प्रस्तावना
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी (1906–1967) हिंदी साहित्य के महान आलोचक, पत्रकार, संपादक, शिक्षक और प्रशासक थे। वे विशेष रूप से छायावादी काव्य के शीर्षस्थ आलोचक के रूप में विख्यात हैं। जिस समय छायावाद को आलोचना-जगत में पूर्ण स्वीकृति नहीं मिली थी, उस समय वाजपेयी जी ने प्रसाद–निराला–पंत जैसे कवियों को स्थापित कर छायावाद को एक सशक्त साहित्यिक आंदोलन के रूप में प्रतिष्ठित किया।
उनकी कृति ‘हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी’ को आधुनिक हिंदी आलोचना की युगांतरकारी पुस्तक माना जाता है।
जन्म एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का जन्म 4 सितंबर 1906 ई. को मगरायर गाँव, उन्नाव जिला, उत्तर प्रदेश में हुआ।
- पिता: गोवर्धनलाल वाजपेयी (आर्यसमाज से प्रभावित, विद्वान प्रवृत्ति)
- माता: जनकदुलारी देवी
बाल्यावस्था से ही उन्हें संस्कृत और व्याकरण का गहन संस्कार मिला। पिता ने सात वर्ष की आयु में ही उन्हें पाणिनि की अष्टाध्यायी और अमरकोश के अंश कंठस्थ कराए, जो उनकी विद्वत्ता की आधारशिला बने।
शिक्षा
- प्रारंभिक शिक्षा: हजारीबाग
- मिशन हाई स्कूल, हजारीबाग से मैट्रिक (उत्कृष्ट अंकों से)
- संत कोलंबस कॉलेज, हजारीबाग (विज्ञान से कला की ओर प्रवृत्ति)
- इंटरमीडिएट: 1925
- काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU)
- बी.ए. (1927) – विश्वविद्यालय में चौथा स्थान
- एम.ए. (1929)
उनकी शिक्षा में तर्क, वैज्ञानिक दृष्टि और साहित्यिक विवेक का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
वैवाहिक जीवन
- विवाह: जनवरी 1925 – सावित्री देवी
- संतानें:
- पुत्र: स्वस्ति कुमार वाजपेयी
- पुत्री: पद्मा
- पुत्र: सुनृत कुमार
पत्रकारिता एवं संपादन
नंददुलारे वाजपेयी जी का प्रारंभिक साहित्यिक जीवन पत्रकारिता और संपादन से जुड़ा रहा।
- ‘भारत’ (अर्द्ध-साप्ताहिक) – संपादक (1930–1932)
- काशी नागरी प्रचारिणी सभा – सूरसागर का संपादन
- गीता प्रेस, गोरखपुर – रामचरितमानस का संपादन
उनकी संपादकीय भूमिकाएँ उनकी सूक्ष्म आलोचनात्मक दृष्टि और पाठ-परंपरा की गहरी समझ को दर्शाती हैं।
अध्यापन एवं प्रशासनिक जीवन
- काशी हिंदू विश्वविद्यालय – हिंदी विभाग में प्राध्यापक (1941–1947)
- सागर विश्वविद्यालय –
- हिंदी विभागाध्यक्ष (1947–1965)
- विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन –
- कुलपति (1965–1967)
एक प्रशासक के रूप में भी उन्होंने शैक्षणिक अनुशासन और साहित्यिक गरिमा को बनाए रखा।
साहित्यिक योगदान
एक आलोचक के रूप में
नंददुलारे वाजपेयी को शुक्लोत्तर युग का प्रमुख समालोचक माना जाता है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल छायावाद को अपेक्षित सहानुभूति नहीं दे पाए थे। ऐसे समय में वाजपेयी जी ने:
- छायावाद का सैद्धांतिक समर्थन किया
- प्रसाद–निराला–पंत को हिंदी की ‘वृहत्त्रयी’ के रूप में प्रतिष्ठित किया
- आलोचना को तर्कपूर्ण, वैज्ञानिक और मूल्यपरक बनाया
प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ
अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ
- हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी (1942)
- आधुनिक साहित्य (1950)
- नया साहित्य : नये प्रश्न (1955)
- आधुनिक काव्य : रचना और विचार
साहित्यकार-केन्द्रित कृतियाँ
- जयशंकर प्रसाद
- कवि निराला
- महाकवि सूरदास
- सुमित्रानंदन पंत
- प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन
अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तकें
- राष्ट्रभाषा की कुछ समस्याएँ
- राष्ट्रीय साहित्य तथा अन्य निबंध
- रस सिद्धांत : नये संदर्भ
- नई कविता
- हिन्दी साहित्य का आधुनिक युग
उनका लेखन मुख्यतः निबंधात्मक है, जिन्हें बाद में ग्रंथों का रूप दिया गया।
उनकी पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य : बीसवीं शताब्दी’ को आधुनिक हिंदी आलोचना का मील का पत्थर माना जाता है।
निधन
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का निधन 21 अगस्त 1967 ई. को उज्जैन में हृदयाघात से हुआ।
