प्रस्तावना
राही मासूम रज़ा (1927–1992) हिंदी और उर्दू साहित्य के ऐसे विशिष्ट रचनाकार थे जिन्होंने उपन्यास, कविता, पटकथा और संवाद लेखन—चारों क्षेत्रों में अपनी अमिट पहचान बनाई। वे गंगा-जमुनी तहज़ीब, भारतीय सेकुलर चेतना और मानवीय मूल्यों के प्रबल समर्थक थे।
उन्हें विशेष रूप से धारावाहिक ‘महाभारत’ के अमर संवादों, उपन्यास ‘आधा गाँव’, ‘टोपी शुक्ला’ और फ़िल्मों के सशक्त संवादों के लिए जाना जाता है। साहित्य और सिनेमा—दोनों माध्यमों में समान अधिकार रखने के कारण उन्हें ‘कलयुग का व्यास’ भी कहा गया।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
- जन्म: 1 सितंबर 1927
- जन्म स्थान: गंगौली गाँव, ज़िला गाज़ीपुर, उत्तर प्रदेश
- परिवारिक परिवेश: परंपरागत मुस्लिम परिवार, किंतु दृष्टि से प्रगतिशील
- माता: नफ़ीसा बेगम
- जीवनसाथी: नय्यरा (अलीगढ़ में परिचय हुआ)
राही मासूम रज़ा स्वयं कहा करते थे कि उनकी तीन माँएँ थीं—
- नफ़ीसा बेगम
- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय
- गंगौली की गंगा नदी
यह कथन उनके भावनात्मक, सांस्कृतिक और वैचारिक संसार को स्पष्ट करता है।
शिक्षा और प्रारंभिक संघर्ष
राही मासूम रज़ा की प्रारंभिक शिक्षा गाज़ीपुर में हुई। बचपन में वे पोलियो से पीड़ित हो गए, जिससे विद्यालय जाना छूट गया।
इसी बीमारी के दौरान—
- उन्होंने घर की लगभग सभी पुस्तकें पढ़ डालीं
- कहानियाँ सुनाने के लिए कल्लू काका नामक मुलाज़िम रखा गया
- स्वयं राही मासूम रज़ा ने माना कि “कल्लू काका न होते तो शायद मैं कोई कहानी न लिखता”
उच्च शिक्षा
- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से उर्दू साहित्य में उच्च शिक्षा
- प्रसिद्ध दास्तान ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ पर पीएच.डी.
अलीगढ़ और वैचारिक विकास
अलीगढ़ राही मासूम रज़ा के व्यक्तित्व की धुरी था।
- यहीं वे उर्दू के प्राध्यापक बने
- यहीं साहित्यिक बहसों और प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े
- यहीं वे कम्युनिस्ट आंदोलन से प्रभावित हुए
उन्होंने नगरपालिका चुनाव में अपने ही पिता के विरुद्ध भूमिहीन मज़दूर प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार किया—यह उनके वर्गचेतस और साम्यवादी दृष्टिकोण का प्रमाण है।
वे सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष (Secular) लेखक थे।
साहित्यिक जीवन की शुरुआत
- लेखन की शुरुआत शायरी से की
- उर्दू ग़ज़ल और नज़्म में पहचान बनाई
- बाद में गद्य की ओर मुड़े
अलीगढ़ में रहते हुए उन्होंने अलग-अलग नामों से रूमानी और जासूसी उपन्यास लिखे—
- शाहिद अख्तर
- आफ़ाक़ हैदर
- आफ़ताब नासिरी
यह दौर उनके अभ्यास और प्रयोग का समय था।
बंबई (मुंबई) और फ़िल्मी जीवन
बाद में वे बंबई (मुंबई) चले गए। यहाँ—
- फ़िल्मों के प्रति उनका पुराना आकर्षण काम आया
- प्रारंभिक संघर्ष लंबा रहा
- धर्मवीर भारती और कमलेश्वर ने सहयोग किया
- बी.आर. चोपड़ा और राज खोसला से मित्रता हुई
यहीं से उनके फ़िल्मी और टीवी लेखन को दिशा मिली।
‘महाभारत’ और ऐतिहासिक योगदान
बी.आर. चोपड़ा के धारावाहिक ‘महाभारत’ (1988) के लिए—
- पटकथा और संवाद लेखन
- संस्कृतनिष्ठ, ओजपूर्ण और भावनात्मक भाषा
- पात्रों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ा
इस धारावाहिक ने उन्हें घर-घर में प्रसिद्ध कर दिया।
उनके संवाद आज भी भारतीय टेलीविज़न इतिहास में अमर माने जाते हैं।
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ
हिंदी उपन्यास
- आधा गाँव
- टोपी शुक्ला
- कटरा बी आर्ज़ू
- ओस की बूँद
- असंतोष के दिन
- सीन 75
- दिल एक सादा काग़ज़
- हिम्मत जौनपुरी
- नीम का पेड़
उर्दू उपन्यास
- मुहब्बत के सिवा
काव्य-संग्रह (उर्दू)
- नया साल
- मौजे-गुल : मौजे-सबा
- रक्से-मय
- अजनबी शहर के अजनबी रास्ते
- ग़रीबे शहर
हिंदी में अनूदित काव्य
- मैं एक फेरीवाला
- शीशे के मकाँ वाले
- ग़रीबे शहर
अन्य कृतियाँ
- छोटे आदमी की बड़ी कहानी (वीर अब्दुल हमीद की जीवनी)
- क्रांति कथा (उर्दू महाकाव्य का हिंदी रूपांतरण)
फ़िल्म और टेलीविज़न लेखन
प्रमुख फ़िल्में
- मैं तुलसी तेरे आँगन की
- तवायफ़
- लम्हे
- गोलमाल
- मिली
- क़र्ज़
पुरस्कार
- फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ संवाद)
- मैं तुलसी तेरे आँगन की
- तवायफ़
- लम्हे
साहित्यिक विशेषताएँ
- गंगा-जमुनी तहज़ीब का सजीव चित्रण
- हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता
- सामाजिक यथार्थ और वर्गसंघर्ष
- सरल, संवादात्मक, प्रभावी भाषा
- इतिहास और समकालीनता का सुंदर समन्वय
सम्मान और पुरस्कार
- पद्म श्री
- पद्म भूषण
- फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार (तीन बार)
निधन
- निधन: 15 मार्च 1992
- स्थान: मुंबई
- आयु: 64 वर्ष
