रामनरेश त्रिपाठी का जीवन परिचय (Ramnaresh Tripathi Biography)

रामनरेश त्रिपाठी (4 मार्च 1889 – 16 जनवरी 1962) हिंदी साहित्य के पूर्व-छायावाद युग के प्रमुख कवि, कथाकार, नाटककार, उपन्यासकार, संपादक और लोकगीत-संग्रहकर्ता थे। उन्हें हिंदी का पहला लोकगीत-संग्रहकर्ता, उत्कृष्ट राष्ट्रीय कवि और बाल साहित्य के संवाहक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपने 72 वर्ष के जीवन में लगभग 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें कविता, कहानी, उपन्यास, जीवनी, संस्मरण, नाटक, बाल साहित्य और एकांकी शामिल हैं।

उनका सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य ‘कविता कौमुदी’ है — जिसे तैयार करने के लिए उन्होंने 16 वर्षों तक गाँव-गाँव जाकर लोकगीतों का संग्रह किया।

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1. जन्म, परिवार और प्रारंभिक जीवन

  • जन्म: 4 मार्च 1889
  • जन्म स्थान: कोइरीपुर, सुल्तानपुर (पुराना जौनपुर), उत्तर प्रदेश
  • पिता: पंडित रामदत्त त्रिपाठी (धार्मिक, कर्तव्यनिष्ठ और पूर्व सूबेदार)
  • परिवार: धार्मिक एवं संस्कारी ब्राह्मण परिवार

पंडित रामदत्त त्रिपाठी के संस्कारों से रामनरेश त्रिपाठी में बचपन से ही धर्म, सत्य, कर्तव्य, राष्ट्रभक्ति, निर्भीकता और आत्मविश्वास का भाव विकसित हो गया था।

2. शिक्षा

उनकी शिक्षा का सफर बहुत अधिक लंबा नहीं रहा:

  • प्रारंभिक शिक्षा: गाँव के प्राथमिक विद्यालय में
  • आगे की पढ़ाई: जौनपुर हाई स्कूल में
  • इंटर (कक्षा 10) भी पूरी नहीं कर सके

शिक्षा अधूरी रहने के बाद भी उन्होंने अपना ज्ञान स्वाध्याय के बल पर विस्तारित किया।

सीखी गई भाषाएँ

  • हिंदी
  • अंग्रेज़ी
  • बांग्ला
  • संस्कृत

वे अद्भुत स्व-अध्येता थे।

3. संघर्ष और युवा अवस्था

18 वर्ष की उम्र में पिता से अनबन होने के कारण वे कलकत्ता चले गए।
वहाँ बीमार पड़ने पर डॉक्टर की सलाह पर वे राजस्थान के सीकर के फतेहपुर गाँव में सेठ रामवल्लभ नेवरिया के पास रहने लगे।

वहीं उनकी सेहत सुधरी और उन्होंने सेठ जी के बच्चों के शिक्षक के रूप में काम शुरू किया।

यहीं से उनकी कविता का वास्तविक आरंभ हुआ।

उसी समय उन्होंने अमर प्रार्थना गीत लिखा:

“हे प्रभो आनंददाता, ज्ञान हमें दीजिये…”
जो आज भी हजारों स्कूलों में गाया जाता है।

4. साहित्यिक साधना और लेखन यात्रा

उनकी साहित्य साधना की शुरुआत राजस्थान के फतेहपुर से हुई। बाद में वे स्थायी रूप से प्रयाग (इलाहाबाद) आ गए और यहीं से हिंदी साहित्य की सेवा करते रहे।

उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया:

  • कविता
  • कहानी
  • उपन्यास
  • संस्मरण
  • नाटक
  • जीवनी
  • बाल साहित्य
  • लोकगीत संकलन

उन्होंने 100+ पुस्तकें लिखीं — यह उनकी लेखनी की प्रचुरता को दर्शाता है।

5. गांधीवाद और राष्ट्रीय चेतना

रामनरेश त्रिपाठी महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रभावित थे।

वे कहते थे:

“गांधी जी का प्रेम मेरे लिए लरिकाई का प्रेम है।”

  • गांधीवादी दर्शन उनके जीवन और साहित्य में स्पष्ट दिखता है।
  • वे हिंदी साहित्य सम्मेलन के निर्देश पर दक्षिण भारत गए और हिंदी प्रचार में योगदान दिया।
  • किसान आंदोलनों और स्वतंत्रता संघर्ष में भी शामिल हुए; जेल भी गए।

6. ‘कविता कौमुदी’ — हिंदी का पहला लोकगीत-संग्रह

यह उनका सबसे महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और अथक परिश्रम से तैयार किया गया संग्रह है।

विशेषताएँ

  • ग्रामीण लोकगीतों का विशाल संग्रह
  • 16 वर्ष तक गाँव-गाँव घूमकर सामग्री संग्रह
  • रात-रात भर घरों के पिछवाड़े बैठकर सोहर, विवाह गीत और लोकगीत सुनना
  • कुल 8 भागों में संकलित
  • हिंदी में लोकगीतों का पहला और सबसे बड़ा संग्रह

रामनरेश त्रिपाठी लोकगीतों के प्रथम व्यवस्थित संकलक माने जाते हैं।

7. प्रमुख काव्य रचनाएँ

प्रबंध काव्य

  1. मिलन (1918) – 13 दिनों में रचित
  2. पथिक (1920) – 21 दिनों में रचित
  3. मानसी (1927)
  4. स्वप्न (1929) – 15 दिनों में रचित
    • इसी के लिए उन्हें हिंदुस्तानी अकादमी का पुरस्कार मिला

मुक्तक संग्रह

  • मारवाड़ी मनोरंजन
  • आर्य संगीत शतक
  • कविता-विनोद
  • क्या होम रूल लोगे
  • मानसी

कहानी संग्रह

  • तरकस
  • आँखों देखी कहानियाँ
  • स्वप्नों के चित्र
  • नखशिख
  • उन बच्चों का क्या हुआ?
  • 21 अन्य कहानियाँ

उपन्यास

  • वीरांगना
  • वीरबाला
  • मारवाड़ी और पिशाचनी
  • सुभद्रा और लक्ष्मी

नाटक

  • जयंती
  • प्रेमलोक
  • वफ़ाती चाचा
  • अजनबी
  • पैसा परमेश्वर
  • बा और बापूहिंदी का पहला एकांकी नाटक
  • कन्या का तपोवन

8. साहित्यिक विशेषताएँ

  • सरल, सहज, मार्मिक और भावपूर्ण भाषा
  • ग्रामीण संवेदना और भारतीय संस्कृति का जीवंत चित्रण
  • गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव
  • लोकगीतों को साहित्य में स्थान देने का अनोखा प्रयास
  • राष्ट्रीयता, करुणा और मानवीय संबंधों का गहरा चित्रण
  • मौलिकता और प्रवाह

उनकी शैली में जमीन से जुड़ी हुई सुगंध, लोकजीवन की आत्मा और भारतीयता की चमक मिलती है।

9. पुरस्कार और सम्मान

  • ‘स्वप्न’ के लिए हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार
  • लोकसम्मान, साहित्यिक समाजों द्वारा सत्कार
  • सरकार से भले कोई बड़ा सम्मान न मिला हो,
    पर जनता का आदर और अमिट यश प्राप्त हुआ।

10. मृत्यु

  • निधन: 16 जनवरी 1962
  • स्थान: प्रयाग (इलाहाबाद), उत्तर प्रदेश

उनकी स्मृति में सुल्तानपुर जिले में “पंडित रामनरेश त्रिपाठी सभागार” स्थापित है।

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