प्रस्तावना
निर्मल वर्मा (1929–2005) हिंदी साहित्य के नई कहानी आंदोलन के सबसे सशक्त और संवेदनशील रचनाकारों में गिने जाते हैं। वे उपन्यासकार, कथाकार, निबंधकार, यात्रा-वृत्तांत लेखक, अनुवादक और सांस्कृतिक चिंतक थे। उनके साहित्य में अकेलापन, विस्थापन, स्मृति, आत्मसंघर्ष और आधुनिक मनुष्य की आंतरिक पीड़ा का अत्यंत सूक्ष्म और गहन चित्रण मिलता है।
उनकी कहानी ‘परिंदे’ को हिंदी साहित्य में नई कहानी आंदोलन की पहली पहचान माना जाता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
निर्मल वर्मा का जन्म 3 अप्रैल 1929 को शिमला (हिमाचल प्रदेश) में हुआ।
- पिता ब्रिटिश भारतीय सरकार के सिविल सेवा विभाग में अधिकारी थे
- वे आठ भाई-बहनों में सातवें थे
- उनके बड़े भाई राम कुमार भारत के प्रसिद्ध आधुनिक चित्रकार थे
- उनकी पत्नी गगन गिल स्वयं एक जानी-मानी लेखिका हैं
परिवार का यह सांस्कृतिक और बौद्धिक वातावरण निर्मल वर्मा की संवेदनशीलता के निर्माण में सहायक रहा।
शिक्षा और आरंभिक साहित्यिक रुचि
निर्मल वर्मा ने
- दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से
- इतिहास विषय में स्नातकोत्तर (M.A.) किया
छात्र जीवन के दौरान ही उनकी
- साहित्य
- राजनीति
- वैचारिक आंदोलनों
में गहरी रुचि विकसित हो गई थी। उन्होंने 1950 के दशक की शुरुआत में एक छात्र पत्रिका के लिए अपनी पहली कहानी लिखी।
वैचारिक सक्रियता और सामाजिक चेतना
निर्मल वर्मा का छात्र जीवन केवल अकादमिक नहीं था, बल्कि वैचारिक रूप से भी अत्यंत सक्रिय था।
- 1947–48 में वे नियमित रूप से महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में भाग लेते थे
- वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य रहे
- 1956 में हंगरी पर सोवियत आक्रमण के बाद पार्टी से इस्तीफा दे दिया
इस वैचारिक टूटन और मोहभंग का प्रभाव उनके साहित्य में गहराई से दिखाई देता है।
“एक लेखक के लिए आध्यात्मिक सुरक्षा की इच्छा रखना उतना ही घातक है जितना भौतिक सुख की आकांक्षा।”
— धुंध से उठती धुन
प्राग प्रवास और यूरोपीय अनुभव
निर्मल वर्मा का जीवन का एक निर्णायक चरण उनका प्राग (चेकोस्लोवाकिया) प्रवास रहा।
- लगभग 10 वर्षों तक प्राग में निवास
- ओरिएंटल इंस्टिट्यूट द्वारा आमंत्रण
- आधुनिक चेक लेखकों के हिंदी अनुवाद का कार्य
- चेक भाषा सीखी
- कारेल चापेक, मिलान कुंडेरा, बोहुमिल हराबल जैसे लेखकों से गहरा परिचय
1968 में वारसा संधि द्वारा चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण के बाद वे भारत लौट आए।
यूरोप यात्रा और यात्रा-वृत्तांत
प्राग प्रवास के दौरान उन्होंने पूरे यूरोप की व्यापक यात्राएँ कीं, जिनसे उनकी यात्रा-साहित्य की परंपरा बनी।
प्रमुख यात्रा-वृत्तांत
- चीरों पर चांदनी (1962)
- हर बारिश में (1970)
- धुंध से उठती धुन
इन रचनाओं में यूरोप को उन्होंने बाहरी पर्यटक की तरह नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव के स्तर पर देखा।
साहित्यिक जीवन और नई कहानी आंदोलन
निर्मल वर्मा हिंदी साहित्य के नई कहानी आंदोलन के संस्थापकों में प्रमुख हैं।
नई कहानी आंदोलन में उनके साथ शामिल थे—
- मोहन राकेश
- भीष्म साहनी
- कमलेश्वर
- अमरकांत
- राजेंद्र यादव
नई कहानी की विशेषताएँ (निर्मल वर्मा के संदर्भ में)
- बाहरी घटनाओं से अधिक आंतरिक संवेदना
- कथानक से अधिक अनुभूति
- मनोवैज्ञानिक गहराई
- अकेलापन और अस्तित्व-बोध
उनकी कहानी ‘परिंदे’ (1959) को इस आंदोलन का प्रस्थान-बिंदु माना जाता है।
कहानीकार के रूप में निर्मल वर्मा
निर्मल वर्मा की कहानियाँ सूक्ष्म, मौन और गहन संवेदना से भरी होती हैं।
प्रमुख कहानी-संग्रह
- परिंदे (1959)
- जलती झाड़ी (1965)
- पिछली गर्मियों में
- डेढ़ इंच ऊपर
- कव्वे और काला पानी
- सूखा तथा अन्य कहानियाँ
- धागे (2003)
उनकी अंतिम कहानी “अब कुछ नहीं” अगस्त 2005 में प्रकाशित हुई।
उपन्यासकार के रूप में निर्मल वर्मा
निर्मल वर्मा ने हिंदी उपन्यास को अस्तित्ववादी और आत्मकेंद्रित दृष्टि प्रदान की।
प्रमुख उपन्यास
- वे दिन (1964) – प्राग के छात्र जीवन पर आधारित
- लाल टीन की छत
- एक चिथड़ा सुख
- अंतिम अरण्य
- रात का रिपोर्टर
‘एक चिथड़ा सुख’ को आधुनिक हिंदी उपन्यासों में विशेष स्थान प्राप्त है।
निबंधकार और सांस्कृतिक चिंतक
निर्मल वर्मा केवल कथाकार नहीं, बल्कि गहरे सभ्यतागत चिंतक भी थे।
प्रमुख निबंध-संग्रह
- शब्द और स्मृति
- कला का जोख़िम
- ढुंध से उठती धुन
- भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र
इन निबंधों में उन्होंने
- भारतीय परंपरा
- पश्चिमी आधुनिकता
- सांस्कृतिक टकराव
पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया।
नाटक और अन्य विधाएँ
- तीन एकांत (नाटक)
- पत्र-साहित्य: प्रिया राम (भाई राम कुमार को लिखे पत्र)
प्रशासनिक और संस्थागत भूमिकाएँ
- 1980–83: भारत भवन, भोपाल में निराला रचनात्मक लेखन पीठ के अध्यक्ष
- 1988–90: यशपाल रचनात्मक लेखन पीठ, शिमला के निदेशक
फिल्म और कला से संबंध
उनकी कहानी पर आधारित फिल्म ‘माया दर्पण’ (1972)
- निर्देशक: कुमार शाहानी
- फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड (Best Film)
पुरस्कार और सम्मान
निर्मल वर्मा को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (1999)
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985) – कव्वे और काला पानी
- पद्म भूषण (2002)
- मूर्तिदेवी पुरस्कार
- साहित्य अकादमी फैलोशिप (2005)
- फ्रांस का Chevalier de l\’Ordre des Arts et des Lettres
निधन
निर्मल वर्मा का निधन
25 अक्टूबर 2005 को नई दिल्ली में हुआ।
