प्रस्तावना
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के महान उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार तथा समाज-सुधारक लेखक थे।उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। वे ‘उपन्यास सम्राट’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रेमचंद ने अपने साहित्य के माध्यम से किसान, मजदूर, स्त्री, दलित और आम आदमी के जीवन-संघर्षों को गहरी संवेदना और सच्चाई के साथ प्रस्तुत किया। हिंदी साहित्य में 1918 से 1936 तक का कालखंड ‘प्रेमचंद युग’ कहलाता है।
जन्म और परिवार
मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 ई० को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के लमही गाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। बचपन में उनका नाम नवाब राय भी था। बाद में वे साहित्य-जगत में प्रेमचंद नाम से प्रसिद्ध हुए। उनके पिता का नाम मुंशी अजायब लाल था, जो डाक विभाग में क्लर्क थे। माता का नाम आनंदी देवी था। परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य थी। बाल्यकाल में ही माता का निधन हो गया, जिससे उनका बचपन कष्टों में बीता। गरीबी, संघर्ष और पारिवारिक कठिनाइयों ने उनके व्यक्तित्व को गंभीर, संवेदनशील और कर्मशील बना दिया।
शिक्षा
प्रेमचंद की प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू और फारसी से आरम्भ हुई। बाद में उन्होंने हिंदी और अंग्रेज़ी का भी अध्ययन किया। आर्थिक कठिनाइयों के कारण नियमित शिक्षा में बाधाएँ आईं, फिर भी उन्होंने स्वाध्याय के बल पर अच्छा ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने अध्यापन कार्य करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी और उच्च शिक्षा भी प्राप्त की। वे बचपन से ही पुस्तकों के प्रेमी थे। साहित्य पढ़ने और समाज को समझने की गहरी रुचि ने उन्हें महान लेखक बनाया।
कार्य-जीवन
प्रेमचंद ने प्रारम्भ में अध्यापक के रूप में नौकरी की। बाद में वे विद्यालय निरीक्षक भी बने। सरकारी नौकरी करते हुए भी वे साहित्य-सृजन में लगे रहे। सन् 1921 ई० में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और पूर्ण रूप से साहित्य तथा पत्रकारिता में लग गए। उन्होंने हंस, जागरण आदि पत्रिकाओं का संपादन किया। जीवनभर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करने पर भी उन्होंने लेखन कार्य नहीं छोड़ा।
साहित्यिक व्यक्तित्व
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के युग-प्रवर्तक लेखक माने जाते हैं। उन्होंने उपन्यास और कहानी को नई दिशा दी। उनकी रचनाओं में भारतीय समाज, किसान, मजदूर, स्त्री, दलित, गरीब, शोषित और मध्यमवर्गीय जीवन का सजीव चित्रण मिलता है। वे आदर्शवाद और यथार्थवाद के समन्वयकारी लेखक थे। उन्होंने समाज की कुरीतियों, दहेज प्रथा, छुआछूत, गरीबी, अन्याय, शोषण और अज्ञानता पर प्रहार किया। उन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है।
प्रमुख रचनाएँ
मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य को अनेक अमूल्य कृतियाँ दीं।
- उपन्यास – गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, सेवासदन, प्रेमाश्रम, कायाकल्प।
- कहानी-संग्रह – मानसरोवर, पंच परमेश्वर, ईदगाह, पूस की रात, कफन, नमक का दरोगा, बड़े घर की बेटी, दो बैलों की कथा।
- नाटक – संग्राम, करबला, प्रेम की वेदी।
- अन्य रचनाएँ – निबंध, संपादकीय लेख, बाल साहित्य।
साहित्यिक विशेषताएँ
प्रेमचंद की रचनाओं में निम्न विशेषताएँ प्रमुख हैं—
- सामाजिक यथार्थ का चित्रण
- किसान और मजदूर जीवन का वर्णन
- स्त्री-समस्याओं का चित्रण
- राष्ट्रीय चेतना
- मानवता और नैतिकता का संदेश
- सरल भाषा में गहरे विचार
भाषा-शैली
प्रेमचंद की भाषा सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण और प्रभावशाली है। उन्होंने बोलचाल की हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा का प्रयोग किया। उनकी भाषा में मुहावरों, लोकोक्तियों और ग्रामीण शब्दों का सुंदर प्रयोग मिलता है।
उनकी शैली के प्रमुख रूप हैं—
- वर्णनात्मक शैली
- संवादात्मक शैली
- यथार्थवादी शैली
- भावात्मक शैली
- व्यंग्यात्मक शैली
साहित्य में स्थान
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कथाकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने हिंदी उपन्यास और कहानी को नई ऊँचाई दी। वे भारतीय समाज के सच्चे चित्रकार थे। उन्हें हिंदी साहित्य में “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है। उनका स्थान अत्यंत ऊँचा, गौरवपूर्ण और अमर है।
पुरस्कार और सम्मान
प्रेमचंद को जीवनकाल में जनता का अपार प्रेम और सम्मान मिला। उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाएँ विश्वभर में पढ़ी जाती हैं और उन्हें हिंदी साहित्य के महानतम लेखकों में गिना जाता है।
निधन
मुंशी प्रेमचंद का निधन 8 अक्टूबर 1936 ई० को हुआ। उनके निधन से हिंदी साहित्य को अपूरणीय क्षति पहुँची।
