प्रस्तावना
वीरेन डंगवाल (1947–2015) आधुनिक हिंदी कविता के उन विशिष्ट कवियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने प्रगतिशील चेतना, लोकजीवन की गहरी समझ और सरल लेकिन धारदार भाषा के माध्यम से कविता को आम आदमी के बेहद करीब पहुँचाया। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि शिक्षाविद, पत्रकार और अनुवादक भी थे। उनकी कविता में लोकतांत्रिक संवेदना, निराला का फक्कड़पन, नागार्जुन-त्रिलोचन की लोकधारा और मुक्तिबोध की बौद्धिक बेचैनी का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
वीरेन डंगवाल का जन्म 5 अगस्त 1947 को कीर्तिनगर, जिला टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) में हुआ। उनके पिता रघुनंदन प्रसाद डंगवाल प्रदेश सरकार में उच्च पदस्थ अधिकारी थे, जबकि उनकी माता एक सरल, धर्मपरायण और मिलनसार गृहिणी थीं।
उनका पारिवारिक वातावरण अनुशासन, संस्कार और अध्ययनशीलता से युक्त था, जिसने उनके व्यक्तित्व को गहराई दी।
शिक्षा
वीरेन डंगवाल की प्रारंभिक शिक्षा विभिन्न नगरों में हुई, जिनमें—
- मुजफ्फरनगर
- सहारनपुर
- कानपुर
- बरेली
- नैनीताल
शामिल हैं।
इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय (प्रयागराज) से—
- 1968 में हिंदी में एम.ए.
- तत्पश्चात डी.फिल. (Ph.D.) की उपाधि प्राप्त की।
उनका शोध विषय आधुनिक हिंदी कविता की मिथकीय और प्रतीकात्मक संरचना से संबंधित था, जिसने उनके काव्य-विवेक को और समृद्ध किया।
अध्यापन जीवन
शिक्षा पूर्ण करने के बाद 1971 से वीरेन डंगवाल बरेली कॉलेज में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए।
वे आजीवन अध्यापन से जुड़े रहे और छात्रों के बीच एक लोकप्रिय, संवादशील और प्रेरक शिक्षक के रूप में पहचाने गए।
उनकी पत्नी डॉ. रीता डंगवाल भी शिक्षिका थीं। वे स्थायी रूप से बरेली में निवास करते थे।
साहित्यिक यात्रा
वीरेन डंगवाल ने लगभग 22 वर्ष की आयु में अपनी पहली कविता लिखी।
1970–75 के बीच ही उनकी कविताएँ देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं और बहुत कम समय में उन्होंने हिंदी जगत में विशेष पहचान बना ली।
उनकी कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह—
- साधारण जीवन के असाधारण क्षणों को पकड़ती है
- हाशिए पर खड़े मनुष्य, पशु-पक्षी और वस्तुओं को भी कविता का विषय बनाती है
- बिना जटिल शब्दावली के गहरे अर्थ रचती है
पत्रकारिता
वीरेन डंगवाल पत्रकारिता से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे—
- इलाहाबाद से प्रकाशित ‘अमृत प्रभात’ में ‘घूमता आईना’ शीर्षक से स्तंभ लेखन
- दैनिक ‘अमर उजाला’ में संपादकीय सलाहकार एवं बरेली के स्थानीय संपादक
पत्रकारिता ने उनकी कविता को समकालीन यथार्थ, राजनीतिक चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी प्रदान की।
काव्य-शैली एवं साहित्यिक विशेषताएँ
- सरल, बोलचाल की लेकिन अत्यंत अर्थगर्भित भाषा
- आम आदमी, श्रमिक, किसान और मध्यवर्ग का सजीव चित्रण
- प्रगतिशील और लोकतांत्रिक चेतना
- व्यंग्य, करुणा और मानवीय ऊष्मा का संतुलन
- लयात्मकता और कथात्मक प्रवाह
उनकी कविता नारे नहीं लगाती, बल्कि धीरे-धीरे सोच बदलती है।
प्रमुख काव्य-संग्रह
काव्य संग्रह
- इसी दुनिया में (1991)
- दुष्चक्र में सृष्टा (2002)
- स्याही ताल (2009)
- कवि ने कहा (चयनित कविताएँ)
उनका पहला संग्रह 43 वर्ष की आयु में प्रकाशित हुआ, जो अपने आप में उनकी सृजनात्मक ईमानदारी का प्रमाण है।
अनुवाद कार्य
वीरेन डंगवाल ने विश्व कविता को हिंदी से जोड़ने में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने जिन कवियों का अनुवाद किया, उनमें प्रमुख हैं—
- पाब्लो नेरूदा
- बर्टोल्ट ब्रेख्त
- वास्को पोपा
- मिरोस्लाव होलुब
- तदेऊश रोज़ेविच
- नाज़िम हिकमत
उनकी कविताओं के अनुवाद बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अंग्रेज़ी, मलयालम और ओड़िया में भी प्रकाशित हुए।
पुरस्कार एवं सम्मान
वीरेन डंगवाल को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया—
- रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार (1992)
- श्रीकांत वर्मा स्मृति पुरस्कार (1993)
- शमशेर सम्मान (2002)
- साहित्य अकादमी पुरस्कार (2004) – दुष्चक्र में सृष्टा के लिए
निधन
लंबी बीमारी के बाद 28 सितंबर 2015 को बरेली (उत्तर प्रदेश) में 68 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जाता है।
