जीवन परिचय
कवि देव हिंदी साहित्य के रीतिकाल के अत्यंत प्रसिद्ध, प्रतिभाशाली और आचार्य कवियों में गिने जाते हैं। उनका पूरा नाम देवदत्त माना जाता है, परंतु साहित्य जगत में वे देव नाम से प्रसिद्ध हुए। उनका जन्म लगभग 1673 ई० में इटावा (उत्तर प्रदेश) के समीप एक विद्वान सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ माना जाता है। उनके पिता का नाम बिहारीलाल दुबे बताया जाता है, जो विद्वान एवं संस्कारी व्यक्ति थे। देव का जन्म ऐसे समय में हुआ जब हिंदी साहित्य में रीतिकाल का प्रभाव चरम पर था। उस समय दरबारी काव्य, श्रृंगार वर्णन, अलंकार और काव्यशास्त्र का विशेष महत्व था। इसी साहित्यिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व और रचनाओं को आकार दिया।
प्रारम्भिक जीवन
देव का बचपन विद्या, संस्कृति और धार्मिक वातावरण में बीता। वे बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान, जिज्ञासु और काव्य प्रेमी थे। कम आयु से ही उनकी रुचि कविता, भाषा सौंदर्य, छंद और अलंकारों में थी। उनकी प्रतिभा को देखकर परिवार तथा विद्वानों ने उन्हें उच्च शिक्षा दिलाई। धीरे-धीरे वे काव्य रचना में निपुण होते गए और कम आयु में ही विद्वान कवि के रूप में प्रसिद्ध होने लगे।
शिक्षा
कवि देव ने संस्कृत, हिंदी, ब्रजभाषा, व्याकरण, काव्यशास्त्र, अलंकारशास्त्र, छंदशास्त्र, पुराण और दर्शन का गहन अध्ययन किया था। वे संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे और ब्रजभाषा पर उनका अद्भुत अधिकार था। उनकी रचनाओं से स्पष्ट होता है कि वे रस, अलंकार, नायिका भेद, काव्य गुण-दोष तथा छंदों के गहरे विद्वान थे। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि आचार्य भी थे।
राजाश्रय और दरबारी जीवन
रीतिकाल के अन्य कवियों की भाँति कवि देव ने भी अनेक राजाओं और सामंतों के आश्रय में रहकर साहित्य रचना की। वे विभिन्न राजदरबारों में सम्मानित हुए। उस समय कवियों को राजाओं से संरक्षण मिलता था, जिससे वे साहित्य सृजन कर पाते थे। देव ने कई राज्यों की यात्राएँ कीं और अनेक दरबारों में सम्मान पाया। राजदरबारों के वैभव, शौर्य, प्रेम और विलासपूर्ण जीवन का प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है।
साहित्यिक परिचय
कवि देव हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख कवि, आचार्य और अलंकारवादी रचनाकार थे। उन्होंने काव्य में श्रृंगार रस, नायिका भेद, अलंकार, सौंदर्य चित्रण, नीति तथा रस सिद्धांतों को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं में विद्वत्ता और कलात्मकता का अद्भुत मेल मिलता है। वे शब्द चयन, भाव सौंदर्य और कल्पना शक्ति के कारण विशेष प्रसिद्ध हैं।
प्रमुख रचनाएँ
कवि देव ने अनेक ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—
- 1. भाव विलास
- 2. रस विलास
- 3. काव्य रसायन
- 4. भवानी विलास
- 5. अष्टयाम
- 6. देव सतसई
- 7. सुजान विनोद
भाषा-शैली
कवि देव की भाषा मुख्यतः ब्रजभाषा है। उनकी भाषा अत्यंत मधुर, परिष्कृत, साहित्यिक और अलंकारयुक्त है। शब्द चयन सुंदर तथा प्रभावशाली है। उनकी शैली चित्रात्मक, कलात्मक, श्रृंगारपूर्ण, शास्त्रीय और प्रभावशाली है। उन्होंने उपमा, रूपक, अनुप्रास, यमक आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग किया है।
काव्य की विशेषताएँ
कवि देव के काव्य में श्रृंगार रस की प्रधानता है। नायिका भेद, प्रेम की अवस्थाएँ, सौंदर्य चित्रण और भावनात्मक कोमलता का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है। उनके साहित्य में अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है। भाषा में मधुरता, लय और प्रवाह मिलता है। कल्पना शक्ति, भाव सौंदर्य और शब्द वैभव उनकी रचनाओं को विशिष्ट बनाते हैं। नीति और जीवन अनुभव भी उनके काव्य में दिखाई देते हैं।
व्यक्तित्व
कवि देव अत्यंत विद्वान, स्वाभिमानी, प्रतिभाशाली और कलाप्रेमी व्यक्ति थे। उनमें साहित्यिक दृष्टि, काव्य प्रतिभा और शास्त्रीय ज्ञान का अद्भुत समन्वय था। वे सौंदर्य प्रेमी तथा रसिक स्वभाव के कवि थे। उनके व्यक्तित्व में विद्वता के साथ व्यवहारिकता भी थी। वे दरबारों में सम्मानित होने के बावजूद साहित्य को सर्वोच्च महत्व देते थे।
साहित्य में स्थान
कवि देव हिंदी साहित्य के रीतिकाल के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। आचार्यत्व, अलंकार ज्ञान, श्रृंगार चित्रण और भाषा सौंदर्य के कारण उनका विशेष स्थान है। उन्हें बिहारी, मतिराम, पद्माकर आदि प्रमुख रीतिकालीन कवियों की श्रेणी में रखा जाता है। ब्रजभाषा साहित्य को समृद्ध बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
पुरस्कार और सम्मान
उनके समय में आधुनिक पुरस्कारों की परंपरा नहीं थी, परंतु उन्हें अनेक राजाओं और दरबारों में विशेष सम्मान प्राप्त था। विद्वान समाज में उनका नाम आदर से लिया जाता था।
निधन
कवि देव का निधन लगभग 1767 ई० के आसपास माना जाता है। उनके निधन के बाद भी उनकी रचनाएँ उन्हें अमर बनाए हुए हैं।
