प्रस्तावना
लीलाधर मंडलोई समकालीन हिंदी साहित्य के उन विशिष्ट रचनाकारों में हैं, जिन्होंने लोक-जीवन, आंचलिक संवेदना, बाजारवाद की आलोचना और मानवीय अनुभवों को अत्यंत सहज, विनम्र और प्रभावशाली भाषा में अभिव्यक्त किया है। वे मूलतः कवि हैं, किंतु कविता के साथ-साथ गद्य, लोककथा, यात्रावृत्त, डायरी, पत्रकारिता और आलोचना में भी उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ी अंचल की मिठास, हिंदुस्तानी भाषा की सहजता और समकालीन यथार्थ की तीखी समझ एक साथ मिलती है।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
लीलाधर मंडलोई का जन्म 1954 ई. में जन्माष्टमी के दिन मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले के गुढ़ी नामक गाँव में हुआ। ग्रामीण और आदिवासी परिवेश में जन्म लेने के कारण उनके व्यक्तित्व पर लोक-संस्कृति, प्रकृति और जनजीवन की गहरी छाप पड़ी। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में गाँव, जंगल, लोकगीत, लोककथाएँ और जनजातीय जीवन बार-बार उपस्थित होते हैं।
शिक्षा
लीलाधर मंडलोई की शिक्षा-दीक्षा—
- भोपाल
- रायपुर
में संपन्न हुई।
उन्होंने उच्च शिक्षा के दौरान ही साहित्य, समाज और मीडिया के संबंधों को गहराई से समझा।
1987 में उन्हें प्रसारण (Broadcasting) की उच्च शिक्षा के लिए राष्ट्रकुल संबंध अभिभावकता (Commonwealth) के अंतर्गत लंदन आमंत्रित किया गया, जिससे उनका दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और व्यापक हुआ।
व्यावसायिक जीवन (प्रसारण एवं प्रशासन)
लीलाधर मंडलोई का कार्यक्षेत्र केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा। वे—
- प्रसार भारती (दूरदर्शन) से सक्रिय रूप से जुड़े
- दूरदर्शन के महानिदेशक (Director General) का दायित्व संभाला
मीडिया में रहते हुए उन्होंने भारतीय समाज, बाजारवाद, सूचना-संस्कृति और जनसंचार की जटिलताओं को बहुत निकट से देखा, जिसका प्रभाव उनके साहित्य में स्पष्ट दिखाई देता है।
साहित्यिक परिचय
लीलाधर मंडलोई की मूल पहचान एक कवि के रूप में है, परंतु उनका रचनात्मक व्यक्तित्व बहुआयामी है।
उनका लेखन क्षेत्र—
- कविता
- गद्य
- लोककथा
- लोकगीत
- यात्रावृत्त
- डायरी
- मीडिया और पत्रकारिता
- आलोचना
तक विस्तृत है।
भाषा-शैली और साहित्यिक विशेषताएँ
1. सरलता और सहजता
उनकी भाषा आम बोलचाल के बहुत निकट है। उसमें कृत्रिमता या अलंकरण का बोझ नहीं, बल्कि जीवन का सीधा सच है।
2. लोक-जीवन और आंचलिकता
उनकी भाषा में—
- छत्तीसगढ़ी बोली की मिठास
- लोक-संगीत और लोककथाओं की गूंज
- आदिवासी और जनजातीय समाज (अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों के अनुभव)
स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
3. बाजारवाद और समकालीन यथार्थ
लीलाधर मंडलोई आधुनिक समाज में—
- बाजारवाद
- पर्यावरण संकट
- उपभोक्तावाद
- मानवीय संबंधों के विघटन
पर तीखा लेकिन संयत कटाक्ष करते हैं।
4. गद्य-पद्य का सुंदर मिश्रण
- कविताओं में गद्यात्मक प्रवाह
- गद्य में काव्यात्मक संवेदना
उनकी भाषा को नया रूप देती है।
5. विनम्रता और मानवीय दृष्टि
वे भाषा और जीवन दोनों के प्रति विनम्र हैं। जीवन के कठोर अनुभवों को भी वे हास्य, करुणा और सहजता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
6. सूक्ष्म अवलोकन
छोटी-छोटी घटनाएँ, लोक-कथाएँ और रोज़मर्रा के अनुभव उनकी रचनाओं में गहरे अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।
प्रमुख कृतियाँ
कविता-संग्रह
- घर-घर घूमा
- रात-बिरात
- मगर एक आवाज
- देखा-अदेखा
- ये बदमस्ती तो होगी
- देखा पहली दफा अदेखा
- उपस्थित है समुद्र
गद्य साहित्य
- अंडमान-निकोबार की लोक कथाएँ
- पहाड़ और परी का सपना
- चाँद का धब्बा
- पेड़ भी चलते हैं
- बुंदेली लोक रागिनी
सम्मान एवं पुरस्कार
लीलाधर मंडलोई को उनके साहित्यिक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया—
- रामविलास शर्मा सम्मान (मध्यप्रदेश साहित्य परिषद)
- वागीश्वरी सम्मान
- रज़ा सम्मान
- पुश्किन सम्मान
- नागार्जुन सम्मान
