प्रस्तावना
मजरूह सुल्तानपुरी उर्दू साहित्य और हिंदी सिनेमा का वह चमकता सितारा थे, जिन्होंने शायरी और गीतों के माध्यम से इश्क़, इंक़लाब, समाज और इंसानियत—चारों को एक साथ पिरो दिया। वे केवल फिल्मी गीतकार नहीं थे, बल्कि प्रगतिशील लेखक आंदोलन के सबसे सशक्त शायरों में से एक थे। उनकी लेखनी में सौंदर्य भी था और संघर्ष की आग भी।
मजरूह सुल्तानपुरी का वास्तविक नाम और परिचय
- वास्तविक नाम: असरार उल हसन खान
- तख़ल्लुस (उपनाम): मजरूह सुल्तानपुरी
- जन्म: 1 अक्टूबर 1919
- जन्म स्थान: सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश
- मृत्यु: 24 मई 2000
- मृत्यु स्थान: मुंबई
जन्म और प्रारंभिक जीवन
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक ज़िले सुल्तानपुर में हुआ। उनके परिवार का माहौल साहित्यिक और सांस्कृतिक रुचियों से भरा हुआ था। बचपन से ही उन्हें शायरी, ग़ज़ल और अदब से गहरा लगाव था।
उनके दिल में समाज के प्रति संवेदना और अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाने की भावना बचपन से ही मौजूद थी, जो आगे चलकर उनकी शायरी की पहचान बनी।
शिक्षा और हकीमी का सफ़र
- मजरूह सुल्तानपुरी ने लखनऊ के ‘तकमील-उल-तीब कॉलेज’ से यूनानी चिकित्सा (हकीमी) की पढ़ाई की।
- पढ़ाई पूरी करने के बाद वे हकीम बने और कुछ समय तक इसी पेशे से जुड़े रहे।
- लेकिन शायरी का जुनून इतना गहरा था कि अंततः उन्होंने चिकित्सा छोड़कर साहित्य और शायरी को ही जीवन बना लिया।
शायरी की शुरुआत और जिगर मुरादाबादी का प्रभाव
मजरूह सुल्तानपुरी बचपन से ही ग़ज़लें लिखने लगे थे।
उनकी ज़िंदगी में निर्णायक मोड़ तब आया, जब उनकी मुलाकात मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से हुई।
जिगर साहब ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें न केवल प्रोत्साहित किया, बल्कि फिल्मों में गीत लेखन की दिशा भी दिखाई। यही मुलाकात आगे चलकर हिंदी सिनेमा के इतिहास को बदलने वाली साबित हुई।
फ़िल्मी करियर की शुरुआत – ‘शाहजहां’ (1946)
1946 में मजरूह सुल्तानपुरी पहली बार मुंबई आए। एक मुशायरे के दौरान उनकी प्रतिभा पर फ़िल्म निर्माता ए.आर. कारदार की नज़र पड़ी।
- उनकी पहली फिल्म थी ‘शाहजहां’ (1946)
- संगीतकार: नौशाद
- गायक: के. एल. सहगल
इस फिल्म के अमर गीत:
- “जब दिल ही टूट गया”
- “ग़म दिए मुस्तक़िल”
इन गीतों ने मजरूह को रातों-रात मशहूर कर दिया।
प्रगतिशील लेखक आंदोलन और जेल यात्रा
मजरूह सुल्तानपुरी वामपंथी और प्रगतिशील विचारधारा से गहराई से जुड़े थे।
उन्होंने अपनी कविताओं में सत्ता, शोषण और अन्याय पर खुलकर प्रहार किया।
- पंडित नेहरू की नीतियों की आलोचना करती एक जोशीली कविता लिखने के कारण
- उन्हें करीब सवा साल जेल में रहना पड़ा
लेकिन जेल भी उनकी आवाज़ को दबा नहीं सकी—बल्कि उनकी शायरी और अधिक धारदार हो गई।
हिंदी सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान
मजरूह सुल्तानपुरी ने लगभग 50 वर्षों तक हिंदी फिल्मों के लिए लेखन किया।
उपलब्धियाँ:
- लगभग 350 फिल्मों के लिए
- 2000 से अधिक गीत लिखे
प्रमुख संगीतकार जिनके साथ काम किया:
- नौशाद
- एस. डी. बर्मन
- आर. डी. बर्मन
- ओ. पी. नैय्यर
- लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल
नासिर हुसैन के साथ ऐतिहासिक साझेदारी
मजरूह सुल्तानपुरी और निर्देशक-निर्माता नासिर हुसैन की जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे सफल जोड़ियों में गिनी जाती है।
प्रमुख फ़िल्में:
- तुमसा नहीं देखा
- दिल देके देखो
- तीसरी मंज़िल
- बहार के सपने
- प्यार का मौसम
- यादों की बारात
- हम किसी से कम नहीं
- क़यामत से क़यामत तक
- जो जीता वही सिकंदर
👉 आर. डी. बर्मन को तीसरी मंज़िल में लाने में भी मजरूह की अहम भूमिका रही।
मजरूह सुल्तानपुरी की शायरी की विशेषताएँ
- उर्दू की क्लासिक रवायत
- सरल लेकिन गहरी भाषा
- आम इंसान की पीड़ा की अभिव्यक्ति
- इश्क़ और इंक़लाब का अनोखा संगम
प्रसिद्ध शेर:
“मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।”
पुरस्कार और सम्मान
- फिल्मफेयर अवॉर्ड (1965) – फिल्म दोस्ती
- ग़ालिब अवॉर्ड (1980)
- इक़बाल अवॉर्ड (1992)
- दादा साहब फाल्के पुरस्कार (1994) – भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान
निधन
- तारीख़: 24 मई 2000
- स्थान: मुंबई
- कारण: फेफड़ों की बीमारी (निमोनिया)
अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक वे साहित्य और सिनेमा से जुड़े रहे।
