लक्ष्मी नारायण मिश्र (17 दिसम्बर 1903 – 19 अगस्त 1987) आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख नाटककार, एकांकीकार, कवि और साहित्यकार थे। 1930 से 1950 के बीच वे हिंदी रंगमंच के सर्वाधिक लोकप्रिय और चर्चित नाटककार बने। उनके नाटक विद्यालयों, महाविद्यालयों और रंगमंच संस्थाओं द्वारा निरंतर मंचित होते रहे। मिश्र जी के नाटकों और एकांकियों में भारतीय संस्कृति, मनोवैज्ञानिक गहराई, चरित्र निर्माण, सामाजिक यथार्थ और कथा की नाटकीयता—इन सभी का सुंदर संगम मिलता है।
हिंदी एकांकी विधा को लोकप्रिय और समृद्ध करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
1. प्रारंभिक जीवन
- जन्म: 17 दिसंबर 1903
- जन्म स्थान: बस्ती क्षेत्र, ज़िला आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश
- वे एक मध्यमवर्गीय, सांस्कृतिक वातावरण वाले परिवार में पैदा हुए।
- बचपन से ही साहित्य, अध्ययन और नाट्यकला में उनकी गहरी रुचि थी।
उनके व्यक्तित्व में संयम, गंभीरता और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का गहरा प्रभाव था, जो आगे चलकर उनके साहित्य में स्पष्ट दिखाई देता है।
2. शिक्षा
लक्ष्मी नारायण मिश्र ने प्रारंभिक शिक्षा अपने क्षेत्र में ही प्राप्त की। जीवन के आरंभिक वर्षों में उन्होंने हिंदी, संस्कृत और अंग्रेज़ी का गहन अध्ययन किया।
बाद में उन्होंने साहित्य और नाट्यकला की विभिन्न विधाओं का अध्ययन करके अपने लेखन को नई दिशा दी।
3. साहित्यिक जीवन की शुरुआत
मिश्र जी ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत कविता लेखन से की।
उनका पहला काव्य-संग्रह ‘अन्तर्जगत्’ (1924) प्रकाशित हुआ।
इसके बाद वे नाटक और एकांकी लेखन की ओर मुड़े, जहाँ उन्हें सर्वाधिक ख्याति मिली।
1930 से 1950 के बीच उनके नाटक हिंदी रंगमंच के मुख्य आकर्षण बने और वे लोकप्रिय नाटककारों में अग्रणी रहे।
4. नाटककार और एकांकीकार के रूप में ख्याति
लक्ष्मी नारायण मिश्र हिंदी के उन लेखकों में से हैं जिन्होंने:
- भारतीय नाट्य परंपरा
- पाश्चात्य नाट्य सिद्धांत
- मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
- ऐतिहासिक व पौराणिक कथा-शैली
—इन सभी का उत्कृष्ट सामंजस्य स्थापित किया।
उनके एकांकियों की मुख्य विशेषताएँ
- पात्रों की संख्या कम
- संवाद अत्यंत प्रभावी, संक्षिप्त और मर्मस्पर्शी
- विषय पौराणिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और ऐतिहासिक
- चरित्रांकन अत्यंत जीवंत
- कलाकार की तरह उद्देश्य की पूर्ति — उपदेशक की तरह नहीं
उनके चरित्र पाठकों को “लेखक के मानसपुत्र” नहीं बल्कि “जीते-जागते व्यक्ति” प्रतीत होते हैं।
डॉ. रामचंद्र महेंद्र के शब्दों में
“मिश्र जी का यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक दृष्टि और स्थितियों का गठन भारतीय नाट्यशास्त्र की देन है। वे अंतरंग में सदैव भारतीय हैं।”
5. प्रमुख कृतियाँ (Naatak & Ekanki)
(A) प्रमुख नाटक
| वर्ष | नाटक का नाम |
|---|---|
| 1926 | अशोक |
| 1930 | संन्यासी |
| 1931 | राक्षस का मंदिर |
| 1932 | मुक्तिका रहस्य |
| 1933 | राजयोग, सिंदूर की होली |
| 1936 | आधी रात |
| 1945 | गरुड़ध्वज |
| 1946 | नारद की वीणा |
| 1950 | वत्सराज, दशाश्वमेध |
| 1953 | वितस्ता की लहरें |
| 1955 | चक्रव्यूह |
| — | समाज के स्तम्भ, गुड़िया का घर (प्रसिद्ध नाटक) |
(B) प्रमुख एकांकी
लक्ष्मी नारायण मिश्र के लगभग 100 से अधिक एकांकी उपलब्ध हैं।
सबसे प्रसिद्ध एकांकी संग्रह:
- अशोक वन (1950)
- प्रलय के मंच पर
- कावेरी में कमल
- बलहीन
- नारी का रंग
- स्वर्ग से विप्लव
- भगवान मनु
इन एकांकियों में नाटकीयता, मनोवैज्ञानिक चित्रण, जीवन-दर्शन और भारतीयता का सुंदर मिश्रण मिलता है।
6. लेखन की विशेषताएँ
1. चरित्र निर्माण
उनके पात्र जटिल नहीं होते, लेकिन उनके भीतर गहरी मनोवैज्ञानिक परतें छिपी रहती हैं।
2. संवाद-योजना
- तार्किक
- सरल
- बौद्धिक
- नाटकीय प्रभाव से भरपूर
- मर्म को सीधे छूने वाले
उदाहरण: एकांकी “बलहीन” का संवाद
- देवकुमार: “तब तुमने स्त्री से विवाह किया है?”
- रजनी: “संसार में धोखा बहुत होता है…”
3. भारतीय नाट्य परंपरा का प्रभाव
उन्होंने संस्कृत नाटकों की यथार्थपरक संरचना और भारतीय जीवन-दर्शन को आधुनिक रंगमंच से जोड़कर नया रूप प्रदान किया।
4. पौराणिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक विषय
उनके नाटक “अतीत” और “वर्तमान” का संतुलित समन्वय प्रस्तुत करते हैं।
7. उनके लेखन पर पाश्चात्य प्रभाव
लक्ष्मी नारायण मिश्र पर कई पाश्चात्य साहित्यकारों का प्रभाव देखा गया, जिनमें—
- हेनरिक इब्सन
- जॉर्ज बर्नार्ड शॉ
- मैटरलिंक
—प्रधान हैं।
फिर भी उनके नाटक भारतीय आत्मा से भरे होते थे, इसलिए वे “भारतीयता + आधुनिकता” के अद्भुत संगम के प्रतीक बनते हैं।
8. अनुवाद और अन्य रचनाएँ
- अन्तर्जगत् (1924) – कविता संग्रह
- कई नाटकों का अनुवाद
- 25 से अधिक नाटक
- 100+ एकांकी
- गद्य और पद्य—दोनों में साहित्य सृजन
9. लोकप्रियता और मंचन
1930–1950 तक उनके नाटक:
- देशभर के स्कूल-कॉलेजों में मंचित होते थे
- रंगकर्म की नई शैली को जन्म देते थे
- हिंदी नाटक को नई पहचान दिलाते थे
“अशोक”, “आधी रात”, “राक्षस का मंदिर” जैसे नाटक आज भी रंगमंच पर खेले जाते हैं।
10. निधन
19 अगस्त 1987
उनका देहावसान हो गया।
उनकी रचनाएँ आज भी हिंदी रंगमंच, साहित्य और शिक्षण पाठ्यक्रमों में सम्मानपूर्वक पढ़ाई और मंचित की जाती हैं।
