जीवन परिचय
गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ (1917–1964) आधुनिक हिंदी साहित्य के सबसे मौलिक, जटिल और बेचैन रचनाकारों में गिने जाते हैं। वे कवि, कथाकार, आलोचक, निबंधकार और चिंतक—सभी रूपों में समान रूप से प्रभावशाली थे। उन्हें प्रगतिशील कविता और नई कविता के बीच का सेतु माना जाता है।
मुक्तिबोध हिंदी साहित्य में केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक बौद्धिक और नैतिक घटना हैं—जैसा कि शमशेर बहादुर सिंह ने कहा।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
- जन्म तिथि: 13 नवंबर 1917
- जन्म स्थान: श्योपुर (तत्कालीन ग्वालियर रियासत), वर्तमान मध्य प्रदेश
- पिता: माधवराव गोपाळराव मुक्तिबोध (पुलिस निरीक्षक)
- माता: पार्वतीबाई (बुंदेलखंड के किसान परिवार से)
मुक्तिबोध का परिवार मूलतः महाराष्ट्र के जळगांव से था। उनके पूर्वजों का उपनाम कुलकर्णी था, जो बाद में ग्वालियर आ बसे।
पिता माधवराव अत्यंत ईमानदार, निर्भीक और न्यायप्रिय पुलिस अधिकारी थे। उनकी नैतिकता और सचाई का गहरा प्रभाव मुक्तिबोध के व्यक्तित्व पर पड़ा, जिसे उन्होंने अपनी कविताओं में भी रूपायित किया।
मुक्तिबोध अपने माता-पिता की धार्मिकता, बौद्धिकता और नैतिकता के संस्कार लेकर बड़े हुए।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा: उज्जैन
- बी.ए. (1938) – होल्कर कॉलेज, इंदौर
- एम.ए. हिंदी (1954) – नागपुर विश्वविद्यालय
उन्होंने अंग्रेज़ी, फ्रेंच, रूसी साहित्य, इतिहास, दर्शन, विज्ञान, रहस्यवादी और वैज्ञानिक कथाओं का गहन अध्ययन किया। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में बौद्धिक गहराई और दार्शनिक जटिलता दिखाई देती है।
वैवाहिक जीवन
1939 में उन्होंने सामाजिक-पारिवारिक विरोध के बावजूद शांता जी से प्रेम-विवाह किया। आर्थिक तंगी और अस्थिर जीवन के बावजूद उनका दांपत्य जीवन सहयोग और संघर्ष पर आधारित रहा।
आजीविका और संघर्षपूर्ण जीवन
मुक्तिबोध का जीवन निरंतर संघर्ष, अस्थिर नौकरियों और आर्थिक अभाव से भरा रहा।
उन्होंने विभिन्न भूमिकाएँ निभाईं—
- शिक्षक
- पत्रकार
- संपादक
- आकाशवाणी कर्मचारी
- सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवाएँ
वे उज्जैन, शुजालपुर, इंदौर, नागपुर, कलकत्ता, जबलपुर, बंबई, बनारस आदि स्थानों पर कार्यरत रहे।
1958 से वे दिग्विजय कॉलेज, राजनांदगांव में प्राध्यापक बने—यहीं उनकी अनेक महान रचनाएँ लिखी गईं।
उनकी प्रसिद्ध आत्मस्वीकृति—
“नौकरियाँ पकड़ता और छोड़ता रहा…
निम्न-मध्यवर्गीय जीवन, बाल-बच्चे, दवा-दारू…”
साहित्यिक जीवन और वैचारिक चेतना
प्रगतिशील और नई कविता का सेतु
मुक्तिबोध स्वातंत्र्योत्तर प्रगतिशील कविता के शीर्ष व्यक्तित्व थे।
उन्होंने—
- प्रगतिवाद के संकुचित वैचारिक कठमुल्लेपन की आलोचना की
- नई कविता की आत्मकेन्द्रित और पलायनवादी प्रवृत्तियों का भी विरोध किया
उनकी कविता सत्ता, बौद्धिक वर्ग, नैतिक पतन और आत्मसंघर्ष का निर्भीक विश्लेषण है।
‘तार सप्तक’ और ऐतिहासिक भूमिका
1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ से मुक्तिबोध पहली बार बड़े पैमाने पर सामने आए।
इस संग्रह में उनकी कविताएँ—
- सबसे अधिक मौलिक
- बौद्धिक होते हुए भी रोमानी
- जटिल लेकिन ईमानदार
मानी जाती हैं।
काव्य-विशेषताएँ
- लंबी, जटिल और प्रतीकात्मक कविताएँ
- स्वप्न, फैंटेसी और अवचेतन का प्रयोग
- नैतिक आत्मालोचना
- बौद्धिक बेचैनी और सामाजिक उत्तरदायित्व
भगवान सिंह के शब्दों में—
“वे हमें गुदगुदाते नहीं, झकझोर देते हैं।”
प्रमुख काव्य-कृतियाँ
कविता संग्रह
- चाँद का मुँह टेढ़ा है
- भूरी-भूरी खाक धूल
- सतह से उठता आदमी
प्रसिद्ध कविताएँ
- अँधेरे में
- ब्रह्मराक्षस
- मुझे पुकारती हुई पुकार
- मैं तुम लोगों से दूर हूँ
- भूल-गलती
- शून्य
👉 ‘अँधेरे में’ मुक्तिबोध की अंतिम और सबसे महत्त्वपूर्ण कविता मानी जाती है, जो स्वतंत्र भारत की सत्ता-संरचना और बौद्धिक वर्ग के गठजोड़ का महाकाव्यात्मक विश्लेषण है।
कथा-साहित्य
- काठ का सपना
- विपात्र
- ब्रह्मराक्षस का शिष्य
- एक अंतःकथा
उनकी कहानियाँ कविताओं का ही विस्तार और पूर्वाभ्यास लगती हैं।
आलोचना और गद्य
- एक साहित्यिक की डायरी
- कामायनी: एक पुनर्विचार
- कला का तीसरा क्षण (रचना-प्रक्रिया पर ऐतिहासिक निबंध)
उन्होंने भक्ति आंदोलन, कामायनी, उर्वशी और आधुनिक कविता पर नये दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।
‘गोत्रहीन कवि’
अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध को “गोत्रहीन कवि” कहा—
अर्थात हिंदी में उनका कोई प्रत्यक्ष पूर्वज नहीं।
उनकी प्रेरणा—
- दोस्तोवस्की
- टॉल्स्टॉय
- गोर्की
जैसे उपन्यासकारों से आई।
बीमारी और करुण मृत्यु
17 फरवरी 1964 को उन्हें अर्धांगवायु (पैरालिसिस) का गंभीर आघात लगा।
लेखकों और सरकार के प्रयासों के बावजूद वे जीवन-मृत्यु से संघर्ष करते रहे और अंततः—
- निधन: 11 सितंबर 1964
- स्थान: नई दिल्ली
उनकी मृत्यु अत्यंत पीड़ादायक और उपेक्षा-पूर्ण परिस्थितियों में हुई।
