संत रैदास, जिन्हें रविदास, रिडास या रैदास के नाम से भी जाना जाता है, 15वीं–16वीं शताब्दी के महान भारतीय संत, कवि, समाज सुधारक और भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उन्होंने मानव धर्म, समानता, प्रेम और भक्ति का ऐसा संदेश दिया जिसने भारतीय समाज की सामाजिक-धार्मिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया।
जीवन परिचय
संत रैदास, जिन्हें रविदास के नाम से भी जाना जाता है, उनका जन्म लगभग 1450 ई० (कुछ विद्वानों के अनुसार 1377 ई० अथवा 1398 ई०) में सीर गोवर्धनपुर, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) में हुआ माना जाता है। उनके पिता का नाम संतोक दास (या रघु) तथा माता का नाम कर्मा देवी बताया जाता है। संत रैदास का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। वे बचपन से ही दयालु, धार्मिक, विनम्र और संत स्वभाव के थे। उनका मन ईश्वर भक्ति, साधु-संगति और सेवा में लगता था। कहा जाता है कि वे बचपन से ही समाज में फैली ऊँच-नीच, जाति-पाँति और भेदभाव से दुखी रहते थे। उनका परिवार चर्मकार समाज से संबंधित था। सामाजिक दृष्टि से निम्न माने जाने वाले वर्ग में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने ज्ञान, भक्ति और महान विचारों से समाज में उच्च स्थान प्राप्त किया।
शिक्षा
संत रैदास ने औपचारिक शिक्षा बहुत कम प्राप्त की, परंतु वे अत्यंत ज्ञानवान थे। उन्होंने सत्संग, साधु-संगति और आत्मचिंतन से ज्ञान प्राप्त किया। उनकी वाणी में आध्यात्मिकता, दर्शन, समाज सुधार और मानवीय संवेदना का अद्भुत समन्वय मिलता है। वे अनुभवजन्य ज्ञान के समर्थक थे।
व्यवसाय
संत रैदास अपने पैतृक व्यवसाय जूते बनाने का कार्य करते थे। वे कर्म को पूजा मानते थे और श्रम की महत्ता पर बल देते थे। वे साधारण जीवन जीते हुए भी उच्च विचारों वाले संत थे। उन्होंने बताया कि मनुष्य की महानता उसके कर्म और चरित्र से होती है, जन्म से नहीं।
भक्ति और विचारधारा
संत रैदास निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख संत थे। वे ईश्वर को निराकार, सर्वव्यापक और प्रेममय मानते थे। उन्होंने जाति-पाँति, ऊँच-नीच, अंधविश्वास और बाहरी आडंबरों का विरोध किया। वे प्रेम, भक्ति, समानता और सदाचार को सच्चा धर्म मानते थे। उनका प्रसिद्ध विचार “मन चंगा तो कठौती में गंगा” आज भी अत्यंत लोकप्रिय है।
गुरु और शिष्य
कुछ परंपराओं के अनुसार संत रैदास स्वामी रामानंद के शिष्य थे। वे मीराबाई के गुरु भी माने जाते हैं। उनकी वाणी और शिक्षाओं से अनेक लोग प्रभावित हुए।
साहित्यिक परिचय
संत रैदास हिंदी साहित्य के महान संत कवि थे। उनकी रचनाओं में भक्ति, ज्ञान, समानता, मानवता और समाज सुधार का संदेश मिलता है। उनके पद सरल, मधुर, प्रभावशाली और जनभाषा में हैं। उन्होंने सामान्य जनता की भाषा में गहरे आध्यात्मिक विचार व्यक्त किए। उनकी वाणी का संकलन गुरु ग्रंथ साहिब में भी मिलता है, जिससे उनकी महानता सिद्ध होती है।
प्रमुख रचनाएँ
संत रैदास की रचनाएँ मुख्यतः पदों और साखियों के रूप में उपलब्ध हैं। उनके प्रसिद्ध पद—
- प्रभु जी तुम चंदन हम पानी
- मन चंगा तो कठौती में गंगा
- ऐसा चाहूँ राज मैं
- अब कैसे छुटे राम नाम रट लागी
भाषा-शैली
संत रैदास की भाषा सरल, सहज, लोकप्रचलित और प्रभावशाली है। उनकी भाषा में ब्रज, अवधी, खड़ी बोली तथा लोकभाषा के शब्द मिलते हैं। उनकी शैली उपदेशात्मक, भक्तिमय, भावपूर्ण और जनसुलभ है।
साहित्य में स्थान
संत रैदास भारतीय संत परंपरा और हिंदी साहित्य के महान कवि माने जाते हैं। उन्होंने समाज को समानता, प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाया। वे दलित चेतना, मानवता और सामाजिक न्याय के प्रेरक संत हैं।
पुरस्कार और सम्मान
उनके समय में आधुनिक पुरस्कारों की व्यवस्था नहीं थी, परंतु आज वे भारत के महान संतों में गिने जाते हैं। उनके नाम पर अनेक संस्थाएँ, स्मारक और मंदिर स्थापित हैं।
निधन
संत रैदास के निधन की निश्चित तिथि विवादित है, परंतु सामान्यतः उनका निधन 1520 ई० के आसपास माना जाता है।
