फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का जन्म 13 फरवरी 1911 को तत्कालीन अविभाजित भारत के सियालकोट शहर में हुआ था, जो आज पाकिस्तान में स्थित है। उनका परिवार एक मध्यमवर्गीय और धार्मिक मुस्लिम परिवार था। उनके पिता का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। वे बचपन में भूमिहीन किसान परिवार से थे, लेकिन कठिन परिश्रम और शिक्षा के बल पर उन्होंने स्वयं को स्थापित किया और बाद में अफ़ग़ानिस्तान के राजा के अंग्रेज़ी अनुवादक भी रहे।
फ़ैज़ का बचपन अनुशासन, धार्मिक शिक्षा और भाषाई अध्ययन के वातावरण में बीता। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान उन्होंने उर्दू, अरबी और फ़ारसी सीखी तथा क़ुरआन का गहन अध्ययन किया। यही कारण है कि उनकी शायरी में भाषा की गहराई, प्रतीकों की सुंदरता और विचारों की स्पष्टता दिखाई देती है।
शिक्षा और बौद्धिक विकास
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी औपचारिक शिक्षा स्कॉटिश मिशन स्कूल, सियालकोट से प्राप्त की। इसके बाद वे उच्च शिक्षा के लिए लाहौर विश्वविद्यालय गए, जहाँ उन्होंने—
- 1933 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.
- 1934 में अरबी भाषा में एम.ए.
की उपाधि प्राप्त की।
पश्चिमी साहित्य, अरबी क्लासिक्स और उर्दू शायरी—इन तीनों का गहरा प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर पड़ा। यही कारण है कि उनकी कविता में शेक्सपीयर, कीट्स, ग़ालिब और सूफ़ी परंपरा—all एक साथ महसूस होते हैं।
अध्यापन, सेना और शुरुआती करियर
अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद फ़ैज़ ने एम.ए.ओ. कॉलेज, अमृतसर में अध्यापन कार्य शुरू किया। कुछ समय बाद वे ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल हुए और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सक्रिय रहे। सेना में रहते हुए वे कर्नल के पद तक पहुँचे।
1947 में भारत-पाक विभाजन के बाद उन्होंने सेना से इस्तीफ़ा दे दिया और लाहौर लौट आए। इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक संघर्ष को समर्पित हो गया।
प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़ाव
1936 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ प्रगतिशील लेखक संघ (Progressive Writers’ Association) से जुड़े, जिसकी स्थापना प्रेमचंद, सज्जाद ज़हीर और मुल्क राज आनंद ने की थी। फ़ैज़ इस आंदोलन के सबसे मजबूत स्तंभ बने।
इस दौर में उनकी शायरी—
- साम्राज्यवाद के विरोध
- शोषण और अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़
- मज़दूर, किसान और आम इंसान की पीड़ा
को अभिव्यक्त करने लगी।
पत्रकारिता और संपादक के रूप में भूमिका
फ़ैज़ ने “पाकिस्तान टाइम्स” और “इमरोज़” जैसे प्रमुख समाचार पत्रों के संपादक के रूप में कार्य किया। उनकी लेखनी सत्ता से सवाल पूछती थी, इसी कारण वे सरकार की आँखों की किरकिरी बन गए।
जेल जीवन और संघर्ष
1951 में रावलपिंडी षड्यंत्र केस के तहत फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश रचने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया। वे 1951 से 1955 तक जेल में रहे।
जेल के इस दौर ने उनकी शायरी को और अधिक धारदार बना दिया। इसी समय उन्होंने—
- “ज़िंदानामा”
- “दस्त-ए-सबा”
जैसी अमर कृतियाँ लिखीं।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ—
“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे,
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है”
जेल की दीवारों को लांघकर पूरी दुनिया में गूंज उठीं।
निर्वासन और अंतरराष्ट्रीय पहचान
फ़ैज़ का जीवन केवल जेल तक सीमित नहीं रहा। उन्हें कई बार निर्वासन भी झेलना पड़ा। उन्होंने यूरोप, मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के कई देशों की यात्रा की। वे—
- एशिया-अफ्रीका लेखक संघ के संस्थापक सदस्य
- बेरुत (लेबनॉन) में लंबे समय तक कार्यरत
रहे।
1963 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका नाम नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित हुआ।
साहित्यिक कृतियाँ और रचनात्मक योगदान
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की प्रमुख कृतियाँ—
- नक़्श-ए-फ़र्यादी
- दस्त-ए-सबा
- ज़िंदानामा
- दस्त-ए-तह-ए-संग
- शाम-ए-शहर-ए-याराँ
- ग़ुबार-ए-अय्याम (मरणोपरांत)
उनकी शायरी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें इश्क़ और इंक़लाब एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथी बन जाते हैं।
निजी जीवन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने एक ब्रिटिश महिला एलिस जॉर्ज से विवाह किया। उनकी दो बेटियाँ थीं—
- सलीमा
- मुनीज़ा
एलिस ने फ़ैज़ के संघर्षपूर्ण जीवन में हर मोड़ पर उनका साथ दिया, यहाँ तक कि जेल और निर्वासन के समय भी।
मृत्यु और विरासत
20 नवंबर 1984 को लाहौर में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी शायरी जीवित रही और आज भी—
- आंदोलनों में
- गीतों में
- आम लोगों की ज़ुबान पर
सुनी जाती है।
फ़ैज़ केवल एक शायर नहीं थे, वे ज़मीर की आवाज़, इंसानियत का पैग़ाम और उम्मीद का नाम थे।
