जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
नरेश सक्सेना का जन्म 16 जनवरी 1939 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश में हुआ। उनका बचपन और प्रारंभिक जीवन मध्य प्रदेश के मुरैना क्षेत्र में बीता, जहाँ से उनकी प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत हुई। यह अंचल उनके संवेदनशील व्यक्तित्व और अनुभव-संपन्न दृष्टि के निर्माण में महत्वपूर्ण रहा।
शिक्षा
नरेश सक्सेना की शिक्षा साहित्यिक पृष्ठभूमि से अलग, विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में हुई, जो उन्हें हिंदी के अन्य समकालीन कवियों से अलग पहचान देती है।
- प्रारंभिक शिक्षा: मुरैना (मध्य प्रदेश)
- स्नातक शिक्षा:
जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से
बी.ई. (ऑनर्स) - उच्च तकनीकी प्रशिक्षण:
ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ, कोलकाता से
एम.ई.-पीएच (Master of Engineering – Public Health)
पेशागत जीवन
नरेश सक्सेना ने लंबे समय तक
- कॉरपोरेट क्षेत्र
- अनुवाद और लेखन
- संपादन से जुड़े कार्य
किए। वे साहित्य को पेशा नहीं बल्कि आत्मिक ज़रूरत मानते हैं। इसी कारण उनका लेखन बाज़ारवादी दबावों से मुक्त रहा।
साहित्यिक यात्रा
नरेश सक्सेना ने कविता लिखना अपेक्षाकृत देर से शुरू किया, लेकिन बहुत कम समय में ही उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली।
उनकी कविताएँ:
- आत्मसंवाद से भरी
- अनुभव-प्रधान
- स्मृति और समय के बीच के तनाव को व्यक्त करने वाली
- नैतिक और दार्शनिक प्रश्नों से युक्त हैं।
वे अचानक प्रसिद्ध होने वाले कवि नहीं, बल्कि धीरे-धीरे पहचाने गए, और आज गंभीर कविता के अनिवार्य नाम हैं।
प्रमुख काव्य संग्रह
नरेश सक्सेना के प्रमुख कविता संग्रह हैं:
1. समय का दूसरा चेहरा
- उनका सबसे चर्चित संग्रह
- स्मृति, समय और अनुभव का गहरा द्वंद्व
2. खुद से बातचीत
- आत्मसंवाद की कविताएँ
- आत्मालोचना और नैतिक प्रश्न
3. अलग-अलग आवाज़ें
- व्यक्ति और समाज के बीच की दूरी
- भीतर और बाहर की दुनिया का संघर्ष
उनके संग्रहों की विशेषता है—कम कविताएँ, लेकिन अत्यंत सघन अर्थ।
कविता की विषयवस्तु
नरेश सक्सेना की कविता के प्रमुख विषय:
- मध्यवर्गीय जीवन की जटिलताएँ
- अकेलापन और आत्मसंघर्ष
- स्मृति और समय
- नैतिक दुविधाएँ
- व्यक्ति की सीमाएँ
- भाषा और अनुभव का संबंध
- आत्मालोचना और आत्मबोध
उनकी कविता में नारेबाज़ी नहीं, बल्कि संयमित प्रतिरोध है।
भाषा-शैली
नरेश सक्सेना की भाषा-शैली उनकी सबसे बड़ी पहचान है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- अत्यंत साधारण लेकिन अर्थगर्भित भाषा
- बातचीत जैसी सहज शैली
- दार्शनिक गहराई
- प्रतीकों का सूक्ष्म प्रयोग
- अनावश्यक अलंकारों से परहेज़
उनकी कविता पढ़ते समय ऐसा लगता है जैसे
कोई व्यक्ति चुपचाप, ईमानदारी से, खुद से बात कर रहा हो।
काव्यगत विशेषताएँ
1. आत्मालोचनात्मक दृष्टि
वे अपनी कविता में स्वयं को भी कठघरे में खड़ा करते हैं।
2. अनुभव की प्रामाणिकता
उनकी कविताएँ जीए हुए अनुभवों से निकलती हैं।
3. नैतिक चेतना
उनकी कविता में नैतिकता उपदेश नहीं, बल्कि संघर्ष के रूप में आती है।
4. धीमी लेकिन गहरी मार
उनकी कविता का प्रभाव तुरंत नहीं, बल्कि समय के साथ बढ़ता है।
समकालीन कविता में स्थान
नरेश सक्सेना को अक्सर इन कवियों के साथ रखा जाता है:
- मंगलेश डबराल
- वीरेन डंगवाल
- राजेश जोशी
लेकिन उनकी पहचान पूरी तरह अलग और स्वतंत्र है।
आलोचकों के अनुसार:
नरेश सक्सेना की कविता “कम बोलकर ज़्यादा कहने” की परंपरा को आगे बढ़ाती है।
सम्मान और उपलब्धियाँ
- हिंदी साहित्य में अत्यंत सम्मानित नाम
- कई साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित
- आलोचकों और गंभीर पाठकों में विशेष प्रतिष्ठा
(वे पुरस्कारों की अपेक्षा कविता की ईमानदारी को अधिक महत्व देते हैं।)
