहित्य, संस्कृति और समाज-सेवा से जुड़ा हुआ था, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। बचपन से ही वे गंभीर, संवेदनशील और अध्ययनशील स्वभाव के थे।
शिक्षा
भीष्म साहनी की प्रारम्भिक शिक्षा रावलपिंडी में हुई। बाद में उन्होंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने आगे चलकर पंजाब विश्वविद्यालय से एम०ए० तथा पी-एच०डी० की उपाधि प्राप्त की। उनकी रुचि साहित्य, समाज और राष्ट्रीय आंदोलनों में थी। वे पढ़ाई के साथ-साथ साहित्यिक तथा सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे।
कार्य-जीवन
शिक्षा पूर्ण करने के बाद भीष्म साहनी ने अध्यापन कार्य किया। वे कुछ समय तक कॉलेजों में अध्यापक रहे। बाद में वे दिल्ली आ गए और जाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक रहे। वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और सामाजिक सरोकारों से प्रेरित साहित्य रचते रहे। उन्होंने कुछ समय मॉस्को में रहकर रूसी साहित्य का हिंदी में अनुवाद भी किया।
उन्होंने साहित्य, रंगमंच और समाज तीनों क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
साहित्यिक व्यक्तित्व
भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के अत्यंत संवेदनशील और यथार्थवादी लेखक थे। उन्होंने समाज की समस्याओं, विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिकता, गरीबी, शोषण, मानवीय संबंधों और संघर्षशील जीवन को अपनी रचनाओं का विषय बनाया। उनकी रचनाओं में मानवीय करुणा, सामाजिक चेतना और यथार्थ का सशक्त चित्रण मिलता है। वे सरल भाषा में गहरी बात कहने वाले लेखक थे। भारत-विभाजन का दर्द उन्होंने निकट से देखा था, इसलिए उनकी रचनाओं में विभाजन की पीड़ा अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त हुई है।
प्रमुख रचनाएँ
भीष्म साहनी ने हिंदी साहित्य को अनेक श्रेष्ठ कृतियाँ प्रदान कीं। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—
- उपन्यास – तमस, बसंती, झरोखे, कड़ियाँ, मय्यादास की माड़ी, नीलू नीलिमा नीलोफर।
- कहानी-संग्रह – भाग्यरेखा, चीफ की दावत, पाली, वांग्चू, शोभायात्रा आदि।
- नाटक – कबिरा खड़ा बाज़ार में, माधवी, हानूश आदि।
- आत्मकथा – आज के अतीत।
उनका उपन्यास ‘तमस’ हिंदी साहित्य की अत्यंत प्रसिद्ध कृति है, जिस पर बाद में प्रसिद्ध धारावाहिक भी बना।
साहित्यिक विशेषताएँ
भीष्म साहनी की रचनाओं में निम्न विशेषताएँ प्रमुख हैं—
- सामाजिक यथार्थ का सजीव चित्रण
- विभाजन की त्रासदी का मार्मिक वर्णन
- मानवीय संवेदना
- सांप्रदायिकता का विरोध
- गरीब और शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति
- सरल और प्रभावशाली शैली
- जीवन की वास्तविक समस्याओं का चित्रण
- प्रगतिशील दृष्टिकोण
भाषा-शैली
भीष्म साहनी की भाषा सरल, सहज, स्वाभाविक और प्रवाहपूर्ण है। उन्होंने बोलचाल की खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में भावुकता, करुणा, व्यंग्य और यथार्थ का सुंदर समन्वय मिलता है।
उनकी शैली के प्रमुख रूप हैं—
- वर्णनात्मक शैली
- संवादात्मक शैली
- यथार्थवादी शैली
- भावात्मक शैली
- व्यंग्यात्मक शैली
उनकी शैली पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करती है।
साहित्य में स्थान
भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के प्रमुख कथाकारों और उपन्यासकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिंदी कथा-साहित्य, नाटक और अनुवाद साहित्य को नई दिशा दी। मानवीय मूल्यों और सामाजिक चेतना से युक्त साहित्य रचने के कारण हिंदी साहित्य में उनका स्थान अत्यंत सम्माननीय और गौरवपूर्ण है।
पुरस्कार और सम्मान
भीष्म साहनी को साहित्य सेवा के लिए अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ और उन्हें व्यापक लोकप्रियता मिली।
निधन
भीष्म साहनी का निधन 11 जुलाई 2003 ई० को नई दिल्ली में हुआ। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति पहुँची।
