प्रस्तावना
यशपाल (1903–1976) हिंदी साहित्य के उन विरल लेखकों में हैं जिनका जीवन क्रांति, संघर्ष और रचना—तीनों का जीवंत उदाहरण है। वे केवल एक साहित्यकार ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी, विचारक और समाज-सुधारक भी थे। उनके साहित्य में भारत के स्वतंत्रता संग्राम, वर्ग संघर्ष, सामाजिक विषमता, राजनीतिक पाखंड और नैतिक द्वंद्व का सशक्त चित्रण मिलता है।
यशपाल ने साहित्य को मनोरंजन नहीं, बल्कि वैचारिक क्रांति का हथियार बनाया।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
यशपाल का जन्म 3 दिसंबर 1903 ई. को फिरोजपुर छावनी (पंजाब) में हुआ था।
- पिता का नाम हीरालाल था, जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत सामान्य थी।
- माता प्रेमदेवी आर्य समाज से प्रभावित, शिक्षित और विचारशील महिला थीं।
- उनके पूर्वज हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले से संबंधित थे।
माता के संस्कारों और परिवार की साधारण परिस्थितियों ने यशपाल के व्यक्तित्व में संघर्ष, आत्मनिर्भरता और सामाजिक चेतना का बीज बो दिया।
शिक्षा और प्रारंभिक जीवन
यशपाल की प्रारंभिक शिक्षा गुरुकुल कांगड़ी में हुई। गुरुकुल का राष्ट्रवादी और आर्य समाजी वातावरण उनके मन में अंग्रेज़ी शासन के प्रति तीव्र विरोध उत्पन्न करता गया।
- बाद में वे लाहौर के नेशनल कॉलेज पहुँचे।
- यहीं उनका संपर्क भगत सिंह, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों से हुआ।
- इसी काल में वे पूर्ण रूप से क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए।
क्रांतिकारी जीवन
यशपाल केवल साहित्य में ही नहीं, बल्कि सशस्त्र क्रांति में भी सक्रिय भागीदार थे।
- 1921 के बाद वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े
- भगत सिंह के निकट सहयोगी रहे
- 1929 में वायसराय की गाड़ी पर बम योजना से भी जुड़े
- चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के बाद संगठन के कमांडर बने
उनका जीवन लगातार पुलिस निगरानी, भूमिगत संघर्ष और जोखिमों से भरा रहा।
जेल यात्रा और संघर्ष
1932 ई. में पुलिस मुठभेड़ के बाद यशपाल गिरफ्तार हुए।
- उन्हें 14 वर्ष की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई
- दिल्ली और लाहौर षड्यंत्र केस के प्रमुख अभियुक्तों में रहे
- 1938 में कांग्रेस सरकार बनने पर रिहा हुए
जेल में लेखन
जेल में रहते हुए यशपाल ने गहन अध्ययन और लेखन किया।
- अनेक कहानियाँ जेल में ही लिखी गईं
- मार्क्सवाद, समाजवाद और विश्व साहित्य का गंभीर अध्ययन किया
- साहित्य को विचारधारा से जोड़ने की उनकी दृष्टि यहीं परिपक्व हुई
साहित्यिक जीवन
यशपाल का साहित्य यथार्थवाद, समाजवाद और क्रांतिकारी चेतना से ओत-प्रोत है।
उनके लिए राजनीति और साहित्य अलग नहीं थे—दोनों एक ही लक्ष्य की पूर्ति के साधन थे।
- साहित्य को उन्होंने सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया
- वे मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे, पर कट्टर नहीं थे
- उनके लेखन में विचार और कला का संतुलन मिलता है
यशपाल एक कहानीकार के रूप में
यशपाल ने हिंदी साहित्य में सबसे पहले कहानीकार के रूप में पहचान बनाई।
प्रमुख विशेषताएँ
- मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ चित्रण
- सामाजिक पाखंड और नैतिक द्वंद्व का उद्घाटन
- तीखा व्यंग्य और मनोवैज्ञानिक दृष्टि
- स्त्री, श्रमिक और शोषित वर्ग की समस्याएँ
प्रसिद्ध कहानियाँ
- चार आने
- गवाही
- सोमा का साहस
- एक राज़
- गुडबाई दर्द दिल
- ज्ञानदान
यशपाल एक उपन्यासकार के रूप में
उपन्यासों में यशपाल की वैचारिक शक्ति और भी स्पष्ट रूप में सामने आती है।
प्रमुख उपन्यास
- दादा कामरेड – क्रांतिकारी जीवन और मजदूर संगठन
- देशद्रोही – गांधीवाद और कांग्रेस की आलोचना
- दिव्या – नारी संघर्ष की ऐतिहासिक गाथा
- मनुष्य के रूप – परिस्थितियों से बदलता मनुष्य
- अमिता – ऐतिहासिक सामाजिक उपन्यास
- झूठा सच – भारत विभाजन पर आधारित कालजयी उपन्यास
झूठा सच दो भागों में है:
- वतन और देश
- देश का भविष्य
यह उपन्यास विभाजन के दर्द, विस्थापन और नैतिक संकट का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है।
निबंधकार, संस्मरणकार और आत्मकथाकार
यशपाल एक सशक्त निबंधकार भी थे।
- रूढ़ियों और सामाजिक पाखंड पर तीखा प्रहार
- तर्कप्रधान और विचारोत्तेजक लेखन
प्रमुख कृतियाँ
- न्याय का संघर्ष
- देखा, सोचा, समझा
- सिंहावलोकन (तीन भाग – आत्मकथा)
- गांधीवाद की शव-परीक्षा
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ (संक्षेप में)
उपन्यास
- दादा कामरेड
- देशद्रोही
- दिव्या
- मनुष्य के रूप
- अमिता
- झूठा सच
- पार्टी कामरेड
कहानी संग्रह
- ज्ञानदान
- तर्क का तूफान
- वो दुनिया
- फूलों का कुर्ता
- पिंजरे की उड़ान
सम्मान और पुरस्कार
यशपाल को उनकी साहित्यिक और वैचारिक सेवा के लिए अनेक सम्मान मिले।
- देव पुरस्कार (1955)
- सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार (1970)
- मंगला प्रसाद पारितोषिक (1971)
- पद्म भूषण (भारत सरकार)
मृत्यु
यशपाल का निधन 26 दिसंबर 1976 को हुआ।
वे हिंदी साहित्य में क्रांतिकारी यथार्थवाद की अमिट छाप छोड़ गए।
