प्रस्तावना
कुँवर नारायण (1927–2017) हिंदी साहित्य के उन विशिष्ट रचनाकारों में हैं, जिन्होंने नई कविता आंदोलन को वैचारिक गहराई, दार्शनिक दृष्टि और वैश्विक संवेदना प्रदान की। वे केवल कवि ही नहीं, बल्कि कहानीकार, समीक्षक, अनुवादक और कला-चिंतक भी थे। इतिहास और मिथक के माध्यम से वर्तमान यथार्थ को समझना उनकी रचनात्मक विशेषता रही है।
जन्म एवं प्रारंभिक जीवन
कुँवर नारायण का जन्म 19 सितंबर 1927 को अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद), उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका पारिवारिक वातावरण सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना से समृद्ध था। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने विज्ञान विषय से प्राप्त की, जिसने आगे चलकर उनके साहित्य को तार्किक और विश्लेषणात्मक दृष्टि प्रदान की।
शिक्षा
- इंटरमीडिएट तक शिक्षा: विज्ञान विषय
- स्नातक एवं स्नातकोत्तर: लखनऊ विश्वविद्यालय
- विषय: अंग्रेज़ी साहित्य (B.A. एवं M.A.)
- वर्ष: 1951 में M.A. पूर्ण
अंग्रेज़ी साहित्य के अध्ययन ने उन्हें विश्व साहित्य, दर्शन और आधुनिक विचारधाराओं से परिचित कराया, जिसका प्रभाव उनके लेखन में स्पष्ट दिखाई देता है।
साहित्यिक जीवन और नई कविता आंदोलन
कुँवर नारायण ने 1950 के दशक में कविता-लेखन आरंभ किया। उनका पहला काव्य-संग्रह ‘चक्रव्यूह’ (1956) प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें साहित्यिक पहचान दिलाई।
तीसरा सप्तक
वर्ष 1959 में अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में उनकी कविताएँ शामिल हुईं। इसके साथ ही वे नई कविता आंदोलन के प्रमुख हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हो गए।
रचनात्मक विशेषताएँ
कुँवर नारायण की रचनाशीलता का दायरा अत्यंत व्यापक है—
- इतिहास और मिथक के माध्यम से आधुनिक यथार्थ की व्याख्या
- दार्शनिक गहराई और मानवीय संवेदना
- प्रयोगधर्मी शैली के साथ सहज संप्रेषण
- शहरी जीवन की जटिलताओं का सूक्ष्म चित्रण
उनका साहित्य किसी एक खांचे में सीमित नहीं किया जा सकता।
प्रमुख कृतियाँ
काव्य-संग्रह
- चक्रव्यूह (1956)
- परिवेश : हम-तुम (1961)
- अपने सामने (1979)
- कोई दूसरा नहीं (1993)
- इन दिनों (2002)
- हाशिए के बहाने
- कविता के बहाने
प्रबंध / खंड काव्य
- आत्मजयी (1965)
- वाजश्रवा के बहाने (2008)
कहानी संग्रह
- आकारों के आसपास (1973)
समीक्षा एवं विचार
- आज और आज से पहले
- मेरे साक्षात्कार
- साहित्य के कुछ अंतर्विषयक संदर्भ
संकलन
- कुँवर नारायण-संसार
- कुँवर नारायण उपस्थिति
- चुनी हुई कविताएँ
- प्रतिनिधि कविताएँ
‘आत्मजयी’ का साहित्यिक महत्व
‘आत्मजयी’ कठोपनिषद की कथा पर आधारित एक महत्त्वपूर्ण प्रबंध काव्य है, जिसमें मृत्यु, जीवन और चेतना के प्रश्नों का गहन दार्शनिक विवेचन किया गया है।
नचिकेता और यम संवाद के माध्यम से मानव जीवन की शाश्वत जिज्ञासाओं को काव्यात्मक रूप दिया गया है।
भाषा और शैली
- भाषा: सरल, संयत और विचारप्रधान खड़ीबोली
- शैली: दार्शनिक, प्रयोगधर्मी और संवादात्मक
- प्रतीक: इतिहास, मिथक और आधुनिक जीवन
- अलंकार: संयमित और अर्थगर्भित
अन्य साहित्यिक एवं सांस्कृतिक योगदान
- ‘नया प्रतीक’ पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य
- उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के उपाध्यक्ष (1976–1979)
- सिनेमा, रंगमंच और कला पर लेखन
- कवाफी और बोर्खेस जैसे कवियों का अनुवाद
पुरस्कार और सम्मान
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (2005)
- साहित्य अकादमी पुरस्कार
- व्यास सम्मान
- प्रेमचंद पुरस्कार
- राष्ट्रीय कबीर सम्मान
- कुमार आशान पुरस्कार
- पद्मभूषण (2009)
- अंतरराष्ट्रीय सम्मान (पोलैंड, रोम आदि)
निधन
कुँवर नारायण का निधन 15 नवंबर 2017 को दिल्ली में हुआ। उनका निधन हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है।
