सुधा अरोड़ा का जीवन परिचय (Sudha Arora Biography in Hindi)

सुधा अरोड़ा समकालीन हिंदी साहित्य की एक अत्यंत सशक्त, संवेदनशील और वैचारिक लेखिका हैं। वे कहानीकार, उपन्यासकार, कवयित्री, नारीवादी चिंतक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में व्यापक पहचान रखती हैं। उनके लेखन का केंद्रीय सरोकार भारतीय स्त्री का जीवन, उसकी सामाजिक स्थिति, संघर्ष, अस्मिता और आत्मसम्मान रहा है। उन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का माध्यम न मानकर उसे सामाजिक हस्तक्षेप का औज़ार बनाया।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

सुधा अरोड़ा का जन्म 4 अक्टूबर 1946 को लाहौर (तत्कालीन भारत, वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ। देश-विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आया। विस्थापन, स्मृति और स्त्री की असुरक्षा जैसे अनुभव उनके लेखन की अंतर्धारा में दिखाई देते हैं।

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उनका बचपन और युवावस्था ऐसे समय में बीती जब समाज में स्त्री की भूमिका सीमित मानी जाती थी, किंतु उन्होंने शिक्षा और लेखन के माध्यम से अपने लिए स्वतंत्र रास्ता चुना।

शिक्षा और अध्यापन

सुधा अरोड़ा ने अपनी उच्च शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राप्त की।
शिक्षा पूरी करने के बाद—

  • 1969 से 1971 तक
  • कलकत्ता विश्वविद्यालय के दो कॉलेजों में अध्यापन किया

शिक्षण के साथ-साथ उनका झुकाव लगातार साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों की ओर बढ़ता गया।

साहित्यिक जीवन और लेखन-यात्रा

सुधा अरोड़ा हिंदी कथा-साहित्य का एक स्थापित नाम हैं। उन्होंने—

  • 100 से अधिक कहानियाँ
  • उपन्यास
  • कविताएँ
  • नाटक
  • स्त्री-विमर्श पर आलोचनात्मक पुस्तकें
  • संपादन और अनुवाद

का सृजन किया है।

उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे औरत को सहानुभूति का विषय नहीं, बल्कि संघर्षशील व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं।

लेखन की विषय-वस्तु और साहित्यिक विशेषताएँ

सुधा अरोड़ा के साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ—

  • स्त्री जीवन की यथार्थवादी प्रस्तुति
  • घरेलू, सामाजिक और राजनीतिक दमन का चित्रण
  • मध्यवर्गीय स्त्री की चुप पीड़ा और प्रतिरोध
  • भाषा में सहजता, संवादात्मकता और तीखापन
  • भावुकता के बजाय विवेक और चेतना

उनका लेखन हिंदी नारीवादी साहित्य की आधारशिला माना जाता है।

प्रमुख कहानी-संग्रह

  • बगैर तराशे हुए (1967)
  • युद्धविराम (1977)
  • महानगर की मैथिली (1987)
  • काला शुक्रवार (2004)
  • कांसे का गिलास (2004)
  • रहोगी तुम वही (2007)
  • एक औरत : तीन बटा चार (2011)
  • अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चिट्ठी (2014)
  • बुत जब बोलते हैं (2015)
  • करवाचौथी औरत (2023)
  • कथा सप्तक (2023)

प्रमुख उपन्यास

  • यहीं कहीं था घर (2010)
    👉 यह उपन्यास विस्थापन, स्मृति और स्त्री-अस्मिता का मार्मिक दस्तावेज़ है।

स्त्री-विमर्श और आलोचनात्मक कृतियाँ

  • आम औरत : ज़िंदा सवाल (2008)
  • एक औरत की नोटबुक (2010)
  • सांकल सपने और सवाल (2018)
  • स्त्री समय संवाद (2016)

ये पुस्तकें हिंदी के स्त्री-विमर्श में मील का पत्थर मानी जाती हैं।

कविता-संग्रह

  • रचेंगे हम साझा इतिहास (2012)
  • कम से कम एक दरवाज़ा (2015)

इन कविताओं में सामाजिक चेतना और स्त्री-संघर्ष की स्पष्ट आवाज़ सुनाई देती है।

संपादन और शोध-कार्य

  • औरत की कहानी – भारतीय ज्ञानपीठ
  • दहलीज़ को लाँघते हुए
  • पंखों की उड़ान
  • मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर
  • स्त्री संवेदना : विमर्श के निकष (दो खंड)

अनुवाद और भाषाई विस्तार

सुधा अरोड़ा की रचनाएँ—

  • अंग्रेज़ी
  • उर्दू
  • मराठी
  • पंजाबी
  • मैथिली
  • फ्रेंच
  • जापानी

सहित कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।

टेलीविज़न, फ़िल्म और रंगमंच

उनकी कहानियों पर—

  • दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्में बनीं
  • कहानी ‘युद्धविराम’, ‘जानकीनामा’ आदि पर फिल्मांकन
  • फ़िल्म ‘बवंडर’ की पटकथा
  • कई रेडियो नाटक और धारावाहिक

पत्रकारिता और स्तंभ-लेखन

  • पाक्षिक ‘सारिका’आम आदमी : ज़िंदा सवाल
  • दैनिक ‘जनसत्ता’ — स्तंभ ‘वामा’
  • पत्रिका ‘कथादेश’‘औरत की दुनिया’, ‘राख में दबी चिनगारी’

उनके स्तंभों ने स्त्री-मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया।

पुरस्कार और सम्मान

सुधा अरोड़ा को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया—

  • उ.प्र. हिंदी संस्थान सम्मान (1978)
  • भारत निर्माण सम्मान (2008)
  • प्रियदर्शिनी अकादमी सम्मान (2010)
  • महिला अचीवर अवॉर्ड (2011)
  • महाराष्ट्र हिंदी साहित्य अकादमी सम्मान (2012)
  • मुंशी प्रेमचंद कथा सम्मान (2014)
  • मीरा स्मृति सम्मान (2016)
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल सम्मान (2020)
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